गुरुवार, 26 जनवरी 2017

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🌹 "स्व:सत्" का भाव "असत् अहं" का अभाव :

एक बहुत सुगम बात है। उसे विचारपूर्वक गहरी रीतिसे समझ लें तो तत्काल तत्त्वमें स्थित हो जायँ। जैसे राजाका राज्यभरसे सम्बन्ध होता है, वैसे ही परमात्मतत्त्वका मात्र वस्तु, व्यक्ति, क्रिया आदिके साथ सम्बन्ध है। राजाका सम्बन्ध तो मान्यतासे है, पर परमात्माका सम्बन्ध वास्तविक है। हम परमात्माको भले ही भूल जायँ, पर उसका सम्बन्ध कभी नहीं छूटता। आप चाहे युग-युगान्तरतक भूले रहें तो भी उसका सम्बन्ध सबसे एक समान है। आपकी स्थिति जाग्रत्, स्वप्न या सुषुप्ति किसी अवस्थामें हो, आप योग्य हों या अयोग्य, विद्वान् हों या अनपढ़, धनी हों या निर्धन, परमात्माका सम्बन्ध सब स्थितियोंमें एक समान है। इसे समझनेके लिये युक्ति बताता हूँ। आप मानते हैं कि बालकपनमें था, अभी मैं हूँ और आगे वृद्धावस्थामें भी मैं रहूँगा। बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था—तीनोंका भेद होनेसे ‘था’, ‘हूँ’ और ‘रहूँगा’ ये तीन भेद हुए, पर अपने होनेपनमें क्या फर्क पड़ा ? भूत, वर्तमान और भविष्य— तीनोंमें अपना होनापन (सत्ता) तो एक ही रहा। अत: आप कैसे भी हों, कैसे भी रहें, आपकी सत्ता एक समान अखण्ड रहती है। आपका कभी अभाव नहीं होता। वह सत्ता ही शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिको सत्ता-स्फूॢत देती है। वह शरीरादिके आश्रित नहीं है। इससे यह सिद्ध हुआ कि आप हरदम ‘है’ में स्थित रहते हैं। जड़ वस्तु, क्रिया आदिका सम्बन्ध न रखकर ‘है’ से सम्बन्ध रखना है। यह जाग्रत्में सुषुप्ति है।

वह सत्ता मन, बुद्धि, इन्द्रियों, शरीरकी क्रियाओंमें अनुस्यूत है। वही मन, बुद्धि आदिका प्रकाशक, आधार है। उस सर्व-प्रकाशक, सर्वाधारमें हमें स्थित रहना है। वह सत्ता सदा ज्यों-की-त्यों रहती है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, स्थिरता, चंचलता, योग्यता, अयोग्यता, बालकपन, जवानी, वृद्धावस्था, विपत्ति, सम्पत्ति, विद्वत्ता, मूर्खता आदि सभी उस सत्तासे प्रकाश पाते हैं। वस्तुत: उसमें आपकी स्थिति स्वत:सिद्ध है। केवल उसकी ओर लक्ष्य, दृष्टि करनी है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिके साथ सम्बन्ध ही मोह है। इस मोहका नाश होनेपर स्मृति जाग्रत् हो जाती है—
‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’ (गीता १८। ७३)।
स्मृतिका अर्थ—जो बात पहलेसे ही थी, उसकी याद आ गयी। कोई नया ज्ञान होना स्मृति नहीं है। अब चाहे कुछ हो जाय, चाहे कोई व्यथा हमारा स्वरूप सच्चिदानन्द है आ जाय, अपनी सत्तामें क्या फर्क पड़ता है ? केवल अपनी सत्ताकी ओर दृष्टि करनी है, फिर इसी क्षण जीवन्मुक्ति है। इसमें कोई अभ्यास नहीं करना है।

सत्ताकी ओर दृष्टि न करें, तब भी वह वैसी-की-वैसी ही रहती है। पर उस ओर दृष्टि न करनेसे आप अपनी स्थिति क्रियाओं, पदार्थों, अवस्थाओं आदिमें मानते हैं। भोजन करते समय ‘मैं खाता हूँ’, जल पीते समय ‘मैं पीता हूँ’, जाते समय ‘मैं जाता हूँ’ आदि सब स्थितियों में ‘हूँ’ समान ही रहता है। यदि ‘मैं’ को हटा दें तो ‘हूँ’ नहीं रहेगा अपितु ‘है’ रहेगा। वह ‘है’ सदा ज्यों-का-त्यों रहता है।

खोया कहे सो बावरा पाया कहे सो कूर ।
पाया खोया कुछ नहीं ज्यों-का-त्यों भरपूर।।

इस ‘है’ में स्थित होते ही अखण्ड समाधि, जाग्रत् , सुषुप्ति हो जाती है।

              ....... 🌹संत प्रसादम्🌹

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शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

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🌹भगवद्दर्शनकी उत्कण्ठा :

( गत ब्लॉग से आगे )

भगवत्प्रेमकी अवस्था ही अनोखी होती है। भगवान्‌का प्रसंग चल रहा है, उनकी मधुर चर्चा चल रही है, उस समय यदि स्वयं भगवान् भी आ जायँ तो प्रसंग चलाता रहे, भंग न होने दे। प्रियतम-चर्चामें एक अद्‌भुत मिठास होती है, जिसकी चाट लग जानेपर और कुछ सुहाता ही नहीं। प्रीतिकी रीति अनोखी है। प्रभुकी प्रीतिका रस जिसने पा लिया उसे और पाना ही क्या रहा? प्रभु तो केवल प्रेम देखते हैं। स्वयं प्रभुसे बढ़कर प्रभुका प्रेम है। श्रद्धा-भक्तिपूर्वक प्रभुके गुण, प्रभाव, तत्त्व तथा रहस्यसहित ध्यानमें तन्मय होकर प्रभुके प्रेमामृतका पान करना ही प्रभुकी प्रीतिका आस्वादन करना है या हरिके रसमें डूबना है।

दो प्रेमियोंमें यदि न बोलनेकी शर्त लग जाय तो अधिक प्रेमवाला ही हारेगा। पति-पत्नीमें यदि न बोलनेका हठ हो जाय तो वही हारेगा जिसमें अधिक स्नेह होगा। इसी प्रकार जब भक्त और भगवान्‌में होड़ होती है तो भगवान्‌को ही हारना पड़ता है, क्योंकि प्रभुसे बढ़कर प्रेमी कोई नहीं है। उन्हें इतना व्याकुल कर देना चाहिये कि हमारे बिना वे एक क्षण भी न रह सकें। फिर उन्हें हार माननी ही पड़ेगी – आनेके लिये बाध्य होना ही पड़ेगा। हमें व्यवस्था ही ऐसी कर देनी चाहिये, प्रेमसे उन्हें मोहित कर देना चाहिये। फिर तो धक्का देनेपर भी वे नहीं हटेंगे।

प्रभुके साथ हमारा व्यवहार वैसा ही होना चाहिये जैसा स्त्रीका अपने पतिके साथ। जैसे स्त्री अपने प्रेम और हाव-भावसे पतिको मोहित कर लेती है वैसे ही हमें भगवान्‌को अपने प्रेम और आचरणसे मोहित कर लेना चाहिये। उसे अपनेमें आसक्त भी कर ले और खुशामद भी न करे। फिर तो वह एक पलके लिये भी हमारे द्वारपरसे हटनेका नहीं। वह प्रेमका भिखारी प्रेमका बंदी बना बैठा है, जायगा कहाँ? पति पत्नीके प्यारको ठुकरा ही कैसे सकता है? इसी प्रकार प्रभु भी अपने भक्तके प्यारका तिरस्कार कैसे कर सकते हैं? ऐसा हो जानेपर उनसे हमारे बिना रहा ही कैसे जायगा? वे तो सदा प्रेमके अधीन रहते हैं। एक बार प्रभुको अपने प्रेम-पाशमें बाँध ले, फिर तो वे सदाके लिये बँध जाते हैं।

प्रभुको वशीभूत करनेका ढंग स्त्रीसे सीखना चाहिये। इसी प्रकारका सम्बन्ध उनसे जोड़ना चाहिये। यही माधुर्यभाव है। बाहरका वेष न बदले, भीतर प्रेमकी प्रगाढ़तामें उसीका बन जाय। यही उन्हें प्राप्त करनेका सर्वोत्तम उपाय है।

प्रभु बड़े दयालु और उदारचित्त हैं। इसलिये थोड़े प्रेमसे भी वे प्राप्त हो सकते हैं, किन्तु हमलोगोंको उपर्युक्त प्रेमको लक्ष्य बनाकर ही चलना चाहिये। क्योंकि उच्च लक्ष्य बनाकर चलनेसे ही प्रेमकी प्राप्ति होती है। यदि लक्ष्यके अनुसार पूर्ण प्रेम हो जाय तब तो अत्यन्त सौभाग्यकी बात है; ऐसे पुरुष तो आदर्श एवं दर्शनीय समझे जाते हैं, उनके कृपाकटाक्षसे दूसरे भी कृतकृत्य हो जाते हैं; फिर उनकी तो बात ही क्या?
               ..... 🌹संत वचनामृतम्🌹

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🌹भगवद्दर्शनकी उत्कण्ठा :

( गत ब्लॉग से आगे )

भगवान्‌के दर्शनमें जो विलम्ब हो रहा है उसका एकमात्र कारण दृढ़ श्रद्धा-विश्वासका अभाव ही है। चाहे जिस प्रकार निश्चय हो जाय, निश्चय हो जानेपर भगवान् न आवे ऐसा हो नहीं सकता। वे अपने भक्तोंको निराश नहीं करते, यही उनका बाना है। यह दूसरी बात है कि बीच-बीचमें हमारे मार्गमें ऐसे विघ्न आ खड़े हों जिनके कारण हमारा मन विचलित-सा हो जाय। परन्तु यदि साधक उस समय सँभलकर प्रभुको दृढ़तापूर्वक पकड़े रहे और विघ्नोंसे प्रह्लादकी भाँति न घबड़ाये तो उसका काम अवश्य ही बन जाता है। प्रभु तो हमारी श्रद्धाको पक्की करनेके लिये ही कभी निष्ठुर और कभी कोमल व्यवहार और व्यवस्था किया करते हैं।

वास्तविक श्रद्धा इतनी बलवती होती है कि भगवान्‌को बाध्य होकर उस श्रद्धाको फलीभूत करनेके लिये प्रकट होना पड़ता है। पारस यदि पारस है और लोहा यदि लोहा है तो स्पर्श होनेपर सोना होगा ही। उसी प्रकार श्रद्धावान्‌को भगवान्‌की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु भक्तकी कमीकी पूर्ति करके भगवान् उसके कार्यको सिद्ध कर देते हैं। श्रद्धा होनेपर सारी कमीकी पूर्ति भगवान्‌की कृपासे अपने-आप हो जाती है। हमलोगोंमें श्रद्धा-प्रेमकी कमी मालूम होती है, इसीलिये भगवान् प्रकट नहीं होते। अन्यथा उनके दयालु और प्रेमपूर्ण स्वभावको देखते हुए तो वे दर्शन दिये बिना रह सकें ऐसा हो नहीं सकता। रावणके द्वारा सीताके हरे जानेपर उसके लिये श्रीराम ऐसे व्याकुल होते हैं जैसे कोई कामी पुरुष अपनी प्रेयसीके लिये होता है। इसका कारण क्या था? कारण यही था कि सीता एक क्षणके लिये भी रामके बिना नहीं रह सकती थी। भगवान् कहते हैं – जो मुझको जैसे भजते हैं उनको भी मैं वैसे ही भजता हूँ।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।(गीता ४।११)

भगवान् तो प्रकट होनेके लिये तैयार हैं। वे मानो चाहते हैं कि लोग मुझसे प्रेम करें और मैं प्रकट होऊँ। सीताका जैसा उत्कट प्रेम भगवान् रामचन्द्रमें था वैसा ही प्रेम यदि हमलोगोंका प्रभुमें हो जाय तो प्रभु हमारे लिये भी तैयार हैं। जो हरिके लिये लालायित है उसके लिये हरि भी वैसे ही लालायित रहते हैं।

प्रभुमें श्रद्धा-प्रेम बढ़े, उनका चिन्तन बना रहे – एक पलके लिये भी उनका विस्मरण न हो, ऐसा ही लक्ष्य हमारा सदा बना रहना चाहिये। हमें वे चाहे जैसे रखें और चाहे जहाँ रखें, उनकी स्मृति अटल बनी रहनी चाहिये। उनकी राजीमें ही अपनी राजी, उनके सुखमें ही अपना सुख मानना चाहिये। प्रभु यदि हमें नरकमें रखना चाहें तो हमें वैकुण्ठकी ओर भी नहीं ताकना चाहिये और नरकमें वास करनेमें ही परम आनन्द मानना चाहिये। सब प्रकारसे प्रभुकी शरण हो जानेपर फिर उनसे इच्छा या याचना करना नहीं बन सकता। जब प्रभु हमारे और हम प्रभुके हो गये तो फिर बाकी क्या रहा? हम तो प्रभुके बालक हैं। माँ बालकके दोषोंपर ध्यान नहीं देती। उसके हृदयमें बालकके लिये अपार प्यार रहता है। प्रभु यदि हमारे दोषोंका खयाल करें तो हमारा कहीं पता ही न लगे। प्रभु तो इस बातके लिये सदा उत्सुक रहते हैं कि कोई रास्ता मिले तो मैं प्रकट होऊँ। किन्तु हमीं लोग उनके प्रकट होनेमें बाधक हो रहे हैं। देखनेमें तो ऐसी बात नहीं मालूम होती, ऊपरसे हम उनके दर्शनके लिये लालायित-से दीखते हैं; परन्तु भीतरसे उन्हें पानेकी लालसा कहाँ है? मुँहसे हम भले ही न कहें कि अभी ठहरो, परन्तु हमारी क्रियासे यही सिद्ध होता है। प्रभुके प्रकट होनेमें विलम्ब सहन करना ही उन्हें ठहराना है। प्रभुसे हमारा विछोह इसीलिये हो रहा है कि उनके वियोग (विछोह)-में हमें व्याकुलता नहीं होती। जब हम ही उनका वियोग सहनेके लिये तैयार हैं और कभी उनके वियोगमें हमारे मनमें व्याकुलता या दुःख नहीं होता, तब प्रभुको ही क्यों परवा होने लगी? यदि हमारे भीतर तड़पन होती और इसपर भी वे न आते तो हमें कहनेके लिये गुंजाइश थी। खुशीसे हम उनके बिना जी रहे हैं। इस हालतमें वे यदि न आवे तो इसमें उनका क्या दोष है? प्रकट होनेके लिये तो वे तैयार हैं, पर जबतक हमारे अंदर उत्सुकता नहीं होती तबतक वे आवे भी कैसे? उनका दर्शन प्राप्त करनेके लिये आवश्यकता है प्रबल चाहकी। वह चाह कैसी होनी चाहिये, इस बातको प्रभु ही पहचानते हैं। जिस चाहसे वे प्रकट हो जाते हैं वही चाह असली चाह समझनी चाहिये। अत: जबतक वे न आयें चाह बढ़ाता ही रहे। घड़ा भर जानेपर पानी अपने-आप ऊपरसे बह चलेगा।

( शेष आगे के ब्लॉग में )

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🌹भगवद्दर्शनकी उत्कण्ठा :

बहुत-से लोग कहा करते हैं कि यथाशक्ति चेष्टा करनेपर भी भगवान् हमें दर्शन नहीं देते। वे लोग भगवान्‌को ‘निष्ठुर, कठोर’ आदि शब्दोंसे सम्बोधित किया करते हैं तथा ऐसा मान बैठे है कि उनका हृदय वज्रका-सा है और वे कभी पिघलते ही नहीं। उन्हें क्या पड़ी है कि वे हमारी सुध लें, हमें दर्शन दें और हमें अपनायें –  ऐसी ही शिकायत बहुत-से लोगोंकी रहती है।

परन्तु बात है बिलकुल उलटी। हमारे ऊपर प्रभुकी अपार दया है। वे देखते रहते हैं कि जरा भी गुंजाइश हो तो मैं प्रकट होऊँ, थोड़ा भी मौका मिले तो भक्तको दर्शन दूँ। साधनाके पथमें वे पद-पदपर हमारी सहायता करते रहते हैं। लोकमें भी यह देखा जाता है कि जहाँ विशेष लगाव होता है, जिस पुरुषका हमारे प्रति विशेष आकर्षण होता है उनके पास और सब काम छोड़कर भी हमें जाना पड़ता है। जहाँ नहीं जाना होता वहाँ प्राय: यही मानना चाहिये कि प्रेमकी कमी है, जब हम साधारण मनुष्योंकी भी यह हालत है तब भगवान्, जो प्रेम और दयाके अथाह सागर हैं, यदि थोड़ा प्रेम होनेपर भी हमें दर्शन देनेके लिये तैयार रहें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है?

