बुधवार, 11 जनवरी 2017

🚩🔱 ❄: «ॐ»«ॐ»«ॐ» :❄ 🔱🚩

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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
 ※❖ॐ∥▩∥श्री∥ஜ ۩۞۩ ஜ∥श्री∥▩∥ॐ❖※

प्रिय भगवद्भक्तजन .... आपके प्रश्नानुसार व्यक्ति की संतुष्टी कब संभव है प्रतिघातक इच्छा व तृष्णा से भरे इस जनसागर से बचना किस प्रकार संभव है ?

प्रियजन ..... यह सिर्फ आपकी ही नहीं वरन् ज्यादातर व्यक्तियों की समस्याऐं है । समस्याऐं जैसे – जन्म, मृत्यू , जरा, व्याधि , हानि , लाभाआदिक – की निवृत्ति धन-संचय तथा आर्थिक विकास से संभव नहीं है | विश्र्व के विभिन्न भागों में ऐसे राज्य हैं जो जीवन की सारी सुविधाओं से तथा सम्पत्ति एवं आर्थिक विकास से पूरित हैं, किन्तु फिर भी उनके सांसारिक जीवन की समस्याएँ ज्यों की त्यों बनी हुई हैं । यह प्राकृतिक नियम है कि भौतिक कार्यकलाप की प्रणाली ही हर एक के लिए चिन्ता का कारण है | पग-पग पर उलझन मिलती है, अतः  गुरु के पास जाना आवश्यक है, जो जीवन के उद्देश्य को पूरा करने के लिए समुचित पथ-निर्देश दे सके | समग्र वैदिक ग्रंथ हमें यह उपदेश देते हैं कि जीवन की अनचाही उलझनों से मुक्त होने के लिए  गुरु के पास जाना चाहिए | ये उलझनें उस दावाग्नि के समान हैं जो किसी के द्वारा लगाये बिना भभक उठती हैं | इसी प्रकार विश्र्व की स्थिति ऐसी है कि बिना चाहे जीवन की उलझनें स्वतः उत्पन्न हो जाती हैं | कोई नहीं चाहता कि आग लगे, किन्तु फिर भी वह लगती है और हम अत्याधिक व्याकुल हो उठते हैं | अतः वैदिक वाङ्मय उपदेश देता है कि जीवन की उलझनों को समझने तथा समाधान करने के लिए हमें परम्परागत गुरु के पास जाना चाहिए | जिस व्यक्ति के ऊपर गुरु अथवा आत्मज्ञानी संत का आशीर्वाद होता है वह सब कुछ जानता है | अतः मनुष्य को भौतिक उलझनों में न रह कर गुरु के पास जाना चाहिए |

प्रियजन .... यहां यह जानना या समझना भी जरूरी है कि उपदेशक अगर उपदिष्ट से श्रेष्ठतर न हों तो उनमें उपदेशक तथा उपदिष्ट का सम्बन्ध अर्थहीन होगा | यदि ये दोनों माया द्वारा मोहित होते हैं तो एक को उपदेशक तथा दुसरे को उपदिष्ट होने की कोई आवश्यकता नहीं है | ऐसा उपदेश व्यर्थ होगा क्योंकि माया के चंगुल में रहकर कोई भी यथार्थ उपदेशक या गुरू नहीं बन सकता |

प्रियजन .... भौतिक उलझनों में वही व्यक्ति पड़ता है। जो जीवन की समस्याओं को नहीं समझता | बृहदारण्यक उपनिषद् में (३.८.१०) व्याकुल (व्यग्र) मनुष्य का वर्णन इस प्रकार हुआ है –
 यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माँल्लोकात्प्रैतिसकृपणः–
 “कृपण वह है जो मानव जीवन की समस्याओं को हल नहीं करता और आत्म-साक्षात्कार के विज्ञान को समझे बिना कूकर-सूकर की भाँति संसार को त्यागकर चला जाता है |” जीव के लिए मनुष्य जीवन अत्यन्त मूल्यवान निधि है, जिसका उपयोग वह अपने जीवन की समस्याओं को हल करने में कर सकता है, अतः जो इस अवसर का लाभ नहीं उठाता वह कृपण है | ब्राह्मण ( विद्वान ) इसके विपरीत होता है जो इस शरीर का उपयोग जीवन की समस्त समस्याओं को हल करने में करता है ।
य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माँल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः |
 देहात्मबुद्धि वश कृपण या कंजूस लोग अपना सारा समय परिवार, समाज, देश आदि के अत्यधिक प्रेम में गवाँ देते हैं | मनुष्य प्राय चर्मरोग के आधार पर अपने पारिवारिक जीवन अर्थात् पत्नी, बच्चों तथा परिजनों में आसक्त रहता है | कृपण यह सोचता है कि वह अपने परिवार को मृत्यु से बचा सकता है अथवा वह यह सोचता है कि उसका परिवार या समाज उसे मृत्यु से बचा सकता है | ऐसी पारिवारिक आसक्ति निम्न पशुओं में भी पाई जाती है क्योंकि वे भी बच्चों की देखभाल करते हैं |

