गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

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🔅धर्म की परिभाषा :

💐 प्रिय भगवद्जन.....

यतो ऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।
धर्म वह अनुशासित जीवन क्रम है, जिसमें लौकिक उन्नति (अविद्या) तथा आध्यात्मिक परमगति (विद्या) दोनों की प्राप्ति होती है।

धर्म का शाब्दिक अर्थ :धर्म एक संस्कृत शब्द है। धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है। ध + र् + म = धर्म। ध देवनागरी वर्णमाला 19वां अक्षर और तवर्ग का चौथा व्यंजन है। भाषाविज्ञान की दृष्टि से यह दन्त्य, स्पर्श, घोष तथा महाप्राण ध्वनि है। संस्कृत (धातु) धा + ड विशेषण- धारण करने वाला, पकड़ने वाला होता है। जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। पृथ्वी समस्त प्राणियों को धारण किए हुए है। जैसे हम किसी नियम को, व्रत को धारण करते हैं इत्यादि। इसका मतलब धर्म का अर्थ है कि जो सबको धारण किए हुए है अर्थात धारयति- इति धर्म:!। अर्थात जो सबको संभाले हुए है। सवाल उठता है कि कौन क्या धारण किए हुए हैं? धारण करना सही भी हो सकता है और गलत भी!
धारण करने योग्य क्या है?
सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, क्षमा आदि।...बहुत से लोग कहते हैं कि धर्म के नियमों का पालन करना ही धर्म को धारण करना है जैसे ईश्वर प्राणिधान, संध्या वंदन, श्रावण माह व्रत, तीर्थ चार धाम, दान, मकर संक्रांति-कुंभ पर्व, पंच यज्ञ, सेवा कार्य, पूजा पाठ, 16 संस्कार और धर्म प्रचार आदि।... लेकिन उक्त सभी कार्य व्यर्थ है तब जबकि आप सत्य के मार्ग पर नहीं हो। सत्य को जानने से अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौचादि सभी स्वत: ही जाने जा सकते हैं। अत: सत्य ही धर्म है और धर्म ही सत्य है।...जो संप्रदाय, मजहब, रिलिजन और विश्वास सत्य को छोड़कर किसी अन्य रास्ते पर चल रही है वह सभी अधर्म के ही मार्ग हैं। इसीलिए हित्दुत्व में कहा गया है "सत्यंम शिवम सुंदरम्"।

मनु ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं:-
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥
(धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा किए गए अपराध को माफ कर देना, क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (आंतरिक और बहारी शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश में रखना), धी: अर्थात् बुद्धि (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना); ये दस धर्म के लक्षण हैं।)

प्रियजन...इसी संदर्भ में अगर हम महाभारत में देखें तो यहां हमें धर्म की व्याख्या इस प्रकार मिलती है।:-

उदार मेव विद्वांसो धर्मं प्राहुर्मनीषिण:।
मनीषी जन उदारता को ही धर्म कहते है।

आरम्भो न्याययुक्तो य: स हि धर्म इति स्मृत:।
जो आरम्भ (उपक्रम या योजना) न्यायसंगत हो वही धर्म कहा गया है।

स्वकर्मनिरतो यस्तु धर्म: स इति निश्चय:।
अपने कर्म में लगे रहना निश्चय ही धर्म है।

नासौ धर्मों यत्र न सत्यमस्ति।
जिसमें सत्य नहीं वह धर्म, धर्म ही नहीं है।

यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं सधर्म:।
जो जैसा व्यवहार करे ऋजु भी उससे वैसा ही व्यवहार करे, यह धर्म है।

धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजा:।
धर्म ही प्रजा को धारण करता है इसलिये ही उसे धर्म कहते है।

दण्डं धर्मं विदुर्बुधा:।
ज्ञानी जन दण्ड को धर्म मानते है।

अद्रोहेणैव भूतानां यो धर्म: स सतां मत:।
जीवों से द्रोह किये बिना जो धर्म हो संतों के मत में वही श्रेष्ठ धर्म है।

य: स्यात् प्रभवसंयुक्त: स धर्म इति निश्चय:।
जिसमें कल्याण करने का सामर्थ्य है वही धर्म है।

धर्मस्याख्या महाराज व्यवहार इतीष्यते।
महाराज! धर्म का ही नाम व्यवहार है।

मानसं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिण:।
मनीषी व्यक्तियों का कथन है कि समस्त प्राणियों के मन में धर्म है।