भगवान्‌के प्रकट होनेमें जो विलम्ब हो रहा है उसमें मुख्य कारण हमारी लगनकी कमी ही है। प्रभु तो प्रेम और दयाकी मूर्ति ही हैं। फिर वे आनेमें विलम्ब क्यों करते हैं? कारण स्पष्ट है। हम उनके दर्शनके लायक नहीं हैं। हममें अभी श्रद्धा और प्रेमकी बहुत कमी है। यदि हम उसके लायक होते तो भगवान् स्वयं आकर हमें दर्शन देते; क्योंकि भगवान् परमदयालु, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् अरि सर्वान्तर्यामी हैं। किन्तु हमारे अंदर उनके प्रति श्रद्धा और प्रेमकी बहुत ही कमी है। अतएव श्रद्धा और प्रेमकी वृद्धिके लिये हमें उनके तत्त्व, रहस्य, गुण और प्रभावको जाननेकी प्राणपर्यन्त चेष्टा करनी चाहिये। भगवान्‌में श्रद्धा और प्रेम हो जानेपर वे न मिलें ऐसा कभी हो नहीं सकता। बाध्य होकर भगवान् अपने श्रद्धालु भक्तकी श्रद्धाको फलीभूत करते ही हैं। जबतक उनकी कृपापर पूरा विश्वास नहीं होता तबतक प्रभुका प्रसाद हमें कैसे प्राप्त हो सकता है? यदि हमारा यह विश्वास हो जाय कि भगवान्‌के दर्शन होते हैं और अमुक व्यक्तिने भगवान्‌के दर्शन किये हैं, तो उसके साथ हमारा व्यवहार कैसा होगा, इसका भी हमलोग अनुमान नहीं कर सकते। फिर स्वयं भगवान्‌के मिलनेसे जो दशा होती है, उसका तो अंदाजा लगाना ही असम्भव है।

रासलीलाके समय भगवान्‌के अन्तर्धान हो जानेपर गोपियोंकी कैसी दशा हुई? एक क्षणके लिये भी उन्हें भगवान्‌का वियोग असह्य हो गया, अतएव बाध्य होकर भगवान्‌को प्रकट होना पड़ा। दुर्वासाके दस हजार शिष्योंसहित भोजनके लिये असमयमें उपस्थित होनेपर, उन्हें भोजन करानेका कोई उपाय न दीखनेपर, द्रौपदी व्याकुल होकर भगवान्‌का स्मरण करने लगी और उसके पुकारते ही भगवान् इस प्रकार प्रकट हो गये जैसे मानो वहीं खड़े हों। विश्वास होनेसे प्राय: यही अवस्था सभी भक्तोंकी होती है। भक्त नरसी मेहताको दृढ़ विश्वास था कि उसकी लड़कीका भात भरनेके लिये हरि आयेंगे ही और वे मगन होकर गाने लगे ‘बाई आसी आसी आसी, हरि घणै भरोसे आसी।’ हरिके आनेमें उन्हें तनिक भी शंका नहीं थी। अतएव भगवान्‌को समयपर आना ही पड़ा।

( शेष आगे के ब्लॉग में )

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गुरुवार, 19 जनवरी 2017

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🌹भौतिक भोग एवं दैनिक क्रियाकलाप में बंधा हुआ मन भगवद् ध्यानसाधना में केसे प्रवत्त हो ?

( गत ब्लॉग से आगे )

💐 प्रिय भगवद्जन .....

ध्यानयोगाभ्यास में समाधि की सर्वोच्च अवस्था भगवद्भावनामृत है। केवल इस ज्ञान से कि भगवान प्रत्येक जन के हृदय में परमात्मा रूप में उपस्थित हैं ध्यानस्थ योगी निर्दोष हो जाता है। वेदों में (गोपालतापनी उपनिषद् १.२१) भगवान् की इस अचिन्त्य शक्ति की पुष्टि इस प्रकार होती है –
 एकोऽपि सन्बहुधा योऽवभाति– “यद्यपि भगवान् एक हैं, किन्तु वह जितने सारे हृदय हैं उनमें उपस्थित रहते है।” इसी प्रकार स्मृति शास्त्र का कथन है।–

एक एव परो विष्णुः सर्वव्यापी न संशयः |
ऐश्र्वर्याद् रुपमेकं च सूर्यवत् बहुधेयते ||

“विष्णु एक हैं फिर भी वे सर्वव्यापी हैं । एक रूप होते हुए भी वे अपनी अचिन्त्य शक्ति से सर्वत्र उपस्थित रहते हैं, जिस प्रकार सूर्य एक ही समय अनेक स्थानों में दिखता है।” अत: ध्यानयोग साधना में सदैव इस बात का स्मर्ण रखना चाहिये ।

प्रियजन .... मन की चंचलता या अस्थिरता उसकी नेष्ठिक प्रवत्ती है। जिसे मिटाया नहीं जा सकता है। किंतु उसे एक विशेष धारणा या सभी में भगवद्भावना रखकर बदला जा सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार -

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ||

जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है उसके लिए न तो मैं कभी अदृश्य होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है |

जड-चेतनमय जो दृश्य जगत है।सर्वत्र भगवान है। अत: ध्यानयोग साधना में रत साधक को मन खुला छोड देना चाहिये मन जहां भी जाऐ जाने दें , आँखों में जो भी दृश्य दिखाई दे दिखने दें बस मन की भावना बदल दे जो भी दिख रहा है। उसे भगवद् स्वरूप समझना चाहिये , दिखाई देने वाला दृश्य चाहे उच्च कोटि का हो चाहे हीन कोटि का साधक को ना ही उच्चता या सुंदरता के प्रलोभन में फसना है। और ना ही दृश्य को हीन समझकर घृणां करना है। बस उसी दृश्य को भगवद् स्वरूप समझकर प्रणामकर अपना प्रेमभाव अर्पण करना है। साधक के मन में जो भी विचार , स्मृति , ज्ञान या दृश्य उभरते है। सभी में भगवद् प्रेरणा होती है। यथा-

सर्वस्य चाहं ह्रदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च |

मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझ से ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति होती है।
             ( श्रीमद्भगवद्गीता )

प्रियजन .... साधक द्वारा निरंतर सभी में भगवद्भावना व चिंतन रखने पर स्मृति में आने वाले समस्त विचार एवं दिखाई देने समस्त दृश्य भगवद्भाव में परिवर्तित हो जाते है। जिस तरह की भृंगी द्वार बद्ध जीव निरंतर चिंतन से भृंगी में ही परावर्तित हो जाता है।

ध्यानयोग साधना की पूर्णता में साधक हृदय में भगवद्भावना एवं सर्वत्र भगवद्स्वरूप का ही दर्शन करने लगता है।-

सर्वभूतस्थमात्मनं सर्वभूतानि चात्मनि |
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ||

वास्तविक ध्यानस्थयोगी समस्त जीवों में मुझको तथा मुझमें समस्त जीवों को देखता है। निस्सन्देह स्वरूपसिद्ध व्यक्ति मुझ परमेश्र्वर को सर्वत्र देखता है।
             ( श्रीमद्भगवद्गीता )

भक्तिमय ध्यानयोग के सम्बन्ध में रूप गोस्वामी का कथन है –

उत्साहान्निश्र्चयाध्दैर्यात् तत्तत्कर्म प्रवर्तनात् |
संगत्यागात्सतो वृत्तेः षङ्भिर्भक्तिः प्रसिद्धयति ||

“मनुष्य पूर्ण हार्दिक उत्साह, धैर्य तथा संकल्प के साथ भक्तियोग का पूर्णरूपेण पालनकर निर्धारित कर्मों के करने तथा सत्कार्यों में पूर्णतया लगे रहने से स्वरूपसिद्ध होकर भगवान को प्राप्त कर सकता है |” (उपदेशामृत– ३)

         ...... ✍🏻 : कृष्णा :: श्री राधा प्रेमी :

नोट : कृपया भगवद्भक्त साधकजन अपनी शंका या प्रश्न का मैसेज अपने शुभ नाम के साथ हमारे मो.नं. 9009290042 पर ही शेयर करें , समूहों की अधिकता व समय की न्यूनता की वजह से हम आपके प्रश्न या शंकाओं को समूहों में ज्यादातर नही देख पाते है। आपके प्रश्नो का समाधान समय मिलते ही श्री राधेरानी की कृपा से हम आपके नं. एवं श्री समूह में शेयर करगें 💐🙏🏻

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🌹भौतिक भोग एवं दैनिक क्रियाकलाप में बंधा हुआ मन भगवद् ध्यानसाधना में कैसे प्रवत्त हो ?

💐 प्रिय भगवद्जन ....

आपके प्रश्नानुसार ....

🌹हमें ध्यान किस प्रकार करना चाहिए, क्योंकि ध्यान करते समय मन में तरह तरह कि बातें आती है, जो ध्यान को भंग कर देती है ?

प्रियजन .... योगाभ्यास ( ध्यान ) करने में साधक को मन तथा इन्द्रियों के निग्रह के साथ-साथ अन्य कई समस्याओं का सामना करना पडता है। भौतिक जगत् में साधना में तत्पर साधक जीवात्मा मन तथा इन्द्रियों के द्वारा सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। वास्तव में शुद्ध जीवात्मा इस भौतिक संसार में इसीलिए फँसा हुआ है क्योंकि मन मिथ्या अहंकार में लगकर प्रकृति के प्रभाव में होते हुए भी प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व जताना चाहता है। जो कि असाध्य है। जीव को मन का निग्रह इस प्रकार  करना चाहिए कि वह प्रकृति की तड़क-भड़क एवं भोग-विलास से आप्लावित छटा को क्षणिक एवं अस्थिर जान आकृष्ट न हो और इस तरह बद्ध जीवात्मा स्वयं की रक्षा कर सके । साधक भक्त को इन्द्रियविषयों से आकृष्ट होकर अपने को पतित नहीं करना चाहिए । जो जितना ही इन्द्रियजनित विषयों के प्रति आकृष्ट होता है वह उतना ही इस संसार में फँसता जाता है । अपने को विरत करने का सर्वोत्कृष्ट साधन यही है कि मन को सदैव भगवद्भावना में निरत रखा जाय ।

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार -

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः |
अनात्मस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ||

जिसने मन को जीत लिया है उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया इसके लिए मन सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा ।

अमृतबिन्दु उपनिषद् में कहा भी गया है –

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः|
बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः ||

“मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का भी कारण है। इन्द्रियविषयों में लीन मन भवबन्धन का कारण है और विषयों से विरक्त मन मोक्ष का कारण है।” अतः जो मन निरन्तर भगवद्भावना में लगा रहता है, वही परम मुक्ति का कारण है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ध्यानयोगाभ्यास का साधन इस प्रकार वर्णित है।-

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः |
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ||

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः |
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविश्रुद्धये ||

ध्यानयोगाभ्यास के लिए साधक  एकान्त स्थान में जाकर भूमि पर कुशा बिछा दे और फिर ऊपर से मृगछाल अथवा मुलायम शुद्धवस्त्र बिछा दे । आसन न तो बहुत ऊँचा हो, न बहुत नीचा । यह पवित्र स्थान में स्थित हो । साधक को चाहिए कि इस पर दृढ़तापूर्वक बैठ जाय और मन, इन्द्रियों तथा कर्मों को वश में करते हुए तथा मन को एक बिन्दु पर स्थित करके हृदय को शुद्ध करने के लिए ध्यानयोगाभ्यास करे ।

समं कायशिरोग्रीवं धार्यन्नचलं स्थिरः |
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्र्चानवलोकयन् ||

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः |
मनः संयम्य मच्चितो युक्त आसीत मत्परः ||

ध्यानयोग साधना करने वाले को चाहिए कि वह अपने शरीर, गर्दन तथा सर को सीधा रखे और नाक के अगले सिरे पर दृष्टि लगाए । इस प्रकार वह अविचलित तथा दमित मन से, भयरहित, विषयीजीवन से पूर्णतया मुक्त होकर अपने हृदय में मेरा चिन्तन करे और मुझे हि अपना चरम लक्ष्य बनाए ।

साधना में तत्पर साधक को अपने आहार व नियमादिक का भी ध्यान रखना चाहिये -

नात्यश्र्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः|
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ||

हे अर्जुन! जो अधिक खाता है या बहुत कम खाता है, जो अधिक सोता है अथवा जो पर्याप्त नहीं सोता उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है ।

प्रियजन ... जैसा कि प्रश्न है। इस भौतिक जीव जगत में दैनिक क्रियाकलापो में बद्ध साधक ध्यान करने में "श्रीमद्भगवद्गीता" में उल्लेखित साधनानुसार तत्पर नहीं हो पाता है। अत: इसके लिए हम आपको श्री राधेरानी की कृपा से सरल व सुगम ध्यानसाधना विधी वर्णित करते है।

( शेष आगे के ब्लॉग में )

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🌹भगवत्प्राप्तिके चार साधनोंकी सुगमताका रहस्य :

( गत ब्लॉग से आगे )

परमेश्वर और उसकी प्राप्तिके साधनोंमें श्रद्धा और प्रेमकी कमी होनेके कारण ही साधन करने में साधकों को उत्साह नहीं होता। आरामतलब स्वभावके कारण आलस्य और अकर्मण्यता बढ़ जाती है इसीसे उन्हें परम शान्ति और परमानन्दकी प्राप्ति नहीं होती। इसलिये श्रीमद्भागवतमें बतलायी हुई नवधा भक्तिका तत्त्व-रहस्य महापुरुषोंसे समझकर श्रद्धा और प्रेमपूर्वक तत्परताके साथ भक्तिका साधन करना चाहिये।