प्रियजन .. संसार सागर के इस मोहमायाजाल में फसे हुए प्राणीं विभिन्न साधनों से शान्ति खोजते हैं, किन्तु इन साधनों से उन्हें क्षणिक शान्ति या सुखाभोग कर ही संतोष करना पडता है।

वास्तविक सुख व्यक्ति को तभी तभी मिल पाता है। जब व्यक्ति पूर्ण आत्मज्ञान का अनुभव कर पाता है।

श्रीमद्भगवद्गीता -
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति || २/१३ ||

जिस प्रकार शरीरधारी आत्मा इस (वर्तमान) शरीर में बाल्यावस्था से तरुणावस्था में और फिर वृद्धावस्था में निरन्तर अग्रसर होता रहता है, उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा दूसरे शरीर में चला जाता है | धीर व्यक्ति ऐसे परिवर्तन से मोह को प्राप्त नहीं होता |

प्रत्येक जीव एक व्यष्टि आत्मा है | वह प्रतिक्षण अपना शरीर बदलता रहता है – कभी बालक के रूप में, कभी युवा तथा कभी वृद्ध पुरुष के रूप में | तो भी आत्मा वही रहता है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता | यह व्यष्टि आत्मा मृत्यु होने पर अन्ततोगत्वा एक शरीर बदल कर दूसरे शरीर में देहान्तरण कर जाता है और चूँकि अगले जन्म में इसको शरीर मिलना अवश्यम्भावी है – चाहे वह शरीर आध्यात्मिक हो या भौतिक .....

जिस मनुष्य को व्यष्टि आत्मा, परमात्मा तथा भौतिक और आध्यात्मिक प्रकृति का पूर्ण ज्ञान होता है वह धीर कहलाता है | ऐसा मनुष्य कभी भी शरीर-परिवर्तन या लाभ-हानि , सुख-दुख , एवं मोहादिक द्वंदों द्वारा ठगा नहीं जाता |

आत्मा के एकात्मवाद का मायावादी सिद्धान्त मान्य नहीं हो सकता क्योंकि आत्मा के इस प्रकार विखण्डन से परमेश्र्वर विखंडनीय या परिवर्तनशील हो जायेगा जो परमात्मा के अपरिवर्तनीय होने के सिद्धान्त के विरुद्ध होगा | गीता में पुष्टि हुई है कि परमात्मा के खण्डों का शाश्र्वत (सनातन) अस्तित्व है जिन्हें क्षर कहा जाता है अर्थात् उनमें भौतिक प्रकृति में गिरने की प्रवृत्ति होती है | ये भिन्न अंश (खण्ड) नित्य भिन्न रहते हैं, यहाँ तक कि मुक्ति के बाद भी व्यष्टि आत्मा जैसे का तैसा – भिन्न अंश बना रहता है | किन्तु एक बार मुक्त होने पर वह श्रीभगवान् के साथ सच्चिदानन्द रूप में रहता है | परमात्मा पर प्रतिबिम्बवाद का सिद्धान्त व्यवहृत किया जा सकता है, जो प्रत्येक शरीर में विद्यमान रहता है | वह व्यष्टि जीव से भिन्न होता है | जब आकाश का प्रतिबिम्ब जल में पड़ता है तो प्रतिबिम्ब में सूर्य, चन्द्र तथा तारे सब कुछ रहते हैं | तारों की तुलना जीवों से तथा सूर्य या चन्द्र की परमेश्र्वर से की जा सकती है |

