शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

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  🌸🌹!:: भगवद्🌹अर्पणम् ::!🌹🌸
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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

🌹भगवान को सिर्फ निस्वार्थभक्ति व प्रेम से ही पाया जा सकता है।

💐 प्रिय भगवद्जन .....

हजारों मनुष्यों में से शायद विरला मनुष्य ही यह जानने में रूचि रखता है कि पमत्मा क्या है , आत्मा क्या है, शरीर क्या है, और परमसत्य क्या है। सामान्यतया मानव आहार, निद्रा, सुख-दुख तथा मैथुन जैसी पशुवृत्तियों में लगा रहता है।

प्रियजन .... भगवान आज के समय में भगवान को निस्वार्थ रूप सें मानने में अनेको में कोई एक मिलता है। इनमें से भी मुश्किल से कोई एक दिव्य आत्मज्ञान में रूचि रखता है। इन अनेकों दिव्य ज्ञानियों में ( जिन्होंने अपने दिव्यज्ञान को आत्मा, परमात्मा तथा ज्ञानयोग, ध्यानयोग द्वारा अनुभूति की क्रिया में बढाया है।) से अनेक ज्ञानियो में से भी भगवान केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वारा ज्ञेय हैं जो भगवद्प्रेम भावनाभावित हैं। जिनके लिए अपने दिव्य प्रेम की वजह से जगत ही भगवद् स्वरूप बन गया है। ऐसे भगवद्प्रेमीजन अत्यंत दुर्लभ है।

भगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता में इसकी पुष्टी की है। -

मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्र्चिद्यतति सिद्धये |
यततामपि सिद्धानां कश्र्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ||

कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई मुझे वास्तव में जान पाता है |

 भगवान् समस्त कारणों के कारण, आदि पुरुष गोविन्द हैं।-
 "ईश्र्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः| अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्|"

सामान्यजन के लिए भगवान को जान पाना अत्यन्त कठिन है | यद्यपि साधारणतया कुछ विद्वजन यह घोषित करते हैं कि भक्ति का मार्ग सुगम है, किन्तु वे इस पर चलते नहीं । यदि भक्तिमार्ग इतना सुगम है जितना कि ये कहते हैं तो फिर वे इस मार्ग को ग्रहण क्यों नहीं करते हैं? वास्तव में भक्तिमार्ग सुगम नहीं है। भक्ति के ज्ञान में हीन अनधिकारी लोगों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला तथाकथित भक्तिमार्ग भले ही सुगम हो, किन्तु जब भगवद् भक्ति के लिए भौतिक संसार को भूलकर भगवान के दिव्य प्रेममार्ग को अपनाने की बात आती है। मीमांसक तथा दार्शनिक इस मार्ग से च्युत हो जाते हैं। श्रील रूप गोस्वामी अपनी कृति भक्तिरसामृत सिन्धु में (१.२.१०१) लिखते हैं –

श्रुति स्मृतिपुराणादि पञ्चरात्रविधिं विना |
एकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते ||

“वह भगवद्भक्ति, जो उपनिषदों, पुराणों तथा नारद पंचरात्र जैसे प्रामाणिक वैदिक ग्रंथों की अवहेलना करती है, समाज में व्यर्थ ही अव्यवस्था फैलाने वाली है |”

"मुह्यन्ति यत्सूरयः | मां तु वेद न कश्र्चन" – भगवान् कहते हैं कि कोई भी मुझे उस रूप में तत्त्वतः नहीं जानता, जैसा मैं हूँ | और यदि कोई जानता है – स महात्मा सुदुर्लभः– तो ऐसा महात्मा विरला होता है | अतः भगवान् की भक्ति किये बिना कोई भगवान् को तत्वतः नहीं जान पाता, भले ही वह महान विद्वान् या दार्शनिक क्यों न हो | केवल शुद्ध भक्त ही भगवान के अचिन्त्य गुणों को सब कारणों के कारण रूप में उनकी सर्वशक्तिमत्ता तथा ऐश्र्वर्य, उनकी सम्पत्ति, यश, बल, सौन्दर्य, ज्ञान तथा वैराग्य के विषय में कुछ-कुछ जान सकता है, क्योंकि भगवान अपने भक्तों पर दयालु होते हैं | ब्रह्म-साक्षात्कार की वे पराकाष्टा हैं और केवल भक्तगण ही उन्हें तत्वतः जान सकते हैं | अतएव भक्तिरसामृत सिन्धु में (१.२.२३४) कहा गया है –

अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः |
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ||

“कुंठित इन्द्रियों के द्वारा कृष्ण को तत्त्वतः नहीं समझा जा सकता । किन्तु भक्तों द्वारा की गई अपनी दिव्यसेवा से प्रसन्न होकर वे भक्तों को आत्मतत्त्व प्रकाशित करते हैं |” अत: भगवान का यथार्थ प्रेम प्राप्त करने व दर्शन की इच्छा रखने वाले भगवद्प्रेमीभक्त को भगवान के दिव्यप्रेम व भक्ति को पाने के लिए भौतिक सुखाभोग की लालसा को छोडकर निस्वार्थ भक्तिप्रेम में रत होना चाहिये ।

       .... ✍🏻 : कृष्णा :: श्री राधा प्रेमी :

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 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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          🌹एक बार प्रेम से बोलिए ..
          🌸 जय जय " श्री राधे ".....
          🌹प्यारी श्री .....  " राधे "🌹
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