भगवान्के रासका विषय तो अत्यन्त ही गहन है। भगवान् और भगवान्की क्रीडा दिव्य, अलौकिक, पवित्र, प्रेममय और मधुर है। जो माधुर्यरसके रहस्यको जानता है, वही उससे लाभ उठा सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण और गोपियोंकी जो असली रासक्रीडा थी, उसको तो जाननेवाले ही संसारमें बहुत कम हैं। उनकी वह क्रीडा अति पवित्र, अलौकिक और अमृतमय थी। वर्तमानमें होनेवाले रासमें तो बहुत-सी कल्पित बातें भी आ जाती हैं तथा अधिकांशमें रास करनेवाले आॢथक दृष्टिसे ही करते हैं। उनका उद्देश्य दर्शकोंको प्रसन्न करना ही रहता है। इसलिये दर्शकोंके चित्तपर यह असर पड़ता है कि भगवान् भी ये सब आचरण किया करते थे। तथा यह बात स्वाभाविक ही है कि साधक जो इष्टमें देखता है, वह बात उसमें भी आ जाती है। भगवान्के तत्त्व और रहस्यको न जाननेके कारण उनकी प्रेममय लीला काममय दीखने लगती है और निर्दोष बात दोषयुक्त प्रतीत होने लगती है। इस कारण ही देखनेवाले किसी-किसी स्त्री-पुरुष और बालकोंमें झूठ, कपट, हँसी, मजाक, विलासिता आदि दोष आ जाते हैं। अत: सर्वसाधारणको तो भागवतमें बतलायी हुई नवधा भक्ति* का साधन ही करना चाहिये।

जिन्हें माधुर्य रसवाली प्रेमलक्षणा भक्तिकी ही इच्छा हो उनको भी प्रथम नवधा भक्तिका अभ्यास करना चाहिये; क्योंकि बिना नवधा भक्तिका अभ्यास किये वह साधक प्रेमलक्षणा भक्तिका सच्चा पात्र नहीं बन सकता और उस प्रेमलक्षणा भक्तिका रहस्य भगवत्प्राप्त पुरुष ही बतला सकते हैं। इसलिये उस प्रेमलक्षणा भक्तिके जिज्ञासुओंको उन महापुरुषोंके सङ्ग और सेवाद्वारा उसका तत्त्व और रहस्य समझकर उसका साधन करना चाहिये।

गीतोक्त भक्तियुक्त कर्मयोगके साधकोंको तो भगवान्पर ही भरोसा रखकर सारी चेष्टाएँ करनी चाहिये। सब समय भगवान्को याद रखते हुए ही भगवान्में प्रेम होनेके उद्देश्यसे भगवान्की आज्ञाके अनुसार ही सारे कर्म करने चाहिये। अथवा अपनी बागडोर भगवान्के हाथमें सौंप देनी चाहिये,जिस प्रकार भगवान् करवावें वैसे ही कठपुतलीकी भाँति कर्म करे। इस प्रकार जो अपने आपको भगवान्के हाथमें सौंप देता है उसके द्वारा शास्त्रनिषिद्ध कर्म तो हो ही नहीं सकते। यदि शास्त्रविरुद्ध किञ्चिन्मात्र भी कर्म होता है तो समझना चाहिये कि हमारी बागडोर भगवान्के हाथमें नहीं है, कामके हाथमें है; क्योंकि अर्जुनके इस प्रकार पूछनेपर कि—

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष: ।अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजित:।।  (गीता ३। ३६)

‘हे कृष्ण ! यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुएकी भाँति किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है ?’ स्वयं भगवान्ने कहा—

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: । हाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥(गीता ३। ३७)

‘हे अर्जुन ! रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है, यह बहुत खानेवाला अर्थात् भोगोंसे कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है, इसको ही तू इस विषयमें वैरी जान।’

इसके अतिरिक्त शास्त्रानुकूल कर्मोमें भी उससे काम्य कर्म नहीं होते। यज्ञ, दान, तप और सेवा आदि सम्पूर्ण कर्म केवल निष्काम भावसे हुआ करते हैं। भगवदर्थ या भगवदर्पण कर्म करनेवाले पुरुषके द्वारा दृढ़ अभ्यास होनेपर भगवत्स्मृति होते हुए ही सारे कर्म होने लगते हैं। तभी तो भगवान्ने कहा है कि—

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।(गीता ८। ७)

‘इसलिये हे अर्जुन ! तू सब कालमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर।’

अतएव हमलोगोंको भी इसी प्रकार अभ्यास डालना चाहिये। भगवदर्थ या भगवदर्पण कर्म तो साक्षात् भगवान्की ही सेवा है। यह रहस्य समझनेके बाद उसे प्रत्येक क्रियामें प्रसन्नता और शान्ति ही मिलनी चाहिये। क्या पतिव्रता स्त्रीको कभी पतिके अर्थ या पतिके अर्पण किये हुए कर्मोंमें झंझट प्रतीत होता है ? यदि होता है तो वह पतिव्रता कहाँ ? कोई स्त्री पतिके नामका जप और स्वरूपका ध्यान तो करती है; किन्तु पतिकी सेवाको झंझट समझकर उससे जी चुराती है, वह क्या कभी पतिव्रता कही जा सकती है ? वह तो पतिव्रतधर्मको ही नहीं जानती। जो सच्ची पतिव्रता स्त्री होती है वह तो पतिको अपने हृदयमें रखती हुई ही पतिके आज्ञानुसार उसकी सेवा करती हुई हर समय पतिप्रेममें प्रसन्न रहती है। पतिकी प्रत्येक आज्ञाके पालनमें उसकी प्रसन्नता और शान्तिका ठिकाना नहीं रहता। फिर साक्षात् परमेश्वर—जैसे पतिकी आज्ञाके पालनमें कितनी प्रसन्नता और शान्ति होनी चाहिये। अतएव जिन्हें भगवदर्थ या भगवदर्पण कर्मोंमें झंझट प्रतीत होता है। वे न कर्मोंके, न भक्तिके और न भगवान्के ही तत्त्वको जानते हैं।

एक राजाका चपरासी राजाकी आज्ञाके अनुसार किसी भी राजकार्यको करता है तो उसे हर समय यह खयाल रहता है कि मैं राजाका कर्मचारी हूँ—राजाका चपरासी हूँ। फिर भगवान्की आज्ञाके अनुसार भगवत्-कार्य करनेवाले भगवद्भक्तको हर समय यह भाव क्यों नहीं रहना चाहिये कि मैं भगवान्का सेवक हूँ।

जो भगवत्कार्य करते हुए भगवान्को भूल जाते हैं वे खास करके सभी कार्योंको भगवान्के कार्य नहीं मानते, अपना कार्य मानने लग जाते हैं। इसी कारण वे भगवान्के नाम और रूपको भूल जाते हैं। अतएव साधकोंको दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिये कि सारे संसारके पदार्थ भगवान्के ही हैं। जैसे कोई भृत्य अपने स्वामीका कार्य करता है तो यही समझता है कि यह स्वामीका ही है, मेरा नहीं; अर्थात् स्वामीकी नौकरी करनेवाले उस भृत्यका क्रियाओंमें, उनके फलमें एवं पदार्थोंमें सदा सर्वदा यही निश्चय रहता है कि ये सब स्वामीके ही हैं। उसी प्रकार साधकको भी सम्पूर्ण पदार्थोंको, क्रियाओंको और अपने आपको परमात्माकी ही वस्तु समझनी चाहिये। साधारण स्वामीकी अपेक्षा परमात्मामें यह और विशेषता है कि परमात्मा प्रत्येक क्रिया और पदार्थोंमें व्याप्त होकर स्वयं स्थित है। इस प्रकार प्रत्येक पदार्थ और क्रियामें स्वामीका जो निश्चय और स्मरण है वह स्वामीका भजन ही है। इसलिये उपर्युक्त तत्त्वको जाननेवाले पुरुषको उस परमात्माकी विस्मृति होना सम्भव नहीं। यदि स्मृति निरन्तर नहीं होती तो समझना चाहिये कि वह तत्त्वको यथार्थरूपसे नहीं जानता। अतएव हमलोगोंको सम्पूर्ण संसारके रचयिता लीलामय परमात्माको सर्वदा और सर्वत्र व्याप्त समझते हुए उसकी आज्ञाके अनुसार उसके लिये ही कर्म करनेकी चेष्टा करनी चाहिये। इस प्रकारका अभ्यास करते-करते परमात्माका तत्त्व और रहस्य जान लेनेपर न तो कर्मोंमें उकताहट ही होगी और न भगवान्की विस्मृति ही होगी, बल्कि भगवत्के स्मरण और भगवदाज्ञाके पालनसे प्रत्येक क्रिया करते हुए शरीरमें प्रेमजनित रोमाञ्च होगा और पद-पदपर अत्यन्त प्रसन्नता और परम शान्तिका अनुभव होता रहेगा।

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* श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्  । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।।  (श्रीमद्भा ७। ५। २३)

  १. भगवान्के नाम और गुणोंका श्रवण, २. कीर्तन, ३. भगवान्का स्मरण, ४. भगवान्के चरणोंकी सेवा, ५. भगवद् विग्रहका पूजन, ६. भगवान्को प्रणाम करना, ७. अपनेको भगवान्का दास समझकर उनकी सेवामें तत्पर रहना, ८. अपनेको भगवान्का सखा मानकर उनसे प्रेम करना और ९. भगवान्को आत्मसमर्पण करना—यही नौ प्रकारकी भक्ति है।

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🌹भगवत्प्राप्तिके चार साधनोंकी सुगमताका रहस्य :

ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग आदि साधन करनेके विषयमें उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र, योगदर्शन, श्रीमद्भागवत और गीता आदि शास्त्रोंको देखनेपर अधिकांश मनुष्योंको चित्तमें अनेक प्रकारकी शङ्काएँ उठा करती हैं और किसी-किसीके चित्तमें तो ङ्क्षककर्तव्यविमूढ़ताका-सा भाव आ जाता है।

उपनिषद् और ब्रह्मसूत्रको देखकर जब वेदान्तके सिद्धान्तके अनुसार साधक जगत्को स्वप्नवत् समझता हुआ सम्पूर्ण सङ्कल्पोंका यानी स्फुरणामात्रका और जिन वृत्तियोंसे संसारके चित्रोंका अभाव किया, उनका भी त्याग करके केवल एक सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें अभेदरूपसे नित्य-निरन्तर स्थित रहनेका अभ्यास करता है, तब आलस्यके कारण चित्तकी वृत्तियाँ मायामें विलीन हो जाती हैं और साधक कृतकार्य नहीं होने पाता। ऐसी अवस्थामें विचारवान् पुरुष भी चिन्तातुर-सा हो जाता है। बहुत-से जो इस तत्त्वको नहीं जानते हैं वे तो इस लय-अवस्थाको ही समाधि समझकर अपनी ब्रह्ममें स्थिति मान बैठते हैं। उस सुषुप्तिका जो तामस सुख है उसको ही वे ब्रह्मप्राप्तिका

सुख मानकर गाढ़ निद्रामें अधिक सोना ही पसंद करते हैं। जो इस प्रकार भ्रमसे निद्रासुखको मानते हुए विशेष समय सोनेमें ही बिता देते हैं, अज्ञानके कारण उनका जीवन नष्टप्राय हो जाता है। किन्तु जो विवेकशील इस निद्राके सुखको तामस सुख मानते हुए इस लयदोषसे अपनेको बचाना चाहते हैं, वे भी बलात् आलस्य और निद्राके शिकार बन जाते हैं। अतएव इनको क्या करना कर्तव्य है ?

जब साधक योगदर्शनके अनुसार एकान्तमें बैठकर ध्यानयोगद्वारा चित्तकी वृत्तियोंके निरोधरूप समाधि लगानेकी चेष्टा करता है तब विक्षेप और आलस्यदोषके कारण चित्त उकता जाता है। उनमें भी आलस्य तो इतना घेर लेता है कि साधक तंग आ जाता है। आलस्यमें स्वाभाविक ही आराम प्रतीत होता है, इससे साधकका स्वभाव तामसी बनकर उसे साधनसे गिरा देता है बुद्धि और विवेकद्वारा आलस्यको हटानेके लिये साधक अनेक प्रकारसे प्रयत्न करता है। भोजन भी सात्त्विक और अल्प करता है। आसन लगाकर भी बैठता है। विशेष शारीरिक परिश्रम भी नहीं करता। रोगनिवृत्तिकी भी चेष्टा करता रहता है। समयपर सोनेकी चेष्टा रखता है। इस प्रकार प्रयत्न करनेपर भी मनुष्यको आलस्य दबा लेता है। इसलिये साधक कृतकार्य हो नहीं पाता और ङ्क्षककर्तव्यविमूढ़-सा हो जाया करता है। ऐसी अवस्थामें उसे क्या करना चाहिये ?

कितने ही जो श्रीमद्भागवतमें बतायी हुई नवधा भक्तिके अनुसार जप, स्तुति, प्रार्थना, ध्यान, सेवा-पूजा, नमस्कार आदि करते हुए अपने समयको बिताते हैं, उन लोगोंको भी जैसा आनन्द आना चाहिये वैसा आनन्द नहीं आता और उनका चित्त साधनसे ऊब जाता है। तथा अकर्मण्यता बढ़ जाती है। एवं कितने ही लोग भगवान्की रासलीलाको देखकर प्रसन्न होते हैं; किन्तु उनमें भी झूठ, कपट, हँसी, मजाक, विलासिता आदि दोष देखनेमें आ जाते हैं।

दूसरे जो गीतोक्त भक्तियुक्त कर्मयोगकी दृष्टिसे अपनी बुद्धिके अुनसार स्वार्थ, आराम और आसक्तिको त्याग कर लोकोपकारकी बुद्धिसे लोकसेवारूप निष्काम कर्मका साधन करते हैं, उनके चित्तमें भी अनेक प्रकारकी स्फुरणाएँ और विक्षेप होते हैं, इससे उनको बड़ा झंझट-सा प्रतीत होने लगता है और भगवत्की स्मृति भी काम करते हुए निरन्तर नहीं होती, अत: उनके चित्तमें उकताहट पैदा हो जाती है। न कर्मयोगकी सिद्धि होती है और न काम करते हुए भजन-ध्यानरूप ईश्वरभक्ति ही बनती है; इसलिये वे तंग आकर यज्ञ, दान, तप, सेवा आदि उस लोकोपकाररूप शुभ कर्मोंको स्वरूपसे ही छोडऩेकी इच्छा करने लगते हैं। जब एकान्तमें जाकर ध्यान करने बैठते हैं तब आलस्य आने लगता है, इसलिये वे भी ङ्क्षककर्तव्यविमूढ़-से हो जाते हैं। ऐसी परिस्थितमें कैसे क्या करना चाहिये ?

