गुरुवार, 29 सितंबर 2016

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  🌹🔱 यथा श्रद्धा: तथा गति 🔱🌹

🌟 व्यक्ति जैसी सोच धारण करता है। वैसी ही गति पाता है।

💐 प्रिय भगवत्जन ....

आपके प्रश्नानुसार .. कि क्या किसी एक ही देव या शक्ति को मानना श्रेयकर है। अगर हाँ ! तो व्यक्ति विभिन्न धर्मों व देवों की पूजा क्यों करते है। यहां तक कि कुछ व्यक्तियों को तो भूतप्रेतादिक को पूजते मानते हुए देखा गया है। इसका कारण क्या है। और उन्हैं कौन सी गति प्राप्त होती है?

प्रियजन ... श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार ... यथा ...

सत्त्वानुरुपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत |
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः || १७/३ ||

 विभिन्न गुणों के अन्तर्गत अपने अपने अस्तित्व के अनुसार मनुष्य एक विशेष प्रकार की श्रद्धा विकसित करता है । अपने द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार ही जीव को विशेष श्रद्धा से युक्त कहा जाता है ।

अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति में चाहे वह जैसा भी हो, एक विशेष प्रकार की श्रद्धा पाई जाती है । लेकिन उसके द्वारा अर्जित स्वभाव के अनुसार उसकी श्रद्धा उत्तम (सतोगुणी), राजस (रजोगुणी) अथवा तामसी कहलाती है । इस प्रकार अपनी विशेष प्रकार की श्रद्धा के अनुसार ही वह कतिपय लोगों से संगति करता है । यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि, जैसा पंद्रहवें अध्याय में कहा गया है, प्रत्येक जीव परमेश्र्वर का अंश है, अतएव वह मूलतः इन समस्त गुणों से परे होता है । लेकिन जब वह भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को भूल जाता है और बद्ध जीवन में भौतिक प्रकृति के संसर्ग में आता है,तो वह विभिन्न प्रकार की प्रकृति के साथ संगति करके अपना स्थान बनाता है । इस प्रकार से प्राप्त कृत्रिम श्रद्धा तथा अस्तित्व मात्र भौतिक होते हैं । भले ही कोई किसी धारणा या देहात्मबोध द्वारा प्रेरित हो, लेकिन मूलतः वह निर्गुण या दिव्य होता है । अतएव भगवान् के साथ अपना सम्बन्ध फिर से प्राप्त करने के लिए उसे भौतिक कल्मष से शुद्ध होना पड़ता है । यही एकमात्र मार्ग है, निर्भय होकर कृष्णभावनामृत में लौटने का । यदि कोई कृष्णभावनामृत में स्थित हो, तो उसका भगवत्प्राप्ति लिए वह मार्ग प्रशस्त हो जाता है । यदि वह आत्म-साक्षात्कार के इस पथ को ग्रहण नहीं करता, तो वह निश्चित रूप से प्रकृति के गुणों के साथ बह जाता है ।

श्रद्धा मूलतः सतोगुण से उत्पन्न होती है । मनुष्य की श्रद्धा किसी देवता, किसी कृत्रिम ईश्र्वर या मनोधर्म में हो सकती है लेकिन प्रबल श्रद्धा सात्त्विक कार्यों से उत्पन्न होती है । किन्तु भौतिक बद्ध जीवन में कोई भी कार्य पूर्णतया शुद्ध नहीं होता । वे सब मिश्रित होते हैं । वे शुद्ध सात्त्विक नहीं होते । शुद्ध सत्त्व दिव्य होता है, शुद्ध सत्त्व में रहकर मनुष्य भगवान् के वास्तविक स्वभाव को समझ सकता है । जब तक श्रद्धा पूर्णतया सात्त्विक नहीं होती, तब तक वह प्रकृति के किसी भी गुण से दूषित हो सकती है । प्रकृति के दूषित गुण हृदय तक फैल जाते हैं, अतएव किसी विशेष गुण के सम्पर्क में रहकर हृदय जिस स्थिति में होता है, उसी के अनुसार श्रद्धा स्थापित होती है । यह समझना चाहिए कि यदि किसी का हृदय सतोगुण में स्थित है, तो उसकी श्रद्धा भी सतोगुणी है । यदि हृदय रजोगुण में स्थित है, तो उसकी श्रद्धा रजोगुणी है और यदि हृदय तमोगुण में स्थित है तो उसकी श्रद्धा तमोगुणी होती है । इस प्रकार हमें संसार में विभिन्न प्रकार की श्रद्धाएँ मिलती हैं और विभिन्न प्रकार की श्रद्धाओं के अनुसार विभिन्न प्रकार के धर्म होते हैं । धार्मिक श्रद्धा का असली सिद्धान्त सतोगुण में स्थित होता है । लेकिन चूँकि हृदय कलुषित रहता है, अतएव विभिन्न प्रकार के धार्मिक सिद्धान्त पाये जाते हैं । श्रद्धा की विभिन्नता के कारण ही पूजा भी भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। ... यथा ...