बुद्धिसंजननो धर्म आचारश्च सतां सदा।
धर्म और सज्जनों का आचार व्यवहार दोनों बुद्धि से ही प्रकट होते हैं।

सदाचार: स्मृतिर्वेदास्त्रिविधं धर्मलक्षणम्।
वेद, स्मृति और सदाचार ये तीन धर्म के लक्षण हैं।

अनेकांत बहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीषिण:।
मनीषी कहते हैं धर्म के साधन और फल अनेक हैं।

धर्मं हि श्रेय इत्याहु:।
धर्म के ही कल्याण कहते हैं या कल्याण को ही धर्म कहते हैं।

दरअसल,धर्म मूल स्वभाव की खोज है। धर्म एक रहस्य है, संवेदना है, संवाद है और आत्मा की खोज है। धर्म स्वयं की खोज का नाम है। जब भी हम धर्म कहते हैं तो यह ध्वनीत होता है कि कुछ है जिसे जानना जरूरी है। कोई शक्ति है या कोई रहस्य है। धर्म है अनंत और अज्ञात में छलांग लगाना। धर्म है जन्म, मृत्यु और जीवन को जानना।

हिन्दू संप्रदाय में धर्म को जीवन को धारण करने, समझने और परिष्कृत करने की विधि बताया गया है। धर्म को परिभाषित करना उतना ही कठिन है जितना ईश्वर को। दुनिया के तमाम विचारकों ने -जिन्होंने धर्म पर विचार किया है, अलग-अलग परिभाषाएं दी हैं।इस नजरिए से वैदिक ऋषियों का विचार सबसे ज्यादा उपयुक्त लगता है कि सृष्टि और स्वयं के हित और विकास में किए जाने वाले सभी कर्म धर्म हैं।

         ...... ✍🏻 : कृष्णा :: श्री राधा प्रेमी :

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गुरुवार, 26 जनवरी 2017

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🌹 "स्व:सत्" का भाव "असत् अहं" का अभाव :

एक बहुत सुगम बात है। उसे विचारपूर्वक गहरी रीतिसे समझ लें तो तत्काल तत्त्वमें स्थित हो जायँ। जैसे राजाका राज्यभरसे सम्बन्ध होता है, वैसे ही परमात्मतत्त्वका मात्र वस्तु, व्यक्ति, क्रिया आदिके साथ सम्बन्ध है। राजाका सम्बन्ध तो मान्यतासे है, पर परमात्माका सम्बन्ध वास्तविक है। हम परमात्माको भले ही भूल जायँ, पर उसका सम्बन्ध कभी नहीं छूटता। आप चाहे युग-युगान्तरतक भूले रहें तो भी उसका सम्बन्ध सबसे एक समान है। आपकी स्थिति जाग्रत्, स्वप्न या सुषुप्ति किसी अवस्थामें हो, आप योग्य हों या अयोग्य, विद्वान् हों या अनपढ़, धनी हों या निर्धन, परमात्माका सम्बन्ध सब स्थितियोंमें एक समान है। इसे समझनेके लिये युक्ति बताता हूँ। आप मानते हैं कि बालकपनमें था, अभी मैं हूँ और आगे वृद्धावस्थामें भी मैं रहूँगा। बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था—तीनोंका भेद होनेसे ‘था’, ‘हूँ’ और ‘रहूँगा’ ये तीन भेद हुए, पर अपने होनेपनमें क्या फर्क पड़ा ? भूत, वर्तमान और भविष्य— तीनोंमें अपना होनापन (सत्ता) तो एक ही रहा। अत: आप कैसे भी हों, कैसे भी रहें, आपकी सत्ता एक समान अखण्ड रहती है। आपका कभी अभाव नहीं होता। वह सत्ता ही शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिको सत्ता-स्फूॢत देती है। वह शरीरादिके आश्रित नहीं है। इससे यह सिद्ध हुआ कि आप हरदम ‘है’ में स्थित रहते हैं। जड़ वस्तु, क्रिया आदिका सम्बन्ध न रखकर ‘है’ से सम्बन्ध रखना है। यह जाग्रत्में सुषुप्ति है।