इसी प्रकार और भी परमात्माकी प्राप्तिके जितने साधन शास्त्रोंमें बतलाये हैं तथा महात्मालोग बतलाते हैं उन सभी साधनोंको करनेवाले साधकोंको कार्यकी सिद्धि कठिन-सी प्रतीत होती है। किन्तु बहुत-से महात्मा और शास्त्र साधनोंको सहज और सुगम बतलाते हैं एवं उनका परिणाम भी सर्वोत्तम बतलाते हैं तथा विचारनेपर युक्तियोंसे भी यह बात ऐसी ही समझमें आती है। फिर भी उपर्युक्त साधन उन्हें सुगम क्यों नहीं प्रतीत होते तथा सभी पुरुष प्रयत्न क्यों नहीं करते; क्योंकि सभी क्लेश, कर्म और दु:खोंसे रहित होकर सुख- शान्ति प्राप्त करना चाहते हैं। फिर वे कृतकार्य नहीं होते—इसका क्या कारण है? ऐसे-ऐसे बहुतसे प्रश्र साधकोंकी ओरसे आते हैं; अत: इनपर कुछ बिचार किया जाता है।

देहाभिमान रहनेके कारण तो ज्ञानयोगमें और आलस्यके कारण ध्यानयोगमें तथा तत्त्व और रहस्यको न जाननेके कारण भक्तियोगमें एवं स्वार्थ- बुद्धि होनेके कारण कर्मयोगमें कठिनता प्रतीत होती है, पर वास्तवमें कठिनता नहीं है।

परमात्माकी प्राप्तिके सभी साधन सुगम होनेपर भी सुगम माननेसे सुगम हैं और दुर्गम माननेसे दुर्गम हैं। श्रद्धापूर्वक तत्त्व और रहस्य समझकर साधन करनेसे सभी साधन सुगम हो सकते हैं। इनमें भी भक्तिसहित कर्मयोग या केवल भगवान्की भक्ति सबके लिये बहुत ही सुगम है।

किन्तु प्राय: सभी मनुष्य अज्ञानके कारण आलस्य, भोग और प्रमादके वशीभूत हो रहे हैं। इसलिये परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंके तत्त्व, रहस्य और प्रभावको नहीं जानते। अत: उन्हें ये सब कठिन प्रतीत होते हैं तथा इसी कारण उनमें श्रद्धा और प्रेमकी कमी रहती है। और इसीसे सभी लोग साधनमें नहीं लगते।

शास्त्रोंमें जो अनेक उपाय बतलाये हैं वे अधिकारीके भेदसे सभी ठीक हैं; किन्तु इस तत्त्वको न जाननेके कारण साधक कभी किसी साधनमें लग जाता है और कभी किसीमें। बहुत-से तो इस हेतुसे कृतकार्य नहीं होते और बहुत-से अपनेको क्या करना कर्तव्य है इस बातको न समझकर अपनी योग्यताके विपरीत साधनका आरम्भ कर देते हैं—इस कारण भी कृतकार्य नहीं होते और कितने ही विवेकी पुरुष अपनी योग्यताके अनुसार कार्य करते हुए भी उसका तत्त्व और रहस्य न जाननेके कारण अहंता, ममता, अज्ञान, राग-द्वेष, संशय, भ्रम,अश्रद्धा आदि स्वभावदोष तथा पूर्वसञ्चित पाप और कुसंगके कारण शीघ्र कृतकार्य नहीं होने पाते। इसलिये उन पुरुषोंको महात्माओंका संग करके उपर्युक्त ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग आदिका तत्त्व-रहस्य समझकर अपनी रुचि और अधिकारके अनुसार महात्माके बतलाये हुए किसी एक साधनको विवेक, वैराग्य और धैर्ययुक्त बुद्धिसे आजीवन करनेका निश्चय करके उसी साधनके लिये तत्परताके साथ प्राणपर्यन्त चेष्टा करनी चाहिये। इस प्रकार श्रद्धा-भक्तिपूर्वक साधन करनेसे साधकके सम्पूर्ण दुर्गुणोंका, पापोंका और दु:खोंका मूलसहित नाश हो जाता है। एवं वह कृतकृत्य होकर सदाके लिये परमानन्द और परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

ज्ञानयोगका साधन देहाभिमानसे रहित होकर करना चाहिये। सच्चिदानन्द परमात्मामें अभेदरूपसे स्थित होकर व्यवहारकालमें तो सम्पूर्ण दृश्यवर्गको ‘गुण ही गुणोंमें बर्त रहे हैं अर्थात् इन्द्रियाँ अपने अर्थोंमें बर्त रही हैं’—ऐसा मानकर उन सारे पदार्थोंको मृगतृष्णाके जल या स्वप्नके सदृश अनित्य समझना चाहिये। और ध्यानकालमें वृत्तियोंसहित सम्पूर्ण पदार्थोंके संकल्पोंका त्याग करके केवल एक नित्य विज्ञानरूप परमात्मामें ही अभेदरूपसे स्थित होना चाहिये। ऐसी अवस्थामें चिन्मय (विज्ञानमय)का लक्ष्य न रहनेके कारण स्वाभाविक आलस्यदोषसे लयवृत्ति हो जाती है अर्थात् मनुष्यकी तन्द्रा-अवस्था हो जाती है। इसलिये ध्यानावस्थामें केवल ज्ञानकी दीप्ति यानी चेतनताकी बहुलता रहना अत्यावश्यक है। क्योंकि जहाँ ज्ञान है, वहाँ अज्ञान और अज्ञानके कार्यरूप निद्रा, आलस्य और लय आदि दोषोंका रहना सम्भव नहीं। इस रहस्यको जाननेवाले वेदान्तमार्गी विवेकी पुरुष निद्रा और आलस्यके शिकार न बनकर कृतकृत्य हो जाते हैं।

पातञ्जलयोगदर्शनके अनुसार साधन करनेवालोंको भी आत्म- साक्षात्कारके लिये केवल चितिशक्ति अर्थात् गुणोंसे रहित केवल चेतनका ही ध्यान रखना चाहिये। इस प्रकार जहाँ केवल चेतनका ही लक्ष्य रहता है वहाँ जैसे सूर्यके पास अन्धकार नहीं आ सकता वैसे ही उनके पास भी निद्रा- आलस्य नहीं आ सकते। अतएव इनको भी युक्त आहार, निद्रा और आसन आदिका पालन करते हुए विशेषरूपसे विज्ञानमय चेतनताकी तरफ ही लक्ष्य रखना चाहिये। इस प्रकार उस शुद्ध निरतिशय ज्ञानमय परमेश्वरके स्वरूपका ध्यान करनेसे सम्पूर्ण विघ्रोंका नाश हो जाता है साधक कृतार्थ हो जाता है।

                    ....... संत वचनामृतम्

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सोमवार, 16 जनवरी 2017

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🌹 मैं शरीर नहीं हूँ 🌹

अपनेको शरीर माननेसे ही जन्म-मरण, दु:ख, संताप, चिन्ता आदि सभी आफतें आती हैं। शरीर अपना स्वरूप है नहीं, यह प्रत्यक्ष है। बचपनमें जैसा शरीर था, वैसा अब नहीं है; अब इतना बदल गया कि पहचान नहीं होती, परंतु ‘मैं वही हूँ’—इसमें सन्देहकी कहीं गुंजाइश भी नहीं है। तो कम-से-कम यह विचार करें कि शरीर मैं नहीं हूँ। मैं न स्थूल शरीर हूँ, न सूक्ष्म शरीर हूँ और न कारण शरीर हूँ। स्थूल शरीरकी स्थूल संसारके साथ एकता है—

छिति जल पावक गगन समीरा।  पंच रचित अति अधम सरीरा (मानस ४। ११। २)

अब वह कौन-सा शरीर है, जो इन पाँचोंसे रहित है ? संसारके साथ शरीरकी बिलकुल अभिन्नता है। संसार ‘यह’ नामसे कहा जाता है, फिर उसका एक छोटा-सा अंश ‘मैं’ कैसे हो गया ? ऐसे ही सूक्ष्म शरीरकी सूक्ष्म संसारके साथ एकता है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन, बुद्धि—ये सब सूक्ष्म संसारके ही अंश हैं। यह जो वायु चलता है, इसीके साथ प्राणोंकी एकता है। ऐसे ही सब इन्द्रियों, मन, प्राण, आदिकी एकता है। सब एक ही धातुके हैं। ऐसे ही कारण शरीरकी कारण संसारके साथ एकता है। सूक्ष्म शरीरसे आगे कुछ पता नहीं लगता, ऐसा जो अज्ञान है, वह कारण शरीर है। इसमें प्रकृति (स्वभाव) होती है। प्रकृति सबकी भिन्न-भिन्न होनेपर भी धातु (पञ्चमहाभूत) एक है, ऐसे प्रकृति एक है। सुषुप्तिमें सभी एक हो जाते हैं, भिन्नता रहती ही नहीं। तो इस प्रकार कारण शरीर सब एक ही हुए। अब इसमें यह मैं हूँ और यह मैं नहीं हूँ; यह मेरा है और यह मेरा नहीं है—यह बात सच्ची नहीं है। यह व्यवहरके लिये कामकी है। अपनेको शरीर मानना गलती है। इस गलतीको हम आज मिटा दें तो महान् शान्ति मिल जाय, बड़ा भारी आनन्द मिल जाय। पर सुनकर केवल सीख लेनेसे यह गलती नहीं मिटती। यह शरीर इदंतासे दीखना चाहिये—‘इदं शरीरम्’ (गीता १३। १)। जैसे यह छप्पर अलग दीखता है, ऐसे शरीरका भी अनुभव होना चाहिये कि यह अलग है, मैं इसे जाननेवाला हूँ। इसे सीखना नहीं है। सीखना या मानना ज्ञान नहीं होता। दृढ़ मान्यता भी ज्ञान-जैसी प्रतीत होती है, पर मान्यता मान्यता ही होती है, बोध नहीं। उसका साफ-साफ बोध होना चाहिये। परिवर्तनशील वस्तु मेरा स्वरूप नहीं है—ऐसा अनुभव हो जाय, तो तत्त्वज्ञान हो गया, मुक्ति हो गयी, परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो गयी, स्वरूपकी प्राप्ति हो गयी। और वह नित्यप्राप्तकी प्राप्ति है; क्योंकि अपना स्वरूप अप्राप्त हुआ ही कब ? और जो प्रतिक्षण बदलता है, वह कभी किसीको प्राप्त कैसा ? वह कभी किसीको प्राप्त हुआ ही नहीं। प्राप्त तो स्वरूप ही है। परंतु अप्राप्तको प्राप्त माननेसे जो प्राप्त है, वह अप्राप्त जैसा हो

 गया। जबतक अप्राप्तको अप्राप्त नहीं मानेंगे तबतक प्राप्तकी प्राप्ति नहीं दीखेगी। सुनकर सीख लेने और मान लेनेका नाम ज्ञान नहीं है। ज्ञान ऐसी चीज नहीं है। ज्ञान तो एकदम, उसी क्षण होता है। उसमें अभ्यास नहीं है। अभ्यास करना उपासना है। उपासना उपासना ही है, बोध नहीं। शरीर मैं हूँ—ऐसा दीखनेपर बेचैनी हो जाय तो बोध हो जायगा। जैसे नींदमें पड़े हुए आदमीको सूई चुभाई जाय, तंग किया जाय तो चट नींद खुल जाती है। ऐसे ही अपनेको शरीर माननेका दु:ख, जलन पैदा हो जाय कि क्या करूँ ? कैसे करूँ ? यह अभ्यास कैसे मिटे ? तो फिर यह मिट जायगा। जो चीज मिटती है, वह होती नहीं और जो चीज होती है, वह मिटती नहीं—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।’ (गीता २। १६) शरीरमें मैं-पन और मेरा-पन मिटता है, तो मूलमें है नहीं—यह पक्की बात है।

सबसे पहले साधकको दृढ़ताके साथ यह मानना चाहिये कि ‘शरीर मैं हूँ और यह मेरा है’ यह बिलकुल झूठी बात है। हमारी समझमें नहीं आये, बोध नहीं हो, तो कोई बात नहीं। पर शरीर ‘मैं नहीं हूँ’ और ‘मेरा नहीं है, नहीं है, नहीं है’—ऐसा पक्का विचार किया जाय, जोर लगाकर। जोर लगानेपर अनुभव नहीं होगा, तब वह व्याकुलता, बेचैनी पैदा हो जायगी, जिससे चट बोध हो जायगा।

शरीर मैं नहीं हूँ—इस बातमें बुद्धि भले ही मत ठहरे, आप ठहर जाओ ! बुद्धि ठहरना या नहीं ठहरना कोई बड़ी बात नहीं है। यह मैं नहीं हूँ—यह खास बात है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ ‘मैं ब्रह्म हूँ’—यह इतना जल्दी लाभदायक नहीं है, जितना ‘यह मैं नहीं हूँ’ यह लाभदायक है। दोनों तरहकी उपासनाएँ हैं; परंतु ‘यह मैं नहीं हूँ’ इससे चट बोध होगा। लेकिन खूब विचार करके पहले यह तो निर्णय कर लो कि शरीर ‘मैं’ और ‘मेरा’ कभी नहीं हो सकता। ऐसा पक्का, जोरदार विचार करनेपर अनुभव नहीं होनेसे दु:ख होगा। उस दु:खमें एकदम शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी ताकत है। वह दु:ख जितना तीव्र होगा, उतना ही जल्दी काम हो जायगा।

 ‘मैं क्या हूँ ?’ ऐसा विचार मत करो। इसमें मन-बुद्धि साथमें रहेंगे। जडक़ी सहायताके बिना ‘मैं क्या हूँ ?’ ऐसा प्रश्न उठ ही नहीं सकता, और समाधान भी जडक़ो साथ लिये बिना कर ही नहीं सकते। इसलिये जडक़ी सहायतासे जडक़ी निवृत्ति एवं चिन्मयताकी प्राप्ति नहीं होती, नहीं होती, नहीं होती। ‘मैं चिन्मय हूँ’ इसमें बुद्धिकी सहायता है और अहंता भी साथमें रहेगी ही। पर ‘यह जड़ मैं नहीं हूँ, नहीं हूँ, नहीं हूँ’ तो इसमें जड़तापर ‘नहीं’ का जोर लगेगा। चिन्तन भी जड़ताका है और निषेध भी जड़ताका है। तो जैसे झाड़ू और कूड़ा-करकट एक धातुके हैं, और झाड़ूसे कूड़ा-करकट साफ करके झाड़ू भी बाहर फेंक दिया जाय, तो साफ मकान पीछे रह जायगा, उसके लिये उद्योग नहीं करना पड़ेगा, ऐसे ही जड़ताके द्वारा जड़ताकी निवृत्ति करनेपर ब्रह्म पीछे रह जाता है, उस-(ब्रह्म-)के लिये उद्योग नहीं करना पड़ता। बिना प्रकृतिकी सहायता लिये उद्योग होता ही नहीं।

‘मैं यह नहीं हूँ’—इसमें ‘मैं’ और ‘यह’ एक जातिके हैं। यह जो ‘मैं’ है, यह दो तरफ जाता है। एक ‘मैं’ जड़ताकी तरफ जाता है और एक ‘मैं’ चेतनताकी तरफ जाता है। चेतनताकी तरफ ‘मैं’ माननेसे (कि ‘मैं चिन्मय हूँ’) जड़ताका ‘मैं’ मिटेगा नहीं और जड़ताकी तरफ ‘मैं’ माननेसे (कि ‘मैं यह नहीं हूँ’) स्वत: रहेगा। इसलिये साधकके लिये ‘मैं यह हूँ’ कि अपेक्षा ‘मैं यह नहीं हूँ’ बहुत ज्यादा उपयोगी है।

मैंने दोनों तरहकी बातें पढ़ी हैं और उनपर गहरा विचार किया है। इसलिये मैं अपनी धारणा कहता हूँ। आपको नहीं जँचे तो आप जैसा चाहें करें। पर निषेधात्मक साधनसे स्वरूपमें स्थिति जितनी जल्दी होती है, उतनी जल्दी विध्यात्मक साधनसे नहीं होती। ऐसे ही दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग किया जाय, तो सद्गुण-सदाचार जल्दी आयेंगे। जैसे ‘मैं सत्य बोलूँगा’ इस बातमें जितना अभिमान रहेगा, उतना ‘मैं झूठ नहीं बोलूँगा’ इसमें अभिमान नहीं रहेगा। झूठ नहीं बोलकर कौन-सा बड़ा भारी काम कर लिया, और सत्य बोलकर बड़ा भारी काम कर लिया—ऐसा भाव रहेगा ! इसलिये सत्य बोलनेका अभिमान जल्दी टूटेगा नहीं।

बुद्धि साथमें रहनेपर जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद हो ही नहीं सकता; क्योंकि जिससे सम्बन्ध-विच्छेद करना है, उस-(शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि-)को ही साथ ले लिया ! इस तरफ विचार न करनेसे ही बहुत वर्ष लग जाते हैं। साधक सोचता रहता है, चिन्तन करता रहता है और स्थिति वहीं-की-वहीं रहती है। जैसे कोल्हूका बैल उम्रभर चलता है, पर वहीं-का-वहीं रहता है, वैसी दशा रहती है साधककी ! इसलिये इस विषयपर खूब गहरा विचार करनेकी आवश्यकता है।

    ........ ✍🏻 🌹 संत प्रसादम्  🌹

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शनिवार, 14 जनवरी 2017

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  🌸🌹!:: भगवद्🌹अर्पणम् ::!🌹🌸
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💐 प्रिय भगवद्जन ....

