गुरुवार, 19 जनवरी 2017

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  🌸🌹!:: भगवद्🌹अर्पणम् ::!🌹🌸
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🌹भगवत्प्राप्तिके चार साधनोंकी सुगमताका रहस्य :

( गत ब्लॉग से आगे )

परमेश्वर और उसकी प्राप्तिके साधनोंमें श्रद्धा और प्रेमकी कमी होनेके कारण ही साधन करने में साधकों को उत्साह नहीं होता। आरामतलब स्वभावके कारण आलस्य और अकर्मण्यता बढ़ जाती है इसीसे उन्हें परम शान्ति और परमानन्दकी प्राप्ति नहीं होती। इसलिये श्रीमद्भागवतमें बतलायी हुई नवधा भक्तिका तत्त्व-रहस्य महापुरुषोंसे समझकर श्रद्धा और प्रेमपूर्वक तत्परताके साथ भक्तिका साधन करना चाहिये।

भगवान्के रासका विषय तो अत्यन्त ही गहन है। भगवान् और भगवान्की क्रीडा दिव्य, अलौकिक, पवित्र, प्रेममय और मधुर है। जो माधुर्यरसके रहस्यको जानता है, वही उससे लाभ उठा सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण और गोपियोंकी जो असली रासक्रीडा थी, उसको तो जाननेवाले ही संसारमें बहुत कम हैं। उनकी वह क्रीडा अति पवित्र, अलौकिक और अमृतमय थी। वर्तमानमें होनेवाले रासमें तो बहुत-सी कल्पित बातें भी आ जाती हैं तथा अधिकांशमें रास करनेवाले आॢथक दृष्टिसे ही करते हैं। उनका उद्देश्य दर्शकोंको प्रसन्न करना ही रहता है। इसलिये दर्शकोंके चित्तपर यह असर पड़ता है कि भगवान् भी ये सब आचरण किया करते थे। तथा यह बात स्वाभाविक ही है कि साधक जो इष्टमें देखता है, वह बात उसमें भी आ जाती है। भगवान्के तत्त्व और रहस्यको न जाननेके कारण उनकी प्रेममय लीला काममय दीखने लगती है और निर्दोष बात दोषयुक्त प्रतीत होने लगती है। इस कारण ही देखनेवाले किसी-किसी स्त्री-पुरुष और बालकोंमें झूठ, कपट, हँसी, मजाक, विलासिता आदि दोष आ जाते हैं। अत: सर्वसाधारणको तो भागवतमें बतलायी हुई नवधा भक्ति* का साधन ही करना चाहिये।

जिन्हें माधुर्य रसवाली प्रेमलक्षणा भक्तिकी ही इच्छा हो उनको भी प्रथम नवधा भक्तिका अभ्यास करना चाहिये; क्योंकि बिना नवधा भक्तिका अभ्यास किये वह साधक प्रेमलक्षणा भक्तिका सच्चा पात्र नहीं बन सकता और उस प्रेमलक्षणा भक्तिका रहस्य भगवत्प्राप्त पुरुष ही बतला सकते हैं। इसलिये उस प्रेमलक्षणा भक्तिके जिज्ञासुओंको उन महापुरुषोंके सङ्ग और सेवाद्वारा उसका तत्त्व और रहस्य समझकर उसका साधन करना चाहिये।

गीतोक्त भक्तियुक्त कर्मयोगके साधकोंको तो भगवान्पर ही भरोसा रखकर सारी चेष्टाएँ करनी चाहिये। सब समय भगवान्को याद रखते हुए ही भगवान्में प्रेम होनेके उद्देश्यसे भगवान्की आज्ञाके अनुसार ही सारे कर्म करने चाहिये। अथवा अपनी बागडोर भगवान्के हाथमें सौंप देनी चाहिये,जिस प्रकार भगवान् करवावें वैसे ही कठपुतलीकी भाँति कर्म करे। इस प्रकार जो अपने आपको भगवान्के हाथमें सौंप देता है उसके द्वारा शास्त्रनिषिद्ध कर्म तो हो ही नहीं सकते। यदि शास्त्रविरुद्ध किञ्चिन्मात्र भी कर्म होता है तो समझना चाहिये कि हमारी बागडोर भगवान्के हाथमें नहीं है, कामके हाथमें है; क्योंकि अर्जुनके इस प्रकार पूछनेपर कि—

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष: ।अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजित:।।  (गीता ३। ३६)

‘हे कृष्ण ! यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुएकी भाँति किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है ?’ स्वयं भगवान्ने कहा—

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: । हाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥(गीता ३। ३७)

‘हे अर्जुन ! रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है, यह बहुत खानेवाला अर्थात् भोगोंसे कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है, इसको ही तू इस विषयमें वैरी जान।’

इसके अतिरिक्त शास्त्रानुकूल कर्मोमें भी उससे काम्य कर्म नहीं होते। यज्ञ, दान, तप और सेवा आदि सम्पूर्ण कर्म केवल निष्काम भावसे हुआ करते हैं। भगवदर्थ या भगवदर्पण कर्म करनेवाले पुरुषके द्वारा दृढ़ अभ्यास होनेपर भगवत्स्मृति होते हुए ही सारे कर्म होने लगते हैं। तभी तो भगवान्ने कहा है कि—

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।(गीता ८। ७)