वह सत्ता मन, बुद्धि, इन्द्रियों, शरीरकी क्रियाओंमें अनुस्यूत है। वही मन, बुद्धि आदिका प्रकाशक, आधार है। उस सर्व-प्रकाशक, सर्वाधारमें हमें स्थित रहना है। वह सत्ता सदा ज्यों-की-त्यों रहती है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, स्थिरता, चंचलता, योग्यता, अयोग्यता, बालकपन, जवानी, वृद्धावस्था, विपत्ति, सम्पत्ति, विद्वत्ता, मूर्खता आदि सभी उस सत्तासे प्रकाश पाते हैं। वस्तुत: उसमें आपकी स्थिति स्वत:सिद्ध है। केवल उसकी ओर लक्ष्य, दृष्टि करनी है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिके साथ सम्बन्ध ही मोह है। इस मोहका नाश होनेपर स्मृति जाग्रत् हो जाती है—
‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’ (गीता १८। ७३)।
स्मृतिका अर्थ—जो बात पहलेसे ही थी, उसकी याद आ गयी। कोई नया ज्ञान होना स्मृति नहीं है। अब चाहे कुछ हो जाय, चाहे कोई व्यथा हमारा स्वरूप सच्चिदानन्द है आ जाय, अपनी सत्तामें क्या फर्क पड़ता है ? केवल अपनी सत्ताकी ओर दृष्टि करनी है, फिर इसी क्षण जीवन्मुक्ति है। इसमें कोई अभ्यास नहीं करना है।

सत्ताकी ओर दृष्टि न करें, तब भी वह वैसी-की-वैसी ही रहती है। पर उस ओर दृष्टि न करनेसे आप अपनी स्थिति क्रियाओं, पदार्थों, अवस्थाओं आदिमें मानते हैं। भोजन करते समय ‘मैं खाता हूँ’, जल पीते समय ‘मैं पीता हूँ’, जाते समय ‘मैं जाता हूँ’ आदि सब स्थितियों में ‘हूँ’ समान ही रहता है। यदि ‘मैं’ को हटा दें तो ‘हूँ’ नहीं रहेगा अपितु ‘है’ रहेगा। वह ‘है’ सदा ज्यों-का-त्यों रहता है।

खोया कहे सो बावरा पाया कहे सो कूर ।
पाया खोया कुछ नहीं ज्यों-का-त्यों भरपूर।।

इस ‘है’ में स्थित होते ही अखण्ड समाधि, जाग्रत् , सुषुप्ति हो जाती है।

              ....... 🌹संत प्रसादम्🌹

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शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

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🌹भगवद्दर्शनकी उत्कण्ठा :

( गत ब्लॉग से आगे )

भगवत्प्रेमकी अवस्था ही अनोखी होती है। भगवान्‌का प्रसंग चल रहा है, उनकी मधुर चर्चा चल रही है, उस समय यदि स्वयं भगवान् भी आ जायँ तो प्रसंग चलाता रहे, भंग न होने दे। प्रियतम-चर्चामें एक अद्‌भुत मिठास होती है, जिसकी चाट लग जानेपर और कुछ सुहाता ही नहीं। प्रीतिकी रीति अनोखी है। प्रभुकी प्रीतिका रस जिसने पा लिया उसे और पाना ही क्या रहा? प्रभु तो केवल प्रेम देखते हैं। स्वयं प्रभुसे बढ़कर प्रभुका प्रेम है। श्रद्धा-भक्तिपूर्वक प्रभुके गुण, प्रभाव, तत्त्व तथा रहस्यसहित ध्यानमें तन्मय होकर प्रभुके प्रेमामृतका पान करना ही प्रभुकी प्रीतिका आस्वादन करना है या हरिके रसमें डूबना है।

दो प्रेमियोंमें यदि न बोलनेकी शर्त लग जाय तो अधिक प्रेमवाला ही हारेगा। पति-पत्नीमें यदि न बोलनेका हठ हो जाय तो वही हारेगा जिसमें अधिक स्नेह होगा। इसी प्रकार जब भक्त और भगवान्‌में होड़ होती है तो भगवान्‌को ही हारना पड़ता है, क्योंकि प्रभुसे बढ़कर प्रेमी कोई नहीं है। उन्हें इतना व्याकुल कर देना चाहिये कि हमारे बिना वे एक क्षण भी न रह सकें। फिर उन्हें हार माननी ही पड़ेगी – आनेके लिये बाध्य होना ही पड़ेगा। हमें व्यवस्था ही ऐसी कर देनी चाहिये, प्रेमसे उन्हें मोहित कर देना चाहिये। फिर तो धक्का देनेपर भी वे नहीं हटेंगे।