प्रश्नानुसार ....  मन की चंचलता से भौतिक सुखाभोग की लालसा में मोहित हुई इन्द्रियों के द्वारा हुए पाप-पुण्यादिक कर्मो से बद्ध जीव अगर भगवान से रिस्ता या निकटता बनाता है। तो क्या वह स्वीकार्य करेंगे ?

प्रियजन .... भगवान की ओर दृढता से विश्वास पूर्वक भक्तिमय लगन लगाने से जीव अपनी मुक्ति की राह पर कदम बढा देता है और इस भगवद्भावनामयी कर्मो की राह उसे मुक्ति की मंजिल तक ले जाती है। तदन्तर मुक्त हुए जीव का सम्बन्ध उस स्थान से होता है जहाँ भौतिक कष्ट नहीं होते। भागवत में (१०.१४.५८) कहा गया है –

समाश्रिता से पदपल्लवप्लवं महत्पदं पुण्ययशो मुरारेः |
भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद्विपदां न तेषाम् ||

“जिसने उन भगवान् के चरणकमल रूपी नाव को ग्रहण कर लिया है, जो दृश्य जगत् के आश्रय हैं और मुकुंद नाम से विख्यात हैं अर्थात् मुक्ति के दाता हैं, उसके लिए यह भवसागर गोखुर में समाये जल के समान है। उसका लक्ष्य परंपदम् है। अर्थात् वह स्थान जहाँ भौतिक कष्ट नहीं है या कि वैकुण्ठ है; वह स्थान नहीं जहाँ पद-पद पर संकट हो ।”

अज्ञानवश मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि यह भौतिक जगत् ऐसा दुखमय स्थान है जहाँ पद-पद पर संकट हैं। केवल अज्ञानवश अल्पज्ञानी पुरुष यह सोच कर कि भौतिककर्मों से वे सुखी रह सकेंगे सकाम कर्म करते हुए स्थिति को सहन करते हैं। उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि इस संसार में कहीं भी कोई शरीर दुखों से रहित नहीं है। संसार में सर्वत्र जीवन के दुख- जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि – विद्यमान हैं। किन्तु जो अपने वास्तविक आत्म स्वरूप को समझ लेता है और इस प्रकार भगवान् की स्थिति को समझ लेता है , वही भगवान् की प्रेमा-भक्ति में लगता है। फलस्वरूप वह वैकुण्ठलोक जाने का अधिकारी बन जाता है जहाँ न तो भौतिक कष्टमय जीवन है न ही काल का प्रभाव तथा मृत्यु है। अपने आत्म स्वरूप को जानने का अर्थ है भगवान् की अलौकिक स्थिति को भी जान लेना । भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है।-

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः |
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ||

भगवद्भक्ति में लगे रहकर बड़े-बड़े ऋषि, मुनि अथवा भक्तगण अपने आपको इस भौतिक संसार में कर्म के फलों से मुक्त कर लेते हैं। इस प्रकार वे जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाते हैं और भगवान् के पास जाकर उस अवस्था को प्राप्त करते हैं, जो समस्त दुखों से परे है।

प्रियजन .... जिस भगवद्भक्त ने अपने जीवन के उद्देश्य को भगवान की प्रसन्नता व उनसे बनाए हुए स्वयं के रिस्ते को दृढता पूर्वक निभाना ही बना लिया है उसे भगवद्भावना के अंतर्गत हुए कार्यों में सुख या दुख, हानि या लाभ, जय या पराजय आदि का कोई महत्त्व नहीं दिया जाता है। भक्त की दिव्य भगवद्चेतना तो यही होनी चाहिये कि हर कार्य भगवान के निमित्त किया जाय, क्योकि भगवद्भावनांतर्गत किये गए कर्मो का कोई भौतिक बन्धन (फल) नहीं होता । जो कोई सतोगुण या रजोगुण के अधीन होकर अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करता है उसे अच्छे या बुरे फल प्राप्त होते हैं किन्तु जो भगवद्भावनामयी कार्यों में अपने आपको समर्पित कर देता है वह सामान्य कर्म करने वाले के समान किसी का कृतज्ञ या ऋणी नहीं होता । भागवत में (११.५.४१) कहा गया है –

देवर्षिभूताप्तनृणां पितृणां न किङ्करो नायमृणी च राजन् |
सर्वात्मा यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहत्य कृतम् |

“जिसने अन्य समस्त कार्यों को त्याग कर मुकुन्द श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण कर ली है वह न तो किसी का ऋणी है और न किसी का कृतज्ञ – चाहे वे देवता, साधु, सामान्यजन, अथवा परिजन, मानवजाति या उसके पितर ही क्यों न हों ।”

प्रियजन .... तात्पर्य यह है। कि भक्त को अपने समस्त कर्म भगवान को समर्पित कर उनसे एक दिव्य अटूट रिस्ता स्थापित करना चाहिये एवं विश्वास व दृढता पूर्वक अपनी स्थति भगवद्भावनामयी बनाकर जीवन पर्यंत उस रिस्ते को निभाना चाहिये , भगवान से बनाया हुआ यही रिस्ता भगवान प्रेम से अपनाते है। और भक्त सुगमता से भवबंधन से मुक्त हो जाते है।

       ..... ✍🏻 : कृष्णा :: श्री राधा प्रेमी :

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 : *निस्वार्थ प्रेम से प्रेमास्पद की प्राप्ति* :

प्रिय भगवत्जन .... "प्रेम" की परिभाषा या उसके वास्तविक स्वरूप का वर्णन पूर्णत: तो संभव नही परंतु श्री राधेरानी की कृपा से अपने अभीष्ठ प्रेम को प्राप्त करने का तरीका आंशिक तौर पर हम आपके लिए वर्णित करते है।

 प्रश्नानुसार .... सच्चे प्रेम को प्रेमी किस प्रकार प्राप्त कर सकता है?

प्रियजन .... आपको सबसे पहले यह समझने की जरूरत है। कि आप किसी के प्रति जिस अभीष्ट स्थति को अपने हृदय में अनुभव कर रहे है। वास्तव में वह क्या है। " प्रेम " या " प्यार " ? शायद आप संशय में पढ गए होगें यह जानकर कि यह तो एक ही चीज के दो नाम है। इनमें अलगाव क्या है! तो आइये पहले हम इनके नाम व अनुभव की परिभाषा को स्पष्ट रूप से समझें ....
हृदय की मुक्त आनंदमय अनुभूति का नाम " प्रेम " है। एवं हृदय की बंधनयुक्त मोहमय स्थति को हम " प्यार " कहते है। .... मोह यानी प्यार बाह्य आडम्बर है, किंतु प्रेम को आन्तरिक अनभूति कहा गया है। प्यार का भौतिक - सांसारिकता से घनिष्ठ संबंध है, जबकि प्रेम अलौकिक समर्पण का द्योतक है। प्यार एकांगी है, मगर प्रेम उभय पक्षीय है। प्यार में "मै" की प्रधानता ( मै कर्ता हूं ) पायी जाती है। परंतु प्रेम में परमात्मा का वास होता है। प्रेम साधन व साध्य दोनो है। लेकिन प्यार में यह गुंण नहीं है। प्यार अधोगामी है, तो प्रेम उत्कर्ष की राह है। वस्तुत: प्यार भौतिक भवबंधन का कारण है, मगर प्रेम मुक्त अभिव्यक्ति है। प्यार दु:ख रूप है, पर प्रेम आनंद स्वरूप है। प्यार के व्यापारी ( प्यार करने वाले ) अनेकों है। परंतु सच्चे प्रेम के पुजारी ( स्वयं को अपने प्रेमी की खुशी के लिए मिटाने वाले ) विरले ही होते है। प्यार यानी मोह का अंत मृत्यु है। लेकिन प्रेम की परिणति मोक्ष यानी मुक्ति है। प्यार बिक भी जाता है, लेकिन प्रेम हमेसा दृढता से टिका रहता है। प्यार मस्ताना है, पर प्रेम दीवाना होता है। प्यार में आदान ( लेने या मिलने की इच्छा ) है, पर प्रेम प्रदान ( सिर्फ देने या प्रेमास्पद को खुश देखने की इच्छा ) है। प्रेम उपासनामयी है, परंतु प्यार वासनामयी है। राग से प्यार की प्यार की उत्पत्ती होती है और अनुराग से प्रेम पोषित होता है।

निस्वार्थ सच्चा प्रेम भगवद् स्वरूप माना गया है।-

प्रेम हरि कौ रूप है, त्यौं हरि प्रेम सरूप ।
एक होइ द्वै यौं लसे ज्यौं सूरज और धूप ।।

जब मनुष्य अपने प्यारे के प्रेम रंग में रंग जाता है तब वह प्रेममय हो जाता है, उस समय प्रेम , प्रेमी और प्रेमास्पद तीनों एक ही रूप में परिणित होकर एक ही बन जाते है। प्रेमी , प्रेम और प्रेमास्पद कहने के लिए ही तीन है। परंतु वास्तव में एक ही वस्तु के तीन रूप है। जैसे कि जल के हमें तीन ( वाष्प , बर्फ व तरल ) अलग - अलग रूप देखने को मिलते है परंतु वास्तव में तीनों एक ही है।

प्रेमी के जीवन की प्रत्येक चेष्टा सहज ही प्रेमास्पद के लिए प्रित्यर्थ होती है। जो प्रेमास्पद के लिए प्रतिकूल हो वही अविधि और जो प्रेमास्पद के अनुकूल हो यही विधी है। यही प्रेम जगत का विधी निषेध है। वस्तुत: वहां सब कुछ प्यारे के मन का ही होता है। क्योकि जहाँ अन्तरङ्गता होती है। वहां प्रेमास्पद के मन की भावना प्रेमी के मन में आना स्वाभाविक है।

प्रिय भगवत्जन अधिकतर भक्तजन प्यारे के सच्चे प्रेम से अनभिज्ञ रहते है। जैसे कि -

प्रेम प्रेम सब कोइ कहे, प्रेम ना चीन्हे कोय ।
जेहि प्रेमहिं साहिब मिले, प्रेम कहावे सोय ।।

सच्चा प्रेमी अपने प्रेमास्पद के अतिरिक्त और किसी भी वस्तु का चिन्तन नही करता है। यहां तक कि प्रेमास्पद का चिन्तन भी वह प्रेमास्पद के प्रेम के लिए ही करता है। अपने प्रेमास्पद से वह अपने निश्चल प्रेम के बदले में प्रेमास्पद की प्रसन्नता के अलावा कुछ भी नहीं चाहता । प्रेमी के लिए प्रेमास्पद कुछ सोचे या ना सोचे , उसकी ओर प्रेमास्पद देखे या ना देखे , भले ही प्रेमी के निश्चल प्रेम के बदले प्रेमास्पद प्रेमी को कुछ भी ना दे पर प्रेमी का मन मलिन नहीं होता , बल्कि अपने प्रेमास्पद की प्रसन्नता देखकर ही उसका प्रेम उत्तरोत्तर बढता जाता है।

 प्रियजन  .... सच्चा प्रेम तो वही है। जिसमें प्रियतम् का मिलना हो जाए । और प्रियतम मिलते है। प्रेम भरी हृदय की व्याकुलता से, करुणापूर्ण हृदय की उत्कट इच्छा से! प्रेमी जब अपने प्रेमास्पद के विरह में व्याकुल होता है। तो पल पल उसे अपने प्रेमास्पद के आने की आहट ही सुनाई देती है। बराबर उसकी छवि आँखो में दिखाई देती है। कोई भी आ रहा हो पर उसे यही प्रतीत होता है कि उसका प्राणप्रियतम् ही आ रहा है।

जब तक प्रेमी के अंदर "मैं" है तब तक वह पूर्ण प्रेमत्व को नही पा सकता है। और जब तक प्रेमी का प्रेम सच्चा ना हो , पूर्ण ना हो तब तक प्रेमी को प्रेमास्पद की प्राप्ती नही होती है। प्रेमी को प्रेम के पूर्णत्व के लिए स्व:तत्व से जुडी कामनाओं का त्याग करना होगा अपने अंदर "तूं" ( प्रेमास्पद ) को स्थापित करना होगा जब प्रेमी के हृदय में प्रेमभाव का समंदर उमड पडें जिसका कोई अंत ना हो, हृदय में एक ही भाव एक ही आवाज ... तूं ही तू .. बस तूं ही तू .... सुनाई दे , तभी प्रेमी अपने प्रिय प्रेमास्पद को पूर्णतया पा सकता है। श्री रामचरितमानस में कहा गया है।-

जेहि कें जेहि पर सत्‍य सनेहू ।
सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ।।

 प्रेमी अपने जीवन को जब प्रेमास्पद के प्रेम में पूर्णतया रंग लेता है। तो निस्वार्थ परिपक्व प्रेम से प्रेमियों की पवित्र प्रेमाग्नि में भोग-मोक्ष की सारी कामनाएँ, संसार की सारी आसक्तियाँ और ममताएँ सर्वथा जलकर भस्म हो जाती हैं। उनके द्वारा सर्वस्व का त्याग सहज स्वाभाविक होता है। किसी भी प्रकार की सिद्धी व किसी भी प्रकार की मुक्ती का उन्हें लोभ नही रहता है। अपने प्राणप्रियतम को समस्त आचार अर्पण करके वे केवल नित्य-निरन्तर उनके मधुर स्मरण को ही अपना जीवन बना लेते हैं। उनका वह पवित्र प्रेम सदा बढ़ता रहता है’ क्योंकि वह न कामनापूर्ति के लिये होता है न गुणजनित होता है। उसका तार कभी टूटता ही नहीं, सूक्ष्मतर रूप से नित्य-निरन्तर उसकी अनुभूति होती रहती है और वह प्रतिक्षण नित्य-नूतन मधुर रूप से बढ़ता ही रहता है। उसका न वाणी से प्रकाश हो सकता है, न किसी चेष्टा से ही उसे दूसरे को बताया जा सकता है।

प्रेमियों के इस पवित्र प्रेम में इन्द्रिय-तृप्ति, वासना सिद्धि, भोग-लालसा आदि को स्थान नहीं रहता। बुद्धि, मन, प्राण, इन्द्रियाँ— सभी नित्य-निरन्तर परम प्रियतम के साथ सम्बन्धित रहते हैं। मिलन और वियोग— दोनों ही नित्य-नवीन रसवृद्धि में हेतु होते हैं। ऐसा प्रेमी केवल प्रेम की ही चर्चा करता है, प्रेम की चर्चा सुनता है, उसे सर्वत्र प्रेम ही प्रेम दिखाई देता है। वह हर शब्द - वाणी में अपने प्रेमास्पद के प्रेम रस का अनुभव करता है वह प्रेम का ही मनन करता है, प्रेम में ही संतुष्ट रहता और प्रेम में ही नित्य रमण करता है। यही सच्चे प्रेम को पाने का अभेद्य सूत्र है। जिसका आप अपने प्रेमास्पद ( जीवात्मा से लेकर परमात्मा तक ) पर प्रयोग कर सकते है। अगर आपका प्रेम सच्चा है। कोई भी प्रेमास्पद इस सूत्र को भेद या तोड नही सकता है। अर्थात आपको आपका प्रेम अवश्य मिलेगा ।

       ...... ✍🏻 : कृष्णा :: श्री राधा प्रेमी :

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🌹एक बार प्रेम से बोलिए ...
🌹प्यारी श्री " राधे राधे "🌹💐💐
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शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

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  🌸🌹!:: भगवद्🌹अर्पणम् ::!🌹🌸
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🌹भगवान को सिर्फ निस्वार्थभक्ति व प्रेम से ही पाया जा सकता है।

💐 प्रिय भगवद्जन .....