‘इसलिये हे अर्जुन ! तू सब कालमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर।’

अतएव हमलोगोंको भी इसी प्रकार अभ्यास डालना चाहिये। भगवदर्थ या भगवदर्पण कर्म तो साक्षात् भगवान्की ही सेवा है। यह रहस्य समझनेके बाद उसे प्रत्येक क्रियामें प्रसन्नता और शान्ति ही मिलनी चाहिये। क्या पतिव्रता स्त्रीको कभी पतिके अर्थ या पतिके अर्पण किये हुए कर्मोंमें झंझट प्रतीत होता है ? यदि होता है तो वह पतिव्रता कहाँ ? कोई स्त्री पतिके नामका जप और स्वरूपका ध्यान तो करती है; किन्तु पतिकी सेवाको झंझट समझकर उससे जी चुराती है, वह क्या कभी पतिव्रता कही जा सकती है ? वह तो पतिव्रतधर्मको ही नहीं जानती। जो सच्ची पतिव्रता स्त्री होती है वह तो पतिको अपने हृदयमें रखती हुई ही पतिके आज्ञानुसार उसकी सेवा करती हुई हर समय पतिप्रेममें प्रसन्न रहती है। पतिकी प्रत्येक आज्ञाके पालनमें उसकी प्रसन्नता और शान्तिका ठिकाना नहीं रहता। फिर साक्षात् परमेश्वर—जैसे पतिकी आज्ञाके पालनमें कितनी प्रसन्नता और शान्ति होनी चाहिये। अतएव जिन्हें भगवदर्थ या भगवदर्पण कर्मोंमें झंझट प्रतीत होता है। वे न कर्मोंके, न भक्तिके और न भगवान्के ही तत्त्वको जानते हैं।

एक राजाका चपरासी राजाकी आज्ञाके अनुसार किसी भी राजकार्यको करता है तो उसे हर समय यह खयाल रहता है कि मैं राजाका कर्मचारी हूँ—राजाका चपरासी हूँ। फिर भगवान्की आज्ञाके अनुसार भगवत्-कार्य करनेवाले भगवद्भक्तको हर समय यह भाव क्यों नहीं रहना चाहिये कि मैं भगवान्का सेवक हूँ।

जो भगवत्कार्य करते हुए भगवान्को भूल जाते हैं वे खास करके सभी कार्योंको भगवान्के कार्य नहीं मानते, अपना कार्य मानने लग जाते हैं। इसी कारण वे भगवान्के नाम और रूपको भूल जाते हैं। अतएव साधकोंको दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिये कि सारे संसारके पदार्थ भगवान्के ही हैं। जैसे कोई भृत्य अपने स्वामीका कार्य करता है तो यही समझता है कि यह स्वामीका ही है, मेरा नहीं; अर्थात् स्वामीकी नौकरी करनेवाले उस भृत्यका क्रियाओंमें, उनके फलमें एवं पदार्थोंमें सदा सर्वदा यही निश्चय रहता है कि ये सब स्वामीके ही हैं। उसी प्रकार साधकको भी सम्पूर्ण पदार्थोंको, क्रियाओंको और अपने आपको परमात्माकी ही वस्तु समझनी चाहिये। साधारण स्वामीकी अपेक्षा परमात्मामें यह और विशेषता है कि परमात्मा प्रत्येक क्रिया और पदार्थोंमें व्याप्त होकर स्वयं स्थित है। इस प्रकार प्रत्येक पदार्थ और क्रियामें स्वामीका जो निश्चय और स्मरण है वह स्वामीका भजन ही है। इसलिये उपर्युक्त तत्त्वको जाननेवाले पुरुषको उस परमात्माकी विस्मृति होना सम्भव नहीं। यदि स्मृति निरन्तर नहीं होती तो समझना चाहिये कि वह तत्त्वको यथार्थरूपसे नहीं जानता। अतएव हमलोगोंको सम्पूर्ण संसारके रचयिता लीलामय परमात्माको सर्वदा और सर्वत्र व्याप्त समझते हुए उसकी आज्ञाके अनुसार उसके लिये ही कर्म करनेकी चेष्टा करनी चाहिये। इस प्रकारका अभ्यास करते-करते परमात्माका तत्त्व और रहस्य जान लेनेपर न तो कर्मोंमें उकताहट ही होगी और न भगवान्की विस्मृति ही होगी, बल्कि भगवत्के स्मरण और भगवदाज्ञाके पालनसे प्रत्येक क्रिया करते हुए शरीरमें प्रेमजनित रोमाञ्च होगा और पद-पदपर अत्यन्त प्रसन्नता और परम शान्तिका अनुभव होता रहेगा।

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* श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्  । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।।  (श्रीमद्भा ७। ५। २३)

  १. भगवान्के नाम और गुणोंका श्रवण, २. कीर्तन, ३. भगवान्का स्मरण, ४. भगवान्के चरणोंकी सेवा, ५. भगवद् विग्रहका पूजन, ६. भगवान्को प्रणाम करना, ७. अपनेको भगवान्का दास समझकर उनकी सेवामें तत्पर रहना, ८. अपनेको भगवान्का सखा मानकर उनसे प्रेम करना और ९. भगवान्को आत्मसमर्पण करना—यही नौ प्रकारकी भक्ति है।

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🌹: कृष्णा :: श्री राधा प्रेमी :🌹
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