प्रभुके साथ हमारा व्यवहार वैसा ही होना चाहिये जैसा स्त्रीका अपने पतिके साथ। जैसे स्त्री अपने प्रेम और हाव-भावसे पतिको मोहित कर लेती है वैसे ही हमें भगवान्‌को अपने प्रेम और आचरणसे मोहित कर लेना चाहिये। उसे अपनेमें आसक्त भी कर ले और खुशामद भी न करे। फिर तो वह एक पलके लिये भी हमारे द्वारपरसे हटनेका नहीं। वह प्रेमका भिखारी प्रेमका बंदी बना बैठा है, जायगा कहाँ? पति पत्नीके प्यारको ठुकरा ही कैसे सकता है? इसी प्रकार प्रभु भी अपने भक्तके प्यारका तिरस्कार कैसे कर सकते हैं? ऐसा हो जानेपर उनसे हमारे बिना रहा ही कैसे जायगा? वे तो सदा प्रेमके अधीन रहते हैं। एक बार प्रभुको अपने प्रेम-पाशमें बाँध ले, फिर तो वे सदाके लिये बँध जाते हैं।

प्रभुको वशीभूत करनेका ढंग स्त्रीसे सीखना चाहिये। इसी प्रकारका सम्बन्ध उनसे जोड़ना चाहिये। यही माधुर्यभाव है। बाहरका वेष न बदले, भीतर प्रेमकी प्रगाढ़तामें उसीका बन जाय। यही उन्हें प्राप्त करनेका सर्वोत्तम उपाय है।

प्रभु बड़े दयालु और उदारचित्त हैं। इसलिये थोड़े प्रेमसे भी वे प्राप्त हो सकते हैं, किन्तु हमलोगोंको उपर्युक्त प्रेमको लक्ष्य बनाकर ही चलना चाहिये। क्योंकि उच्च लक्ष्य बनाकर चलनेसे ही प्रेमकी प्राप्ति होती है। यदि लक्ष्यके अनुसार पूर्ण प्रेम हो जाय तब तो अत्यन्त सौभाग्यकी बात है; ऐसे पुरुष तो आदर्श एवं दर्शनीय समझे जाते हैं, उनके कृपाकटाक्षसे दूसरे भी कृतकृत्य हो जाते हैं; फिर उनकी तो बात ही क्या?
               ..... 🌹संत वचनामृतम्🌹

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🌹भगवद्दर्शनकी उत्कण्ठा :

( गत ब्लॉग से आगे )

भगवान्‌के दर्शनमें जो विलम्ब हो रहा है उसका एकमात्र कारण दृढ़ श्रद्धा-विश्वासका अभाव ही है। चाहे जिस प्रकार निश्चय हो जाय, निश्चय हो जानेपर भगवान् न आवे ऐसा हो नहीं सकता। वे अपने भक्तोंको निराश नहीं करते, यही उनका बाना है। यह दूसरी बात है कि बीच-बीचमें हमारे मार्गमें ऐसे विघ्न आ खड़े हों जिनके कारण हमारा मन विचलित-सा हो जाय। परन्तु यदि साधक उस समय सँभलकर प्रभुको दृढ़तापूर्वक पकड़े रहे और विघ्नोंसे प्रह्लादकी भाँति न घबड़ाये तो उसका काम अवश्य ही बन जाता है। प्रभु तो हमारी श्रद्धाको पक्की करनेके लिये ही कभी निष्ठुर और कभी कोमल व्यवहार और व्यवस्था किया करते हैं।

वास्तविक श्रद्धा इतनी बलवती होती है कि भगवान्‌को बाध्य होकर उस श्रद्धाको फलीभूत करनेके लिये प्रकट होना पड़ता है। पारस यदि पारस है और लोहा यदि लोहा है तो स्पर्श होनेपर सोना होगा ही। उसी प्रकार श्रद्धावान्‌को भगवान्‌की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु भक्तकी कमीकी पूर्ति करके भगवान् उसके कार्यको सिद्ध कर देते हैं। श्रद्धा होनेपर सारी कमीकी पूर्ति भगवान्‌की कृपासे अपने-आप हो जाती है। हमलोगोंमें श्रद्धा-प्रेमकी कमी मालूम होती है, इसीलिये भगवान् प्रकट नहीं होते। अन्यथा उनके दयालु और प्रेमपूर्ण स्वभावको देखते हुए तो वे दर्शन दिये बिना रह सकें ऐसा हो नहीं सकता। रावणके द्वारा सीताके हरे जानेपर उसके लिये श्रीराम ऐसे व्याकुल होते हैं जैसे कोई कामी पुरुष अपनी प्रेयसीके लिये होता है। इसका कारण क्या था? कारण यही था कि सीता एक क्षणके लिये भी रामके बिना नहीं रह सकती थी। भगवान् कहते हैं – जो मुझको जैसे भजते हैं उनको भी मैं वैसे ही भजता हूँ।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।(गीता ४।११)