हजारों मनुष्यों में से शायद विरला मनुष्य ही यह जानने में रूचि रखता है कि पमत्मा क्या है , आत्मा क्या है, शरीर क्या है, और परमसत्य क्या है। सामान्यतया मानव आहार, निद्रा, सुख-दुख तथा मैथुन जैसी पशुवृत्तियों में लगा रहता है।

प्रियजन .... भगवान आज के समय में भगवान को निस्वार्थ रूप सें मानने में अनेको में कोई एक मिलता है। इनमें से भी मुश्किल से कोई एक दिव्य आत्मज्ञान में रूचि रखता है। इन अनेकों दिव्य ज्ञानियों में ( जिन्होंने अपने दिव्यज्ञान को आत्मा, परमात्मा तथा ज्ञानयोग, ध्यानयोग द्वारा अनुभूति की क्रिया में बढाया है।) से अनेक ज्ञानियो में से भी भगवान केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वारा ज्ञेय हैं जो भगवद्प्रेम भावनाभावित हैं। जिनके लिए अपने दिव्य प्रेम की वजह से जगत ही भगवद् स्वरूप बन गया है। ऐसे भगवद्प्रेमीजन अत्यंत दुर्लभ है।

भगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता में इसकी पुष्टी की है। -

मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्र्चिद्यतति सिद्धये |
यततामपि सिद्धानां कश्र्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ||

कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई मुझे वास्तव में जान पाता है |

 भगवान् समस्त कारणों के कारण, आदि पुरुष गोविन्द हैं।-
 "ईश्र्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः| अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्|"

सामान्यजन के लिए भगवान को जान पाना अत्यन्त कठिन है | यद्यपि साधारणतया कुछ विद्वजन यह घोषित करते हैं कि भक्ति का मार्ग सुगम है, किन्तु वे इस पर चलते नहीं । यदि भक्तिमार्ग इतना सुगम है जितना कि ये कहते हैं तो फिर वे इस मार्ग को ग्रहण क्यों नहीं करते हैं? वास्तव में भक्तिमार्ग सुगम नहीं है। भक्ति के ज्ञान में हीन अनधिकारी लोगों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला तथाकथित भक्तिमार्ग भले ही सुगम हो, किन्तु जब भगवद् भक्ति के लिए भौतिक संसार को भूलकर भगवान के दिव्य प्रेममार्ग को अपनाने की बात आती है। मीमांसक तथा दार्शनिक इस मार्ग से च्युत हो जाते हैं। श्रील रूप गोस्वामी अपनी कृति भक्तिरसामृत सिन्धु में (१.२.१०१) लिखते हैं –

श्रुति स्मृतिपुराणादि पञ्चरात्रविधिं विना |
एकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते ||

“वह भगवद्भक्ति, जो उपनिषदों, पुराणों तथा नारद पंचरात्र जैसे प्रामाणिक वैदिक ग्रंथों की अवहेलना करती है, समाज में व्यर्थ ही अव्यवस्था फैलाने वाली है |”

"मुह्यन्ति यत्सूरयः | मां तु वेद न कश्र्चन" – भगवान् कहते हैं कि कोई भी मुझे उस रूप में तत्त्वतः नहीं जानता, जैसा मैं हूँ | और यदि कोई जानता है – स महात्मा सुदुर्लभः– तो ऐसा महात्मा विरला होता है | अतः भगवान् की भक्ति किये बिना कोई भगवान् को तत्वतः नहीं जान पाता, भले ही वह महान विद्वान् या दार्शनिक क्यों न हो | केवल शुद्ध भक्त ही भगवान के अचिन्त्य गुणों को सब कारणों के कारण रूप में उनकी सर्वशक्तिमत्ता तथा ऐश्र्वर्य, उनकी सम्पत्ति, यश, बल, सौन्दर्य, ज्ञान तथा वैराग्य के विषय में कुछ-कुछ जान सकता है, क्योंकि भगवान अपने भक्तों पर दयालु होते हैं | ब्रह्म-साक्षात्कार की वे पराकाष्टा हैं और केवल भक्तगण ही उन्हें तत्वतः जान सकते हैं | अतएव भक्तिरसामृत सिन्धु में (१.२.२३४) कहा गया है –

अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः |
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ||

“कुंठित इन्द्रियों के द्वारा कृष्ण को तत्त्वतः नहीं समझा जा सकता । किन्तु भक्तों द्वारा की गई अपनी दिव्यसेवा से प्रसन्न होकर वे भक्तों को आत्मतत्त्व प्रकाशित करते हैं |” अत: भगवान का यथार्थ प्रेम प्राप्त करने व दर्शन की इच्छा रखने वाले भगवद्प्रेमीभक्त को भगवान के दिव्यप्रेम व भक्ति को पाने के लिए भौतिक सुखाभोग की लालसा को छोडकर निस्वार्थ भक्तिप्रेम में रत होना चाहिये ।

       .... ✍🏻 : कृष्णा :: श्री राधा प्रेमी :

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बुधवार, 11 जनवरी 2017

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🌹🌹✨ भगवद् 🙏🏻 अर्पण ✨🌹🌹


प्रियभगवद्जन .....

“जीव के शरीर के भीतर आत्मरूप मे वास करने वाले भगवान् ब्रह्माण्ड के समस्त जीवों के नियन्ता हैं। यह शरीर नौ द्वारों (दो आँखे, दो नथुने, दो कान, एक मुँह, गुदा और उपस्थ) से युक्त है | बद्धावस्था में जीव अपने आपको शरीर मानता है, किन्तु जब वह अपनी पहचान अपने अन्तर के भगवान् से करता है तो वह शरीर में रहते हुए भी भगवान् की भाँति मुक्त हो जाता है |”

नवद्वारे पुरे देहि हंसो लेलायते बहिः |
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ||
(श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् ३.१८)

  यदि कोई आत्म-साक्षात्कार के पथ पर अग्रसर होना चाहता है तो उसे भौतिक इन्द्रियों के वेग को रोकने का प्रयत्न करना चाहिए । ये वेग हैं – वाणीवेग, क्रोधवेग, मनोवेग, उदरवेग, उपस्थवेद तथा जिह्वावेग ।

भौतिक इच्छाएँ पूर्ण न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध में भरे व्यक्ति का मन खिन्न हो उठता है। तब वाणी , मन, नेत्र तथा वक्षस्थलादि उत्तेजित होते हैं। और ये स्थिति दुसरे के साथ साथ व्यक्ति के स्वयं के लिए भी कष्टप्रद होती है। अतः  बुद्धिमान व्यक्ति को समय रहते इस शरीर का परित्याग करने के पूर्व ही इन समस्त शारीरिक वेगों को वश में करने का अभ्यास करना चाहिए । जो ऐसा कर सकता है वह स्वरुपसिद्ध प्राप्ति का अधिकारी माना जाता है और आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में वह सुखी रहता है।

प्रियजन .... हम स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के लक्षण संक्षेप में जानते है। स्वरूपसिद्ध व्यक्ति में शरीर और आत्मतत्त्व के तादात्म्य का भ्रम नहीं रहता । वह यह भलीभाँति जानता है। कि मैं यह शरीर नहीं हूँ, अपितु भगवान् का एक अंश हूँ। अतः कुछ प्राप्त होने पर न तो उसे प्रसन्नता होती है। और न शरीर की कुछ हानि होने पर शोक होता है। मन की यह स्थिरता स्थिरबुद्धि या आत्मबुद्धि भी कहलाती है। अतः वह न तो स्थूल शरीर को आत्मा मानने की भूल करके मोहग्रस्त होता है और न शरीर को स्थायी मानकर आत्मा के अस्तित्व को ठुकराता है। इस ज्ञान के कारण वह परमसत्य अर्थात् ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् के ज्ञान को भलीभाँति जान लेता है। इस प्रकार वह अपने स्वरूप को जानता है। और परब्रह्म से हर बात में तदाकार होने का कभी यत्न नहीं करता । इसे ब्रह्म-साक्षात्कार या आत्म-साक्षात्कार कहते हैं ।

श्रीमद्भगवद्गीता में इसकी पुष्टि हुई है। ...

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् |
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्र्नन्गच्छन्स्वपन्श्र्वसन् || ५/८ ||
प्रलपन्विसृजन्गृह्रन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् || ५/९ ||

दिव्य भगवद्मयीभावना से युक्त पुरुष देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूँघते, खाते, चलते-फिरते, सोते तथा श्र्वास लेते हुए भी अपने अन्तर में सदैव यही जानता रहता है कि वास्तव में वह कुछ भी नहीं करता । जो भी कार्य मेरे द्वारा सम्पन्न होता वह सब भगवान द्वारा प्रेरित भावना से ही सम्पन्न होता है। भगवद्भावनामयी व्यक्ति चलते , बोलते, त्यागते, ग्रहण करते या आँखे खोलते-बन्द करते हुए अपने हर एक क्रियाकलाप में यह जानता रहता है कि भौतिक इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त है और वह इन सबसे पृथक् है। तदन्तर अपनी इस भगवद्मयीभावना से वह भगवान के दिव्यप्रेम व भक्ति को प्राप्त होता है।
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🌹भगवद्भावनामयी कर्म से भगवद्प्रेम व भगवद्धाम की प्राप्ति :

प्रियभगवद्जन .....

भगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है। कि जो अपने सारे कार्यों को मुझमें अर्पित करके अविचलित भाव से मेरी भक्ति करते हुए मेरी पूजा करते हैं और अपने चित्त को मुझ पर स्थिर करके निरन्तर मेरा ध्यान करते हैं, उनके लिए हे पार्थ! मैं जन्म-मृत्यु के सागर से शीघ्र उद्धार करने वाला हूँ |

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः |
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ||
तेषाम हं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् |
भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ||

प्रियजन .... भक्तजन भगवान को अत्यन्त प्रिय है। भगवान अपने प्रेमी भक्तो का इस भवसागर से तुरन्त ही उद्धार कर देते हैं। शुद्ध भक्ति करनेपर मनुष्य को इसकी अनुभूति होने लगती है। जैसा पहले कहा जा चुका है कि केवल भक्ति से परमेश्र्वर को जाना जा सकता है। अतएव मनुष्य को चाहिए कि वह पूर्ण रूप से भक्त बने। भगवान् को प्राप्त करने के लिए वह अपने मन को भगवान में पूर्णतया एकाग्र करे। वह भगवद् भावना रखकर ही प्रत्येक कर्म करे। चाहे वह जो भी कर्म करे लेकिन वह कर्म केवल भगवान के लिए होना चाहिए। भक्ति का यही आदर्श है। भक्त भगवान् को प्रसन्न करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं चाहता । उसके जीवन का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना होता है। और भगवद्प्रेमभाव की प्राप्ती लिए वह सब कुछ कर सकता है। यह विधि अत्यन्त सरल है। मनुष्य अपने कार्य में लगा रह कर " हरे कृष्ण हरे राम " महामन्त्र का कीर्तन कर सकता है | ऐसे दिव्य कीर्तन से भक्त भगवान् के प्रति आकृष्ट होता जाता है। और भगवद्प्रेम को प्राप्त करता है।

 वराह पुराण में एक श्लोक आया है -

नयामि परमं स्थानमर्चिरादिगतिं विना |
गरुडस्कन्धमारोप्य यथेच्छमनिवारितः ||

 अर्थात ... भगवान की निस्वार्थ प्रेमभक्ति के अलावा भक्त को  वैकुण्ठलोक में आत्मा को ले जाने के लिए अष्टांगयोग साधने की आवश्यकता नहीं है। इसका भार भगवान् स्वयं अपने ऊपर लेते हैं। वे यहाँ पर स्पष्ट कर रहे हैं कि वे स्वयं ही उद्धारक बनते हैं। जिस तरह बालक अपने माता-पिता द्वारा अपने आप रक्षित होता रहता है, जिस प्रकार किसी अबोध बालक की स्थिति माता पिता के संरक्षण में सुरक्षित रहती है। उसी प्रकार भक्त को योगाभ्यास द्वारा अन्य लोकोंमें जाने के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती, अपितु भगवान् अपने अनुग्रहवश स्वयं ही तुरन्त आते हैं और भक्त को भवसागर से उबार लेते हैं।

कोई कितना ही कुशल तैराक क्यों न हो, और कितना ही प्रयत्न क्यों न करे, किन्तु समुद्र में गिर जाने पर वह अपने को नहीं बचा सकता । किन्तु यदि कोई आकर उसे अनुग्रहकर जल से बाहर निकाल ले, तो वह आसानीसे बच जाता है। इसी प्रकार भगवान् भक्त को इस भवसागर से निकाल लेते हैं। मनुष्य को केवल भगवद्भावनामृत की सुगम विधि का अभ्यास करना होता है , और अपने आपको अनन्य भक्ति में प्रवृत्त करना होता है। किसी भी बुद्धिमान भक्त को चाहिए कि वह अन्य समस्त मार्गों की अपेक्षा भक्तिप्रेमयोग को चुने ।

नारायणीय में इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है-

या वै साधनसम्पत्तिः पुरुषार्थचतुष्टये |
तया विना तदाप्नोति नरो नारायणाश्रयः ||

भावार्थ यह है कि मनुष्य को चाहिए कि वह न तो सकाम कर्म की विभिन्न विधियों में उलझे, न ही कोरे चिन्तन से ज्ञान का अनुशीलन करे | जो परम सत्य भगवान् की भक्ति में लीन है, वह उन समस्त लक्ष्यों को प्राप्त करता है। जो अन्य योग विधियों, चिन्तन, अनुष्ठानों, यज्ञों, दानपुण्यों आदि से प्राप्त होने वाले हैं। भगवद्प्रेम व भक्ति का यही विशेष वरदान है।

भगवद्गीता का निष्कर्ष अठारहवें अध्याय में इस प्रकार व्यक्त हुआ है -

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहम् त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||

आत्म-साक्षात्कार की अन्य समस्त विधियों को त्याग कर केवल भगवद्भावना में भक्ति सम्पन्न करनी चाहिए । इससे जीवन की चरम सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। मनुष्य को अपने गत जीवन के पाप कर्मों पर विचार करने की आवश्यकता नहीं रह जाती, क्योंकि उसका उत्तरदायित्व भगवान् अपने ऊपर ले लेते हैं। अतएव मनुष्य को व्यर्थ ही आध्यात्मिक अनुभूति में अपने उद्धार का प्रयत्ननहीं करना चाहिए । प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह परम शक्तिमान ईश्र्वर की शरण ग्रहण करे | यही जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है।

