गुरुवार, 19 जनवरी 2017

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  🌸🌹!:: भगवद्🌹अर्पणम् ::!🌹🌸
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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
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🌹भौतिक भोग एवं दैनिक क्रियाकलाप में बंधा हुआ मन भगवद् ध्यानसाधना में केसे प्रवत्त हो ?

( गत ब्लॉग से आगे )

💐 प्रिय भगवद्जन .....

ध्यानयोगाभ्यास में समाधि की सर्वोच्च अवस्था भगवद्भावनामृत है। केवल इस ज्ञान से कि भगवान प्रत्येक जन के हृदय में परमात्मा रूप में उपस्थित हैं ध्यानस्थ योगी निर्दोष हो जाता है। वेदों में (गोपालतापनी उपनिषद् १.२१) भगवान् की इस अचिन्त्य शक्ति की पुष्टि इस प्रकार होती है –
 एकोऽपि सन्बहुधा योऽवभाति– “यद्यपि भगवान् एक हैं, किन्तु वह जितने सारे हृदय हैं उनमें उपस्थित रहते है।” इसी प्रकार स्मृति शास्त्र का कथन है।–

एक एव परो विष्णुः सर्वव्यापी न संशयः |
ऐश्र्वर्याद् रुपमेकं च सूर्यवत् बहुधेयते ||

“विष्णु एक हैं फिर भी वे सर्वव्यापी हैं । एक रूप होते हुए भी वे अपनी अचिन्त्य शक्ति से सर्वत्र उपस्थित रहते हैं, जिस प्रकार सूर्य एक ही समय अनेक स्थानों में दिखता है।” अत: ध्यानयोग साधना में सदैव इस बात का स्मर्ण रखना चाहिये ।

प्रियजन .... मन की चंचलता या अस्थिरता उसकी नेष्ठिक प्रवत्ती है। जिसे मिटाया नहीं जा सकता है। किंतु उसे एक विशेष धारणा या सभी में भगवद्भावना रखकर बदला जा सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार -

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ||

जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है उसके लिए न तो मैं कभी अदृश्य होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है |

जड-चेतनमय जो दृश्य जगत है।सर्वत्र भगवान है। अत: ध्यानयोग साधना में रत साधक को मन खुला छोड देना चाहिये मन जहां भी जाऐ जाने दें , आँखों में जो भी दृश्य दिखाई दे दिखने दें बस मन की भावना बदल दे जो भी दिख रहा है। उसे भगवद् स्वरूप समझना चाहिये , दिखाई देने वाला दृश्य चाहे उच्च कोटि का हो चाहे हीन कोटि का साधक को ना ही उच्चता या सुंदरता के प्रलोभन में फसना है। और ना ही दृश्य को हीन समझकर घृणां करना है। बस उसी दृश्य को भगवद् स्वरूप समझकर प्रणामकर अपना प्रेमभाव अर्पण करना है। साधक के मन में जो भी विचार , स्मृति , ज्ञान या दृश्य उभरते है। सभी में भगवद् प्रेरणा होती है। यथा-

सर्वस्य चाहं ह्रदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च |

मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझ से ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति होती है।
             ( श्रीमद्भगवद्गीता )

प्रियजन .... साधक द्वारा निरंतर सभी में भगवद्भावना व चिंतन रखने पर स्मृति में आने वाले समस्त विचार एवं दिखाई देने समस्त दृश्य भगवद्भाव में परिवर्तित हो जाते है। जिस तरह की भृंगी द्वार बद्ध जीव निरंतर चिंतन से भृंगी में ही परावर्तित हो जाता है।

ध्यानयोग साधना की पूर्णता में साधक हृदय में भगवद्भावना एवं सर्वत्र भगवद्स्वरूप का ही दर्शन करने लगता है।-

सर्वभूतस्थमात्मनं सर्वभूतानि चात्मनि |
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ||

वास्तविक ध्यानस्थयोगी समस्त जीवों में मुझको तथा मुझमें समस्त जीवों को देखता है। निस्सन्देह स्वरूपसिद्ध व्यक्ति मुझ परमेश्र्वर को सर्वत्र देखता है।
             ( श्रीमद्भगवद्गीता )

भक्तिमय ध्यानयोग के सम्बन्ध में रूप गोस्वामी का कथन है –

उत्साहान्निश्र्चयाध्दैर्यात् तत्तत्कर्म प्रवर्तनात् |
संगत्यागात्सतो वृत्तेः षङ्भिर्भक्तिः प्रसिद्धयति ||

“मनुष्य पूर्ण हार्दिक उत्साह, धैर्य तथा संकल्प के साथ भक्तियोग का पूर्णरूपेण पालनकर निर्धारित कर्मों के करने तथा सत्कार्यों में पूर्णतया लगे रहने से स्वरूपसिद्ध होकर भगवान को प्राप्त कर सकता है |” (उपदेशामृत– ३)

         ...... ✍🏻 : कृष्णा :: श्री राधा प्रेमी :

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