भगवान् तो प्रकट होनेके लिये तैयार हैं। वे मानो चाहते हैं कि लोग मुझसे प्रेम करें और मैं प्रकट होऊँ। सीताका जैसा उत्कट प्रेम भगवान् रामचन्द्रमें था वैसा ही प्रेम यदि हमलोगोंका प्रभुमें हो जाय तो प्रभु हमारे लिये भी तैयार हैं। जो हरिके लिये लालायित है उसके लिये हरि भी वैसे ही लालायित रहते हैं।

प्रभुमें श्रद्धा-प्रेम बढ़े, उनका चिन्तन बना रहे – एक पलके लिये भी उनका विस्मरण न हो, ऐसा ही लक्ष्य हमारा सदा बना रहना चाहिये। हमें वे चाहे जैसे रखें और चाहे जहाँ रखें, उनकी स्मृति अटल बनी रहनी चाहिये। उनकी राजीमें ही अपनी राजी, उनके सुखमें ही अपना सुख मानना चाहिये। प्रभु यदि हमें नरकमें रखना चाहें तो हमें वैकुण्ठकी ओर भी नहीं ताकना चाहिये और नरकमें वास करनेमें ही परम आनन्द मानना चाहिये। सब प्रकारसे प्रभुकी शरण हो जानेपर फिर उनसे इच्छा या याचना करना नहीं बन सकता। जब प्रभु हमारे और हम प्रभुके हो गये तो फिर बाकी क्या रहा? हम तो प्रभुके बालक हैं। माँ बालकके दोषोंपर ध्यान नहीं देती। उसके हृदयमें बालकके लिये अपार प्यार रहता है। प्रभु यदि हमारे दोषोंका खयाल करें तो हमारा कहीं पता ही न लगे। प्रभु तो इस बातके लिये सदा उत्सुक रहते हैं कि कोई रास्ता मिले तो मैं प्रकट होऊँ। किन्तु हमीं लोग उनके प्रकट होनेमें बाधक हो रहे हैं। देखनेमें तो ऐसी बात नहीं मालूम होती, ऊपरसे हम उनके दर्शनके लिये लालायित-से दीखते हैं; परन्तु भीतरसे उन्हें पानेकी लालसा कहाँ है? मुँहसे हम भले ही न कहें कि अभी ठहरो, परन्तु हमारी क्रियासे यही सिद्ध होता है। प्रभुके प्रकट होनेमें विलम्ब सहन करना ही उन्हें ठहराना है। प्रभुसे हमारा विछोह इसीलिये हो रहा है कि उनके वियोग (विछोह)-में हमें व्याकुलता नहीं होती। जब हम ही उनका वियोग सहनेके लिये तैयार हैं और कभी उनके वियोगमें हमारे मनमें व्याकुलता या दुःख नहीं होता, तब प्रभुको ही क्यों परवा होने लगी? यदि हमारे भीतर तड़पन होती और इसपर भी वे न आते तो हमें कहनेके लिये गुंजाइश थी। खुशीसे हम उनके बिना जी रहे हैं। इस हालतमें वे यदि न आवे तो इसमें उनका क्या दोष है? प्रकट होनेके लिये तो वे तैयार हैं, पर जबतक हमारे अंदर उत्सुकता नहीं होती तबतक वे आवे भी कैसे? उनका दर्शन प्राप्त करनेके लिये आवश्यकता है प्रबल चाहकी। वह चाह कैसी होनी चाहिये, इस बातको प्रभु ही पहचानते हैं। जिस चाहसे वे प्रकट हो जाते हैं वही चाह असली चाह समझनी चाहिये। अत: जबतक वे न आयें चाह बढ़ाता ही रहे। घड़ा भर जानेपर पानी अपने-आप ऊपरसे बह चलेगा।

( शेष आगे के ब्लॉग में )

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🌹भगवद्दर्शनकी उत्कण्ठा :

बहुत-से लोग कहा करते हैं कि यथाशक्ति चेष्टा करनेपर भी भगवान् हमें दर्शन नहीं देते। वे लोग भगवान्‌को ‘निष्ठुर, कठोर’ आदि शब्दोंसे सम्बोधित किया करते हैं तथा ऐसा मान बैठे है कि उनका हृदय वज्रका-सा है और वे कभी पिघलते ही नहीं। उन्हें क्या पड़ी है कि वे हमारी सुध लें, हमें दर्शन दें और हमें अपनायें –  ऐसी ही शिकायत बहुत-से लोगोंकी रहती है।