प्रियजन .... भगवान ने श्रीमदभगवद् गीता  में कहा है। कि सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो । इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे । मैं तुम्हें वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मेरे परम प्रिय हो ।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ||

इसका भावार्थ ज्ञान का गुह्यतम अंश है कि मनुष्य भगवान का शुद्ध भक्त बने, सदैव उन्हीं का चिन्तन करे और उन्हीं के लिए कर्म करे । व्यावसायिक ध्यानी बनना कठिन नहीं । जीवन को इस प्रकार ढालना चाहिए कि भगवान का चिन्तन करने का सदा अवसर प्राप्त हो । मनुष्य इस प्रकार कर्म करे कि उसके सारे नित्य कर्म भगवद्भावनामयी या भगवद्प्रेम के लिए हों | वह अपने जीवन को इस प्रकार व्यवस्थित करे कि चौबीसों घण्टे भगवद्प्रेम भावना रहकर में उनके सत्यप्रेममयी अत्यन्त सुंदर स्वरूप का ही चिन्तन करता रहे और भगवान् की प्रतिज्ञा है कि जो इस प्रकार भगवद्भावनामयी होगा, वह निश्चित रूप से भगवद्धाम को जाएगा जहाँ वह साक्षात् भगवान के सान्निध्य में रहेगा ।
             
         ✍🏻 ..... : कृष्णा :: श्री राधा प्रेमी :
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प्रियभगवद्जन .... अगर आपको श्री राधेरानी की कृपा से सहेजा गया यह अनमोल ज्ञान पसंद आया हो तो एक बार अपने प्रिय प्रभू का प्रेम पूर्वक ध्यान कर हमें " श्री राधे ..श्री राधे ..श्री राधे राधे .., " लिखकर अपने विचार अवश्य शेयर करें 💐🙏🏻 अथवा आपको इस लेख या अपने आध्यात्म से संबंधित कोई प्रश्न या शंका है। तो हमें नं. 9009290042 पर मैसेज अवश्य करें भगवद्कृपा एवं भगवद्इच्छा रही तो हम अवश्य आपका समाधान भेजेगे 💐🙏🏻
आपकी समस्त शुभमनोकामनाएं पूर्ण हों इसी मंगल कामना के साथ ....
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🌹 भगवान के शाश्र्वत अंश होते हुए भी जीवात्मा का कर्म व प्रारब्ध में बंधकर चौरासी लाख योनियो में देहांतरण :

प्रिय भगवत्भक्त जन .....

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है। कि .... इस बद्ध जगत् में सारे जीव मेरे शाश्र्वत अंश हैं । बद्ध जीवन के कारण वे छहों इन्द्रियों के घोर संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें मन भी सम्मिलित है ।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः |
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ||

 इस श्लोक में जीव का स्वरूप स्पष्ट है । जीव परमेश्र्वर का सनातन रूप से सूक्ष्म अंश है । ऐसा नहीं है कि बद्ध जीवन में वह एक व्यष्टित्व धारण करता है और मुक्त अवस्था में वह परमेश्र्वर से एकाकार हो जाता है । वह सनातन का अंश रूप है । यहाँ पर स्पष्टतः सनातन कहा गया है । वेदवचन के अनुसार परमेश्र्वर अपने आप को असंख्य रूपों में प्रकट करके विस्तार करते हैं, जिनमें से व्यक्तिगत विस्तार भगवद्तत्व कहलाते हैं और गौण विस्तार जीव कहलाते हैं । दूसरे शब्दों में, भगवद्तत्व निजी विस्तार (स्वांश) हैं और जीव विभिन्नांश (पृथकीकृत अंश) हैं| अपने स्वांश द्वारा वे भगवान् राम, नृसिंह देव, विष्णुमूर्ति तथा वैकुण्ठलोक के प्रधान देवों के रूप में प्रकट होते हैं | विभिन्नांश अर्थात् जीव, सनातन भक्त व सेवक के रूप में होते हैं । भगवान् के स्वांश सदैव विद्यमान रहते हैं । इसी प्रकार जीवों के विभिन्नांशो के अपने स्वरूप होते हैं । परमेश्र्वर के विभिन्नांश होने के कारण जीवों में भी उनके आंशिक गुण पाये जाते हैं, जिनमें से स्वतन्त्रता एक है । प्रत्येक जीव का आत्मा रूप में, अपना व्यष्टित्व और सूक्ष्म स्वातंत्र्य होता है । इसी स्वातंत्र्य के दुरूपयोग से जीव बद्ध बनता है और उसके सही उपयोग से वह मुक्त बनता है । दोनों ही अवस्थाओं में वह भगवान् के समान ही सनातन होता है । मुक्त अवस्था में वह इस भौतिक अवस्था से मुक्त रहता है और भगवान् के दिव्य दर्शन व भक्ति सेवा में निरत रहता है । बद्ध जीवन में प्रकृति के गुणों द्वारा अभिभूत होकर वह भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति को भूल जाता है । फलस्वरूप उसे अपनी स्थिति बनाये रखने के लिए इस संसार में अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है ।

न केवल मनुष्य एवं छोटे से छोटे जीव, अपितु इस भौतिक जगत् के बड़े-बड़े नियन्ता-यथा ब्रह्मादिक तक, परमेश्र्वर के अंश हैं । ये सभी सनातन अभिव्यक्तियाँ हैं, क्षणिक नहीं । कर्षति (संघर्ष करना) शब्द अत्यन्त सार्थक है । बद्धजीव मानो लौह शृंखलाओं से बँधा हो । वह मिथ्या अहंकार से बँधा रहता है और मन इसका मुख्य कारण है जो उसे इस भवसागर की ओर धकेलता है । जब मन सतोगुण में रहता है, तो उसके कार्यकलाप अच्छे होते हैं । जब रजोगुण में रहता है, तो उसके कार्यकलाप कष्टकारक होते हैं और जब वह तमोगुण में होता है, तो वह जीवन की निम्नयोनियों में चला जाता है । जीव अपनी चेतना को निम्न श्रेंणी के जीवों के जैसा बना देता है। तो उसे अगले जन्म में निम्न श्रेंणी का शरीर प्राप्त होता है , जिसका वह भोग करता है | प्रत्येक जीव की चेतना मूलतः जल के समान विमल होती है, लेकिन यदि हम जल में रंग मिला देते हैं, तो उसका रंग बदल जाता है | इसी प्रकार चेतना भी शुद्ध है, क्योंकि आत्मा शुद्ध है लेकिन भौतिक गुणों की संगति के अनुसार चेतना बदलती जाती है | वास्तविक चेतना तो भगवद्भावनामयी है, अतः जब कोई भगवद्भावना में स्थित होता है, तो वह शुद्धतर जीवन बिताता है | लेकिन यदि उसकी चेतना किसी भौतिक प्रवृत्ति से मिश्रित हो जाती है, तो अगले जीवन में उसे वैसा ही शरीर मिलता है | यह आवश्यक नहीं है कि उसे पुनः मनुष्य शरीर प्राप्त हो - वह कुत्ता, बिल्ली, सूकर, देवता या चौरासी लाख योनियों में से कोई भी योनिरूप अपने स्वकर्मो से बने प्रारब्ध व अतिंम स्मृति के आधार पर प्राप्त कर सकता है |

लेकिन यहां यह स्पष्ट है कि बद्धजीव मन तथा इन्द्रियों समेत भौतिक शरीर से आवरित है और जब वह मुक्त हो जाता है तो यह भौतिक आवरण नष्ट हो जाता है । लेकिन उसका आध्यात्मिक शरीर अपने व्यष्टि रूप में प्रकट होता है । माध्यान्दिनायन श्रुति में यह सूचना प्राप्त है -

स वा एष ब्रह्मनिष्ठ इदं शरीरं मर्त्यमतिसृज्य ब्रह्माभिसम्पद्य ब्रह्मणा पश्यति ब्रह्मणा शृणोति ब्रह्मणैवेदं सर्वमनुभवति ।

यहाँ यह बताया गया है कि जब जीव अपने इस भौतिक शरीर को त्यागता है और आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश करता है, तो उसे पुनः आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होता है, जिससे वह भगवान् का साक्षात्कार कर सकता है । यह उनसे आमने-सामने बोल सकता है और सुन सकता है तथा जिस रूप में भगवान् हैं, उन्हें समझ सकता है । स्मृति से भी यह ज्ञात होता है-

वसन्ति यत्र पुरुषाः सर्वे वैकुण्ठ-मूर्तयः

वैकुण्ठ में सारे जीव भगवान् जैसे शरीरों में रहते हैं । जहाँ तक शारीरिक बनावट का प्रश्न है, अंश रूप जीवों तथा भगवद्मूर्ति के विस्तारों (अंशों) में कोई अन्तर नहीं होता । दूसरे शब्दों में, भगवान् की कृपा से मुक्त होने पर जीव को आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होता है। जीव भगवान् का अंश होने के कारण गुणात्मक दृष्टि से भगवान् के ही समान है, जिस प्रकार स्वर्ण के अंश भी स्वर्ण ही होते हैं।

प्रियजन .... भौतिक रूप से देखने मे हमें स्थूल जगत् में ही सब कुछ दिखाई देता है। हम देखते हैं कि चींटी, चीड़िया, उष्ट्र, हाथी आदिकों के बड़े-बड़े देह या छोटे से छोटे जीवों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म शरीर सभी का आधार आत्मतत्व ही है। और सभी अपने सूक्ष्म विचारो पर ही उठते, चलते, फिरते, बैठते हैं, तब यह कहने में कोई भी संकोच नहीं रह जाता है कि ब्रह्मादि स्तम्ब-पर्यन्त सभी प्राणियों की जो भी हलचलें है और उन हलचलों से जो भी कार्यसंपन्न होते हैं, सब सूक्ष्म विचार, मन या वृद्धि के ही कार्य हैं।

‘यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिनिष्पद्यते।’

जीव जैसा संकल्प करने लगता है वैसा ही कर्म करता है, जैसा कर्म करता है, वैसा ही बन जाता है। जिन बातों का प्राणी बार-बार विचार करता है, धीरे-धीरे वैसी ही इच्छा हो जाती हे, इच्छानुसारी कर्म और कर्मानुसारिणी गति होती है। अतः स्पष्ट है कि अच्छे कर्म करने के लिये अच्छे विचारों को लाना चाहिये। बुरे कर्मों को त्यागने के पहले बुरे विचारों को त्यागना चाहिए। जो बुरे विचारों का त्याग नहीं करता, वह कोटि-कोटि प्रयत्नों से भी बुरे कर्मों से छुटकारा नहीं पा सकता। और यही अच्छे - बुरे कर्म समय पाकर जीव के प्रारब्ध का निर्माण करते है। जिन्है व्यक्ति जीवन पर्यंन्त भोगता है।

 संसार में जीव अपने कर्मानुसार अपनी देहात्मबुद्धि को एक शरीर से दूसरे में उसी तरह ले जाता है, जिस प्रकार वायु सुगन्धि को ले जाता है । इस प्रकार वह एक शरीर धारण करता है और फिर इसे त्याग कर दूसरा शरीर धारण करता है ।

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्र्वरः |
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाश्यात् ||

यहाँ पर जीव को ईश्र्वर अर्थात् अपने शरीर का नियामक कहा गया है । यदि वह चाहे तो अपने शरीर को त्याग कर उच्चतर योनि में जा सकता है । इस विषय में उसे थोड़ी स्वतन्त्रता प्राप्त है । शरीर में जो परिवर्तन होता है, वह उस पर निर्भर करता है । मृत्यु के समय वह जैसी चेतना बनाये रखता है, वही उसे दूसरे शरीर तक ले जाती है । यदि वह कुत्ते या बिल्ली जैसी चेतना बनाता है, तो उसे कुत्ते या बिल्ली का शरीर प्राप्त होता है । यदि वह अपनी चेतना दैवी गुणों में स्थित करता है, तो उसे देवता का स्वरूप प्राप्त होता है । और यदि वह भगवद्भावना में होता है, तो वह आध्यात्मिक जगत में भगवान के लोक को जाता है, जहाँ उसका सान्निध्य भगवान से होता है । यह सोच निर्मूल है कि इस शरीर के नाश होने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है । जीवात्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करता है, और वर्तमान शरीर तथा वर्तमान कार्यकलाप ही अगले शरीर का आधार बनते हैं । कर्म के अनुसार भिन्न शरीर प्राप्त होता है और समय आने पर यह शरीर त्यागना होता है । यहाँ यह कहा गया है कि सूक्ष्म शरीर, जो अगले शरीर का बीज वहन करता है, अगले जीवन में दूसरा शरीर निर्माण करता है । एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण की प्रक्रिया तथा शरीर में रहते हुए संघर्ष करने को कर्षति अर्थात् जीवन संघर्ष कहते हैं ।

यहां हमें " प्रारब्ध या कर्म " के संबंध में एक बात याद रखने योग्य है कि जीव या अंगुतक व्यक्ति जो भी भोग रहा है। या उसे जो भी अच्छा - बुरा मिल रहा है। वह सभी प्रारब्धजनित निर्धारित रहता है। और जो कार्य वर्तमान में व्यक्ति के द्वारा स्वयं को "मै" या "स्व:" में स्थित रखकर किया जाता है। वह कर्म है। जो व्यक्ति को मिल रहा होता है। या उसके साथ जो भी अच्छा - बुरा होता है। वह सब उसके पूर्व संचयित कर्मो का फल है। और उसे बदलने का प्राय: व्यक्ति के पास कोई अधिकार नही है। परंतु व्यक्ति के वर्तमान कार्यो को बदलने का या उसे अपनी जीवन शैली को निर्धारित करने का पूर्ण अधिकार व्यक्ति के स्वयं के ऊपर निर्भर है।

प्रियजन हमें अपने सम्पूर्ण दैनिक कर्म भगवान को अर्पण कर प्रेमपूर्वक उनकी भक्ती में मग्न होना चाहिये ... श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार ....

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्तवा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्र मिवाम्भसा।।

जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता ।

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 🌹भगवान जीवमात्र के हृदय में है।🌹

प्रिय भगवद्जन .....

भगवान जीवमात्र के हृदय में विद्यमान है। इसका हमें हमारे धर्मगर्थों में अनेकों जगह वर्णन मिलता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार ...

सर्वस्य चाहं ह्रदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च |

मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझ से ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति होती है।

तात्पर्य .... परमेश्र्वर परमात्मा रूप में प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं और उन्हीं के कारण सारे कर्म प्रेरित होते हैं | जीव अपने विगत जीवन की सारी बातें भूल जाता है, लेकिन उसे परमेश्र्वर के निर्देशानुसार कार्य करना होता है, जो उसके सारे कर्मों के साक्षी है | अतएव वह अपने विगत कर्मों के अनुसार कार्य करना प्रारम्भ करता है | इसके लिए आवश्यक ज्ञान तथा स्मृति उसे प्रदान की जाती है | लेकिन वह विगत जीवन के विषय में भूलता रहता है | इस प्रकार भगवान् न केवल सर्वव्यापी हैं, अपितु वे प्रत्येक हृदय में अन्तर्यामी भी हैं | वे विभिन्न कर्मफल प्रदान करने वाले हैं | वे निराकार ब्रह्म तथा साकार अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में पूजनीय हैं।

 जीव ज्योंही अपने इस शरीर को छोड़ता है, इसे भूल जाता है, लेकिन परमेश्र्वर द्वारा प्रेरित होने पर वह फिर से काम करने लगता है | यद्यपि जीव भूल जाता है, लेकिन भगवान् उसे बुद्धि प्रदान करते हैं, जिससे वह अपने पूर्वजन्म के अपूर्ण कार्य को फिर से करने लगता है | अतएव जीव अपने हृदय में स्थित परमेश्र्वर के आदेशानुसार इस जगत् में सुख या दुख का भोग करता है।

प्रियजन ... भगवान श्रीगीता में आगे कहते है।....