प्रिय भगवद्जन ... विद्रोह , घृणां , वैरभाव या प्रतिघातादिक व्यक्तिमात्र की भावना से बचने के लिए आपको परमात्मा के जीवमात्र में विद्यमान अंश आत्मतत्व के ऐकत्वीकरण का चिंतन करना होगा एवं इसे समझने के लिए आपको मन के विचार गृहण व उत्सर्जन के बारे में समझना होगा  ... प्राणीमात्र का मन एक मोबाइल टावर की तरह होता है। .. जैसे कि मोबाइल टॉवर बहुत सी इनकमिंग या आउटगोइग कॉल का प्रतिक्षण वहन करता है। उसी तरह प्राणीमात्र का मन है। जो प्रतिक्षण अच्छी या बुरी सोच का ग्रहण व त्याग करता है। आप अच्छा या बुरा जैसा भी विचार किसी व्यक्ति के बारे में करते है तो तत्काल वैसा ही चिंतन या विचार संबधित व्यक्ति के मन में भी प्रकट होता है। और उसी अच्छे या बुरे विचारानुसार संबधित व्यक्ति का आपसे लगाव या वैमनष्य बढता जाता है। ... उदा . के लिए आप विचारकर देखिये कि कभी - कभी किसी जन के मिलन पर आपको उसे देखते ही अत्यंन्त प्रसन्नता होती है। भले ही उससे आपको कोई भी लाभ ना होने वाला हो इसी तरह किसी - किसी जन को देखते ही आपके मनमें क्षोभ या घृणां उत्पन्न होती है भले ही संबधित व्यक्ति से आपको कोई भी तात्कालिक हानि ना हुई हो .... इसका कारण यही है। कि संबंधित व्यक्ति   जैसा विचार आपके बारे में अपने मन में रखता है वैसा ही विचार आपके मन में भी उसे देखते ही या उसके बारे में सोचते ही उत्पन्न हो जाता है। ..... विद्रोह , घृणां , वैरभाव या प्रतिघातादिक समस्या इसी वजह से होती है। आपका अगर किसी से विद्रोह या वैमनष्यता है। तो स्वत: आपके उसके प्रति या उसके आपके प्रति विचार भी वैमनष्य या प्रतिघातक होंगे .... अगर दोनो पक्ष समान बलिष्ठ या संम्पन्न होते है तो ये प्रतिघातक विचार बढते हुए पारस्परिक हिंसा का रूप भी ले लेते है। वंही अगर कोई एक पक्ष कमजोर , निस्क्रीय , दबावग्रस्त होता है तब भी उक्त पक्ष या जन के मानसिक विचार उतने ही सबल होते है। उदा. मेरी गलती नहीं फिर भी इसने ऐसा किया या कर रहा है। अगर दबाव का कारण ना होता तो में इसे इसकी सजा अवश्य देता अथवा भगवान सब देख रहा है। वो तुझे तेरे किये का फल अवश्य देगा .... आदि .. आदि ... ऐसे अनेकों विचार है जो विद्रोह या वैमनष्यता को जन्म देते है। इन्हें दूर करने के लिए या संबंधित व्यक्ति की सोच बदलने के लिए आपको अपने आपको बदलना होगा ... आपको तन से ... मन से ... अपने किसी भी क्रियाकलाप से संबंधित व्यक्ति के बारे में निगेटिव विचार या चिंतन नहीं लाना है। सामने वाला व्यक्ति कितना भी आपसे विद्रोहात्मक विचार प्रगट करे पर आप उसके प्रति सिर्फ अच्छे भाव या विचार रखें अपने मन में निगेटिव चिंतन कदापि ना लाएं .... जब आपकी मनोस्थति पूर्णत: संबधित व्यक्ति के बारे में अच्छी हो जाएगी तो उसकी आपके प्रति विद्रोहात्मक मनोस्थिति स्वत: सकारात्मक चिंतन में बदल जाएगी । ......

प्रियजन .....जरा सोचिये भगवद्इच्छा बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो फिर एक विद्रोहीजन आपके प्रति कैसे खडा हो सकता है। कारण स्पष्ट है। हमारे पूर्व कर्म हमारे आडे आ रहे है और हम उन्हीं कर्मों का प्रारब्धवस अच्छे या बुरे रूप में भोग कर रहे है। अत: आप भगवत्प्रेमभावना रखकर ही हर कार्य करें अपने हर कार्य में भगवतार्पण सम्मिलित करें तभी आप अपने प्रारब्ध के क्षय में समर्थ हो सकगें और अपनी विपत्तियो को कम कर सकेंगें ..... जैसे हमारे पूर्व कर्म है। या जो हमारे प्रारब्ध में है। उसे तो हमें भोगना ही पडेगा इस में किसी भी तर्क-वितर्क की गुंजाइश नही है चाहे हम उन्हें हस कर भोगे या रोकर हां उन्है अर्पणादिक क्रिया द्वारा कम किया जा सकता है। कहा भी गया है। कि ...
होइ है सोई जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा ।।

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 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹      
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🌹एक बार प्रेम से बोलिए ...
🌹जय जय श्री राधे ...........
🌹प्यारी श्री " राधे .. "🌹💐
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