परन्तु बात है बिलकुल उलटी। हमारे ऊपर प्रभुकी अपार दया है। वे देखते रहते हैं कि जरा भी गुंजाइश हो तो मैं प्रकट होऊँ, थोड़ा भी मौका मिले तो भक्तको दर्शन दूँ। साधनाके पथमें वे पद-पदपर हमारी सहायता करते रहते हैं। लोकमें भी यह देखा जाता है कि जहाँ विशेष लगाव होता है, जिस पुरुषका हमारे प्रति विशेष आकर्षण होता है उनके पास और सब काम छोड़कर भी हमें जाना पड़ता है। जहाँ नहीं जाना होता वहाँ प्राय: यही मानना चाहिये कि प्रेमकी कमी है, जब हम साधारण मनुष्योंकी भी यह हालत है तब भगवान्, जो प्रेम और दयाके अथाह सागर हैं, यदि थोड़ा प्रेम होनेपर भी हमें दर्शन देनेके लिये तैयार रहें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है?

भगवान्‌के प्रकट होनेमें जो विलम्ब हो रहा है उसमें मुख्य कारण हमारी लगनकी कमी ही है। प्रभु तो प्रेम और दयाकी मूर्ति ही हैं। फिर वे आनेमें विलम्ब क्यों करते हैं? कारण स्पष्ट है। हम उनके दर्शनके लायक नहीं हैं। हममें अभी श्रद्धा और प्रेमकी बहुत कमी है। यदि हम उसके लायक होते तो भगवान् स्वयं आकर हमें दर्शन देते; क्योंकि भगवान् परमदयालु, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् अरि सर्वान्तर्यामी हैं। किन्तु हमारे अंदर उनके प्रति श्रद्धा और प्रेमकी बहुत ही कमी है। अतएव श्रद्धा और प्रेमकी वृद्धिके लिये हमें उनके तत्त्व, रहस्य, गुण और प्रभावको जाननेकी प्राणपर्यन्त चेष्टा करनी चाहिये। भगवान्‌में श्रद्धा और प्रेम हो जानेपर वे न मिलें ऐसा कभी हो नहीं सकता। बाध्य होकर भगवान् अपने श्रद्धालु भक्तकी श्रद्धाको फलीभूत करते ही हैं। जबतक उनकी कृपापर पूरा विश्वास नहीं होता तबतक प्रभुका प्रसाद हमें कैसे प्राप्त हो सकता है? यदि हमारा यह विश्वास हो जाय कि भगवान्‌के दर्शन होते हैं और अमुक व्यक्तिने भगवान्‌के दर्शन किये हैं, तो उसके साथ हमारा व्यवहार कैसा होगा, इसका भी हमलोग अनुमान नहीं कर सकते। फिर स्वयं भगवान्‌के मिलनेसे जो दशा होती है, उसका तो अंदाजा लगाना ही असम्भव है।

रासलीलाके समय भगवान्‌के अन्तर्धान हो जानेपर गोपियोंकी कैसी दशा हुई? एक क्षणके लिये भी उन्हें भगवान्‌का वियोग असह्य हो गया, अतएव बाध्य होकर भगवान्‌को प्रकट होना पड़ा। दुर्वासाके दस हजार शिष्योंसहित भोजनके लिये असमयमें उपस्थित होनेपर, उन्हें भोजन करानेका कोई उपाय न दीखनेपर, द्रौपदी व्याकुल होकर भगवान्‌का स्मरण करने लगी और उसके पुकारते ही भगवान् इस प्रकार प्रकट हो गये जैसे मानो वहीं खड़े हों। विश्वास होनेसे प्राय: यही अवस्था सभी भक्तोंकी होती है। भक्त नरसी मेहताको दृढ़ विश्वास था कि उसकी लड़कीका भात भरनेके लिये हरि आयेंगे ही और वे मगन होकर गाने लगे ‘बाई आसी आसी आसी, हरि घणै भरोसे आसी।’ हरिके आनेमें उन्हें तनिक भी शंका नहीं थी। अतएव भगवान्‌को समयपर आना ही पड़ा।

( शेष आगे के ब्लॉग में )

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गुरुवार, 19 जनवरी 2017

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🌹भौतिक भोग एवं दैनिक क्रियाकलाप में बंधा हुआ मन भगवद् ध्यानसाधना में केसे प्रवत्त हो ?

( गत ब्लॉग से आगे )

💐 प्रिय भगवद्जन .....