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पंच चेन्द्रियगोचराः।।
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।

पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध तथा इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख, स्थूल देह का पिण्ड, चेतना और धृति – इन सभी गुंण - विकारों से जीवों के शरीरों का निर्माण होता है। और इन सभी जीवो में परमात्मा आत्मतत्व के रूप में चैतन्य है।

 यहां ध्यान देने योग्य बात यह है। कि परमात्मा आत्मतत्व से सभी में चैतन्य है। परंतु स्वयं प्रकट नहीं है। इसी वजह से जीवमात्र में होते हुए भी वह जीव के रूप, रंग व कर्म से निर्लिप्त रहता है जैसे कि दुग्ध में घृत है। परंतु दृश्य नहीं होता और दुग्ध से बने किसी भी व्यंजन में घृत का नाम नहीं रहता परंतु घृत का अंश व स्वाद हर व्यंजन में रहता है। जैसे कि हमें दुग्ध से घृत निकालने के लिए यत्न करना पडता है। ( घृत निकालने के लिए दुग्ध को पहले गर्म करते है। फिर उसे दही के रूप में जमाया जाता है। , तदोपरांत मथने के पश्चात निकले हुए मख्खन को गर्म करने पर हमें घृत की प्राप्ती होती है। ) उसी तरह हमें स्वयं में परामात्मा के आत्मतत्व की प्राप्ती के लिए भगवत्भक्ती रूपी लगन में खुद को गर्म करना पडता है। "मै" रूप स्थापित स्व: कर्मो को जमाना पडता है। , दुविधाओं व विचारो का मंथन करना पडता है। तदोपरान्त स्वयं में प्रकट हुए निस्वार्थ भगवत्प्रेम की दाहकता में हमें आत्मा रूपी परमात्मा की प्राप्ती होती है। अत: स्पष्ट है। कि जीवमात्र में सदृश्य रहते हुए भी आत्मरूपी परमात्मा जीव के कर्मो से निर्लिप्त रहता है। व दृश्य नही होता है। जीव अपने कर्मो का भोगी स्वयं ही होता है।

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प्रिय भगवद्भक्तजन .... आपके प्रश्नानुसार व्यक्ति की संतुष्टी कब संभव है प्रतिघातक इच्छा व तृष्णा से भरे इस जनसागर से बचना किस प्रकार संभव है ?

प्रियजन ..... यह सिर्फ आपकी ही नहीं वरन् ज्यादातर व्यक्तियों की समस्याऐं है । समस्याऐं जैसे – जन्म, मृत्यू , जरा, व्याधि , हानि , लाभाआदिक – की निवृत्ति धन-संचय तथा आर्थिक विकास से संभव नहीं है | विश्र्व के विभिन्न भागों में ऐसे राज्य हैं जो जीवन की सारी सुविधाओं से तथा सम्पत्ति एवं आर्थिक विकास से पूरित हैं, किन्तु फिर भी उनके सांसारिक जीवन की समस्याएँ ज्यों की त्यों बनी हुई हैं । यह प्राकृतिक नियम है कि भौतिक कार्यकलाप की प्रणाली ही हर एक के लिए चिन्ता का कारण है | पग-पग पर उलझन मिलती है, अतः  गुरु के पास जाना आवश्यक है, जो जीवन के उद्देश्य को पूरा करने के लिए समुचित पथ-निर्देश दे सके | समग्र वैदिक ग्रंथ हमें यह उपदेश देते हैं कि जीवन की अनचाही उलझनों से मुक्त होने के लिए  गुरु के पास जाना चाहिए | ये उलझनें उस दावाग्नि के समान हैं जो किसी के द्वारा लगाये बिना भभक उठती हैं | इसी प्रकार विश्र्व की स्थिति ऐसी है कि बिना चाहे जीवन की उलझनें स्वतः उत्पन्न हो जाती हैं | कोई नहीं चाहता कि आग लगे, किन्तु फिर भी वह लगती है और हम अत्याधिक व्याकुल हो उठते हैं | अतः वैदिक वाङ्मय उपदेश देता है कि जीवन की उलझनों को समझने तथा समाधान करने के लिए हमें परम्परागत गुरु के पास जाना चाहिए | जिस व्यक्ति के ऊपर गुरु अथवा आत्मज्ञानी संत का आशीर्वाद होता है वह सब कुछ जानता है | अतः मनुष्य को भौतिक उलझनों में न रह कर गुरु के पास जाना चाहिए |

प्रियजन .... यहां यह जानना या समझना भी जरूरी है कि उपदेशक अगर उपदिष्ट से श्रेष्ठतर न हों तो उनमें उपदेशक तथा उपदिष्ट का सम्बन्ध अर्थहीन होगा | यदि ये दोनों माया द्वारा मोहित होते हैं तो एक को उपदेशक तथा दुसरे को उपदिष्ट होने की कोई आवश्यकता नहीं है | ऐसा उपदेश व्यर्थ होगा क्योंकि माया के चंगुल में रहकर कोई भी यथार्थ उपदेशक या गुरू नहीं बन सकता |

प्रियजन .... भौतिक उलझनों में वही व्यक्ति पड़ता है। जो जीवन की समस्याओं को नहीं समझता | बृहदारण्यक उपनिषद् में (३.८.१०) व्याकुल (व्यग्र) मनुष्य का वर्णन इस प्रकार हुआ है –
 यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माँल्लोकात्प्रैतिसकृपणः–
 “कृपण वह है जो मानव जीवन की समस्याओं को हल नहीं करता और आत्म-साक्षात्कार के विज्ञान को समझे बिना कूकर-सूकर की भाँति संसार को त्यागकर चला जाता है |” जीव के लिए मनुष्य जीवन अत्यन्त मूल्यवान निधि है, जिसका उपयोग वह अपने जीवन की समस्याओं को हल करने में कर सकता है, अतः जो इस अवसर का लाभ नहीं उठाता वह कृपण है | ब्राह्मण ( विद्वान ) इसके विपरीत होता है जो इस शरीर का उपयोग जीवन की समस्त समस्याओं को हल करने में करता है ।
य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माँल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः |
 देहात्मबुद्धि वश कृपण या कंजूस लोग अपना सारा समय परिवार, समाज, देश आदि के अत्यधिक प्रेम में गवाँ देते हैं | मनुष्य प्राय चर्मरोग के आधार पर अपने पारिवारिक जीवन अर्थात् पत्नी, बच्चों तथा परिजनों में आसक्त रहता है | कृपण यह सोचता है कि वह अपने परिवार को मृत्यु से बचा सकता है अथवा वह यह सोचता है कि उसका परिवार या समाज उसे मृत्यु से बचा सकता है | ऐसी पारिवारिक आसक्ति निम्न पशुओं में भी पाई जाती है क्योंकि वे भी बच्चों की देखभाल करते हैं |

प्रियजन .. संसार सागर के इस मोहमायाजाल में फसे हुए प्राणीं विभिन्न साधनों से शान्ति खोजते हैं, किन्तु इन साधनों से उन्हें क्षणिक शान्ति या सुखाभोग कर ही संतोष करना पडता है।

वास्तविक सुख व्यक्ति को तभी तभी मिल पाता है। जब व्यक्ति पूर्ण आत्मज्ञान का अनुभव कर पाता है।

श्रीमद्भगवद्गीता -
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति || २/१३ ||

जिस प्रकार शरीरधारी आत्मा इस (वर्तमान) शरीर में बाल्यावस्था से तरुणावस्था में और फिर वृद्धावस्था में निरन्तर अग्रसर होता रहता है, उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा दूसरे शरीर में चला जाता है | धीर व्यक्ति ऐसे परिवर्तन से मोह को प्राप्त नहीं होता |

प्रत्येक जीव एक व्यष्टि आत्मा है | वह प्रतिक्षण अपना शरीर बदलता रहता है – कभी बालक के रूप में, कभी युवा तथा कभी वृद्ध पुरुष के रूप में | तो भी आत्मा वही रहता है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता | यह व्यष्टि आत्मा मृत्यु होने पर अन्ततोगत्वा एक शरीर बदल कर दूसरे शरीर में देहान्तरण कर जाता है और चूँकि अगले जन्म में इसको शरीर मिलना अवश्यम्भावी है – चाहे वह शरीर आध्यात्मिक हो या भौतिक .....

जिस मनुष्य को व्यष्टि आत्मा, परमात्मा तथा भौतिक और आध्यात्मिक प्रकृति का पूर्ण ज्ञान होता है वह धीर कहलाता है | ऐसा मनुष्य कभी भी शरीर-परिवर्तन या लाभ-हानि , सुख-दुख , एवं मोहादिक द्वंदों द्वारा ठगा नहीं जाता |

आत्मा के एकात्मवाद का मायावादी सिद्धान्त मान्य नहीं हो सकता क्योंकि आत्मा के इस प्रकार विखण्डन से परमेश्र्वर विखंडनीय या परिवर्तनशील हो जायेगा जो परमात्मा के अपरिवर्तनीय होने के सिद्धान्त के विरुद्ध होगा | गीता में पुष्टि हुई है कि परमात्मा के खण्डों का शाश्र्वत (सनातन) अस्तित्व है जिन्हें क्षर कहा जाता है अर्थात् उनमें भौतिक प्रकृति में गिरने की प्रवृत्ति होती है | ये भिन्न अंश (खण्ड) नित्य भिन्न रहते हैं, यहाँ तक कि मुक्ति के बाद भी व्यष्टि आत्मा जैसे का तैसा – भिन्न अंश बना रहता है | किन्तु एक बार मुक्त होने पर वह श्रीभगवान् के साथ सच्चिदानन्द रूप में रहता है | परमात्मा पर प्रतिबिम्बवाद का सिद्धान्त व्यवहृत किया जा सकता है, जो प्रत्येक शरीर में विद्यमान रहता है | वह व्यष्टि जीव से भिन्न होता है | जब आकाश का प्रतिबिम्ब जल में पड़ता है तो प्रतिबिम्ब में सूर्य, चन्द्र तथा तारे सब कुछ रहते हैं | तारों की तुलना जीवों से तथा सूर्य या चन्द्र की परमेश्र्वर से की जा सकती है |

प्रिय भगवद्जन ... विद्रोह , घृणां , वैरभाव या प्रतिघातादिक व्यक्तिमात्र की भावना से बचने के लिए आपको परमात्मा के जीवमात्र में विद्यमान अंश आत्मतत्व के ऐकत्वीकरण का चिंतन करना होगा एवं इसे समझने के लिए आपको मन के विचार गृहण व उत्सर्जन के बारे में समझना होगा  ... प्राणीमात्र का मन एक मोबाइल टावर की तरह होता है। .. जैसे कि मोबाइल टॉवर बहुत सी इनकमिंग या आउटगोइग कॉल का प्रतिक्षण वहन करता है। उसी तरह प्राणीमात्र का मन है। जो प्रतिक्षण अच्छी या बुरी सोच का ग्रहण व त्याग करता है। आप अच्छा या बुरा जैसा भी विचार किसी व्यक्ति के बारे में करते है तो तत्काल वैसा ही चिंतन या विचार संबधित व्यक्ति के मन में भी प्रकट होता है। और उसी अच्छे या बुरे विचारानुसार संबधित व्यक्ति का आपसे लगाव या वैमनष्य बढता जाता है। ... उदा . के लिए आप विचारकर देखिये कि कभी - कभी किसी जन के मिलन पर आपको उसे देखते ही अत्यंन्त प्रसन्नता होती है। भले ही उससे आपको कोई भी लाभ ना होने वाला हो इसी तरह किसी - किसी जन को देखते ही आपके मनमें क्षोभ या घृणां उत्पन्न होती है भले ही संबधित व्यक्ति से आपको कोई भी तात्कालिक हानि ना हुई हो .... इसका कारण यही है। कि संबंधित व्यक्ति   जैसा विचार आपके बारे में अपने मन में रखता है वैसा ही विचार आपके मन में भी उसे देखते ही या उसके बारे में सोचते ही उत्पन्न हो जाता है। ..... विद्रोह , घृणां , वैरभाव या प्रतिघातादिक समस्या इसी वजह से होती है। आपका अगर किसी से विद्रोह या वैमनष्यता है। तो स्वत: आपके उसके प्रति या उसके आपके प्रति विचार भी वैमनष्य या प्रतिघातक होंगे .... अगर दोनो पक्ष समान बलिष्ठ या संम्पन्न होते है तो ये प्रतिघातक विचार बढते हुए पारस्परिक हिंसा का रूप भी ले लेते है। वंही अगर कोई एक पक्ष कमजोर , निस्क्रीय , दबावग्रस्त होता है तब भी उक्त पक्ष या जन के मानसिक विचार उतने ही सबल होते है। उदा. मेरी गलती नहीं फिर भी इसने ऐसा किया या कर रहा है। अगर दबाव का कारण ना होता तो में इसे इसकी सजा अवश्य देता अथवा भगवान सब देख रहा है। वो तुझे तेरे किये का फल अवश्य देगा .... आदि .. आदि ... ऐसे अनेकों विचार है जो विद्रोह या वैमनष्यता को जन्म देते है। इन्हें दूर करने के लिए या संबंधित व्यक्ति की सोच बदलने के लिए आपको अपने आपको बदलना होगा ... आपको तन से ... मन से ... अपने किसी भी क्रियाकलाप से संबंधित व्यक्ति के बारे में निगेटिव विचार या चिंतन नहीं लाना है। सामने वाला व्यक्ति कितना भी आपसे विद्रोहात्मक विचार प्रगट करे पर आप उसके प्रति सिर्फ अच्छे भाव या विचार रखें अपने मन में निगेटिव चिंतन कदापि ना लाएं .... जब आपकी मनोस्थति पूर्णत: संबधित व्यक्ति के बारे में अच्छी हो जाएगी तो उसकी आपके प्रति विद्रोहात्मक मनोस्थिति स्वत: सकारात्मक चिंतन में बदल जाएगी । ......

प्रियजन .....जरा सोचिये भगवद्इच्छा बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो फिर एक विद्रोहीजन आपके प्रति कैसे खडा हो सकता है। कारण स्पष्ट है। हमारे पूर्व कर्म हमारे आडे आ रहे है और हम उन्हीं कर्मों का प्रारब्धवस अच्छे या बुरे रूप में भोग कर रहे है। अत: आप भगवत्प्रेमभावना रखकर ही हर कार्य करें अपने हर कार्य में भगवतार्पण सम्मिलित करें तभी आप अपने प्रारब्ध के क्षय में समर्थ हो सकगें और अपनी विपत्तियो को कम कर सकेंगें ..... जैसे हमारे पूर्व कर्म है। या जो हमारे प्रारब्ध में है। उसे तो हमें भोगना ही पडेगा इस में किसी भी तर्क-वितर्क की गुंजाइश नही है चाहे हम उन्हें हस कर भोगे या रोकर हां उन्है अर्पणादिक क्रिया द्वारा कम किया जा सकता है। कहा भी गया है। कि ...
होइ है सोई जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा ।।

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🌹एक बार प्रेम से बोलिए ...
🌹जय जय श्री राधे ...........
🌹प्यारी श्री " राधे .. "🌹💐
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