ध्यानयोगाभ्यास में समाधि की सर्वोच्च अवस्था भगवद्भावनामृत है। केवल इस ज्ञान से कि भगवान प्रत्येक जन के हृदय में परमात्मा रूप में उपस्थित हैं ध्यानस्थ योगी निर्दोष हो जाता है। वेदों में (गोपालतापनी उपनिषद् १.२१) भगवान् की इस अचिन्त्य शक्ति की पुष्टि इस प्रकार होती है –
 एकोऽपि सन्बहुधा योऽवभाति– “यद्यपि भगवान् एक हैं, किन्तु वह जितने सारे हृदय हैं उनमें उपस्थित रहते है।” इसी प्रकार स्मृति शास्त्र का कथन है।–

एक एव परो विष्णुः सर्वव्यापी न संशयः |
ऐश्र्वर्याद् रुपमेकं च सूर्यवत् बहुधेयते ||

“विष्णु एक हैं फिर भी वे सर्वव्यापी हैं । एक रूप होते हुए भी वे अपनी अचिन्त्य शक्ति से सर्वत्र उपस्थित रहते हैं, जिस प्रकार सूर्य एक ही समय अनेक स्थानों में दिखता है।” अत: ध्यानयोग साधना में सदैव इस बात का स्मर्ण रखना चाहिये ।

प्रियजन .... मन की चंचलता या अस्थिरता उसकी नेष्ठिक प्रवत्ती है। जिसे मिटाया नहीं जा सकता है। किंतु उसे एक विशेष धारणा या सभी में भगवद्भावना रखकर बदला जा सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार -

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ||

जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है उसके लिए न तो मैं कभी अदृश्य होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है |

जड-चेतनमय जो दृश्य जगत है।सर्वत्र भगवान है। अत: ध्यानयोग साधना में रत साधक को मन खुला छोड देना चाहिये मन जहां भी जाऐ जाने दें , आँखों में जो भी दृश्य दिखाई दे दिखने दें बस मन की भावना बदल दे जो भी दिख रहा है। उसे भगवद् स्वरूप समझना चाहिये , दिखाई देने वाला दृश्य चाहे उच्च कोटि का हो चाहे हीन कोटि का साधक को ना ही उच्चता या सुंदरता के प्रलोभन में फसना है। और ना ही दृश्य को हीन समझकर घृणां करना है। बस उसी दृश्य को भगवद् स्वरूप समझकर प्रणामकर अपना प्रेमभाव अर्पण करना है। साधक के मन में जो भी विचार , स्मृति , ज्ञान या दृश्य उभरते है। सभी में भगवद् प्रेरणा होती है। यथा-

सर्वस्य चाहं ह्रदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च |

मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझ से ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति होती है।
             ( श्रीमद्भगवद्गीता )

प्रियजन .... साधक द्वारा निरंतर सभी में भगवद्भावना व चिंतन रखने पर स्मृति में आने वाले समस्त विचार एवं दिखाई देने समस्त दृश्य भगवद्भाव में परिवर्तित हो जाते है। जिस तरह की भृंगी द्वार बद्ध जीव निरंतर चिंतन से भृंगी में ही परावर्तित हो जाता है।

ध्यानयोग साधना की पूर्णता में साधक हृदय में भगवद्भावना एवं सर्वत्र भगवद्स्वरूप का ही दर्शन करने लगता है।-

सर्वभूतस्थमात्मनं सर्वभूतानि चात्मनि |
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ||

वास्तविक ध्यानस्थयोगी समस्त जीवों में मुझको तथा मुझमें समस्त जीवों को देखता है। निस्सन्देह स्वरूपसिद्ध व्यक्ति मुझ परमेश्र्वर को सर्वत्र देखता है।
             ( श्रीमद्भगवद्गीता )

भक्तिमय ध्यानयोग के सम्बन्ध में रूप गोस्वामी का कथन है –

उत्साहान्निश्र्चयाध्दैर्यात् तत्तत्कर्म प्रवर्तनात् |
संगत्यागात्सतो वृत्तेः षङ्भिर्भक्तिः प्रसिद्धयति ||

“मनुष्य पूर्ण हार्दिक उत्साह, धैर्य तथा संकल्प के साथ भक्तियोग का पूर्णरूपेण पालनकर निर्धारित कर्मों के करने तथा सत्कार्यों में पूर्णतया लगे रहने से स्वरूपसिद्ध होकर भगवान को प्राप्त कर सकता है |” (उपदेशामृत– ३)

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🌹भौतिक भोग एवं दैनिक क्रियाकलाप में बंधा हुआ मन भगवद् ध्यानसाधना में कैसे प्रवत्त हो ?

💐 प्रिय भगवद्जन ....

आपके प्रश्नानुसार ....

🌹हमें ध्यान किस प्रकार करना चाहिए, क्योंकि ध्यान करते समय मन में तरह तरह कि बातें आती है, जो ध्यान को भंग कर देती है ?

प्रियजन .... योगाभ्यास ( ध्यान ) करने में साधक को मन तथा इन्द्रियों के निग्रह के साथ-साथ अन्य कई समस्याओं का सामना करना पडता है। भौतिक जगत् में साधना में तत्पर साधक जीवात्मा मन तथा इन्द्रियों के द्वारा सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। वास्तव में शुद्ध जीवात्मा इस भौतिक संसार में इसीलिए फँसा हुआ है क्योंकि मन मिथ्या अहंकार में लगकर प्रकृति के प्रभाव में होते हुए भी प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व जताना चाहता है। जो कि असाध्य है। जीव को मन का निग्रह इस प्रकार  करना चाहिए कि वह प्रकृति की तड़क-भड़क एवं भोग-विलास से आप्लावित छटा को क्षणिक एवं अस्थिर जान आकृष्ट न हो और इस तरह बद्ध जीवात्मा स्वयं की रक्षा कर सके । साधक भक्त को इन्द्रियविषयों से आकृष्ट होकर अपने को पतित नहीं करना चाहिए । जो जितना ही इन्द्रियजनित विषयों के प्रति आकृष्ट होता है वह उतना ही इस संसार में फँसता जाता है । अपने को विरत करने का सर्वोत्कृष्ट साधन यही है कि मन को सदैव भगवद्भावना में निरत रखा जाय ।

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार -

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः |
अनात्मस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ||

जिसने मन को जीत लिया है उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया इसके लिए मन सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा ।

अमृतबिन्दु उपनिषद् में कहा भी गया है –

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः|
बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः ||

“मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का भी कारण है। इन्द्रियविषयों में लीन मन भवबन्धन का कारण है और विषयों से विरक्त मन मोक्ष का कारण है।” अतः जो मन निरन्तर भगवद्भावना में लगा रहता है, वही परम मुक्ति का कारण है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ध्यानयोगाभ्यास का साधन इस प्रकार वर्णित है।-

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः |
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ||

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः |
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविश्रुद्धये ||

ध्यानयोगाभ्यास के लिए साधक  एकान्त स्थान में जाकर भूमि पर कुशा बिछा दे और फिर ऊपर से मृगछाल अथवा मुलायम शुद्धवस्त्र बिछा दे । आसन न तो बहुत ऊँचा हो, न बहुत नीचा । यह पवित्र स्थान में स्थित हो । साधक को चाहिए कि इस पर दृढ़तापूर्वक बैठ जाय और मन, इन्द्रियों तथा कर्मों को वश में करते हुए तथा मन को एक बिन्दु पर स्थित करके हृदय को शुद्ध करने के लिए ध्यानयोगाभ्यास करे ।

समं कायशिरोग्रीवं धार्यन्नचलं स्थिरः |
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्र्चानवलोकयन् ||

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः |
मनः संयम्य मच्चितो युक्त आसीत मत्परः ||

ध्यानयोग साधना करने वाले को चाहिए कि वह अपने शरीर, गर्दन तथा सर को सीधा रखे और नाक के अगले सिरे पर दृष्टि लगाए । इस प्रकार वह अविचलित तथा दमित मन से, भयरहित, विषयीजीवन से पूर्णतया मुक्त होकर अपने हृदय में मेरा चिन्तन करे और मुझे हि अपना चरम लक्ष्य बनाए ।

साधना में तत्पर साधक को अपने आहार व नियमादिक का भी ध्यान रखना चाहिये -

नात्यश्र्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः|
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ||

हे अर्जुन! जो अधिक खाता है या बहुत कम खाता है, जो अधिक सोता है अथवा जो पर्याप्त नहीं सोता उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है ।

प्रियजन ... जैसा कि प्रश्न है। इस भौतिक जीव जगत में दैनिक क्रियाकलापो में बद्ध साधक ध्यान करने में "श्रीमद्भगवद्गीता" में उल्लेखित साधनानुसार तत्पर नहीं हो पाता है। अत: इसके लिए हम आपको श्री राधेरानी की कृपा से सरल व सुगम ध्यानसाधना विधी वर्णित करते है।

( शेष आगे के ब्लॉग में )

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