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः |
प्रेतान्भूतगणांश्र्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः || १७/४ ||

सतोगुणी व्यक्ति देवताओं को पूजते हैं, रजोगुणी यक्षों व राक्षसों की पूजा करते हैं और तमो गुणी व्यक्ति भूत-प्रेतों को पूजते हैं ।

अर्थात् .. शास्त्रों के आदेशानुसार तो केवल भगवान् ही पूजनीय हैं । लेकिन जो शास्त्रों के आदेशों से अभिज्ञ नहीं, या उन पर श्रद्धा नहीं रखते, वे अपनी गुण-स्थिति के अनुसार विभिन्न वस्तुओं की पूजा करते हैं । जो लोग सतोगुणी हैं, वे सामान्यतया देवताओं की पूजा करते हैं | इन देवताओं में ब्रह्मा, शिव तथा अन्य देवता, तथा इन्द्र, चन्द्र तथा सूर्य सम्मिलित हैं । देवता कई हैं । सतोगुणी लोग किसी विशेष अभिप्राय से किसी विशेष देवता की पूजा करते हैं । इसी प्रकार जो रजोगुणी हैं, वे यक्ष-राक्षसों की पूजा करते हैं। इसी प्रकार जो रजोगुणी तथा तमोगुणी होते हैं, वे सामान्यतया किसी प्रबल मनुष्य को ईश्र्वर के रूप में चुन लेते हैं । वे सोचते हैं कि कोई भी व्यक्ति ईश्र्वर की तरह पूजा जा सकता है और फल एकसा होगा ।

यहाँ पर इसका स्पष्ट वर्णन है कि रजोगुणी लोग ऐसे देवताओं की सृष्टि करके उन्हें पूजते हैं और जो तमोगुणी हैं - अंधकार में हैं - वे प्रेतों की पूजा करते हैं । कभी-कभी लोग किसी मृत प्राणी की कब्र पर पूजा करते हैं । मैथुन सेवा भी तमोगुणी मानी जाती है । इसी प्रकार भारत के सुदूर ग्रामों में भूतों की पूजा करने वाले हैं । हमने देखा है कि भारत में निम्नजाति के लोग कभी-कभी जंगल में जाते हैं और यदि उन्हें इसका पता चलता है कि कोई भूत किसी वृक्ष पर रहता है, तो वे उस वृक्ष की पूजा करते हैं और बलि चढ़ाते हैं । ये पूजा के विभिन्न प्रकार वास्तव में ईश्र्वर-पूजा नहीं हैं । ईश्र्वर पूजा तो सात्त्विक पुरुषों के लिए हैं । श्रीमद्भागवत में (४.३.२३) कहा गया है -
सत्त्वं विशुद्धमं वसुदेव-शब्दितम्
- जब व्यक्ति सतोगुणी होता है, तो वह वासुदेव की पूजा करता हैं । तात्पर्य यह है कि जो लोग गुणों से पूर्णतया शुद्ध हो चुके है और दिव्य पद को प्राप्त हैं, वे ही भगवान् की पूजा कर सकते हैं ।

निर्विशेषवादी सतोगुण में स्थित माने जाते हैं और वे पंचदेवताओं की पूजा करते हैं । वे भौतिक जगत में निराकार विष्णु को पूजते हैं, जो सिद्धान्तीकृत विष्णु कहलाता है । विष्णु भगवान् के विस्तार हैं, लेकिन निर्विशेषवादी अन्ततः भगवान् में विश्र्वास न करने के कारण सोचते हैं कि विष्णु का स्वरूप निराकार ब्रह्म का दूसरा पक्ष है । इसी प्रकार वे यह मानते हैं कि ब्रह्माजी रजोगुण के निराकार रूप हैं । अतः वे कभी-कभी पाँच देवताओं का वर्णन करते हैं, जो पूज्य हैं । लेकिन चूँकि वे लोग निराकार ब्रह्म को ही वास्तविक सत्य मानते हैं, इसलिए वे अन्ततः समस्त पूज्य वस्तुओं को त्याग देते हैं। अर्थात् जो जिसमें श्रद्धा व भाव रखते है वह अपनी पूजा व श्रद्धा के अनुसार ही गति पाते है। .... यथा ...

यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः|
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् || ९/२५ ||

जो देवताओं की पूजा करते हैं, वे देवताओं के बीच जन्म लेंगे, जो पितरों को पूजते हैं, वे पितरों के पास जाते हैं, जो भूत-प्रेतों की उपासना करते हैं, वे उन्हीं के बीच जन्म लेते हैं और जो मेरी पूजा करते हैं वे मेरे साथ निवास करते हैं।

तात्पर्य : यदि कोई चन्द्रमा, सूर्य या अन्य लोक को जाना चाहता है तो वह अपने गन्तव्य को बताये गये विशिष्ट वैदिक नियमों का पालन करके प्राप्त कर सकता है | इनका विशद वर्णन वेदों के कर्मकाण्ड अंश दर्शपौर्णमासी में हुआ है, जिसमें विभिन्न लोकों में स्थित देवताओं के लिए विशिष्ट पूजा का विधान है | इसी प्रकार विशिष्ट यज्ञ करके पितृलोक प्राप्त किया जा सकता है।
 पिशाच पूजा को काला जादू कहते हैं। अनेक लोग इस काले जादू का अभ्यास करते हैं और सोचते हैं कि यह अध्यात्म है, किन्तु ऐसे कार्यकलाप नितान्त भौतिकतावादी हैं। और व्यक्ति को नीच योनियों ढकेलने वाले होते है। इसी तरह अन्य व्यक्ति भी अपने आराध्य व उनके पूजन भाव के आधार पर गति प्राप्त करते है।
 शुद्धभक्त केवल भगवान् की पूजा करके निस्सन्देह वैकुण्ठलोक तथा कृष्णलोक की प्राप्ति करता है। यहां यह समझना सुगम है कि जब देवताओं की पूजा करके कोई स्वर्ग प्राप्त कर सकता है, तो फिर शुद्धभक्त कृष्ण या विष्णु के लोक क्यों नहीं प्राप्त कर सकता? दुर्भाग्यवश अनेक लोगों को कृष्ण तथा विष्णु के दिव्यलोकों की सूचना नहीं है, अतः न जानने के कारण वे नीचे गिर जाते हैं | यहाँ तक निर्विशेषवादी भी ब्रह्मज्योति से नीचे गिरते हैं | इसीलिए भगवत्भावनामृत आन्दोलन इस दिव्य सूचना को समूचे मानव समाज में वितरित करता है कि केवल हरे कृष्ण हरे राम मन्त्र के जाप से ही मनुष्य सिद्ध हो सकता है और भगवद्धाम को वापस जा सकता है। निष्कर्ष यह निकलता है कि प्रकृति के विभिन्न गुणों को दिव्य प्रकृति वाले व्यक्तियों की संगति से शुद्ध किया जा सकता है। और एक ही शक्ती या वेद वर्णित आराध्य के पूजन पर मुक्ति व गति को पाया जा सकता है।

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बुधवार, 28 सितंबर 2016

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   🌸🌹🔱 कर्म एवं भाग्य 🔱🌹🌸

🌟 श्रेष्ठ क्या है ? "कर्म या भाग्य" ?

💐 प्रिय भगवत्जन आपके प्रश्नानुसार कौन श्रेष्ठ है। भाग्य या कर्म ? अगर भाग्य श्रेष्ठ है। तो कैसे ? और अगर कर्म तो कौन सा कर्म श्रेष्ठ है ?

प्रियजन  .... प्रश्न में पहले यह समझने योग्य है। कि कर्म और भाग्य में अंतर क्या है। " कर्म " जो दैनिक क्रिया-कलाप व्यक्ति के स्वयं के द्वारा किये जाते है। कर्म कहलाते है। " भाग्य " जो प्रारब्धानुसार व्यक्ति को समय-समय पर किसी दूसरे के द्वारा अच्छे या बुरे के रूप में उपलब्ध होता है। वह भाग्य कहलाता है। यानी जो व्यक्ति द्वारा स्वयं किया जाता है। वह " कर्म " है। और जो व्यक्ती को दूसरों के द्वारा प्राप्त होता है। वह " भाग्य " है।

प्रियजन ... व्यक्ति के प्रारब्ध का निर्माण भी वास्तव में व्यक्ति के स्वयं के पूर्वकर्मो से ही संभव होता है। ... यथा ..

‘यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिनिष्पद्यते।’

जिन बातों का प्राणी बार-बार विचार करता है, धीरे-धीरे वैसी ही इच्छा हो जाती हे, इच्छानुसारी कर्म और कर्मानुसारिणी प्रारब्धगति होती है। अर्थात समय पाकर व्यक्ति के स्वयं के कर्म ही प्रारब्धरूपी भाग्य में बदल जाते है। अत: हम कह सकते है। कि कर्म श्रेष्ठ है। क्योकि कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है।

प्रियजन ... प्रश्नानुसार कि कौन सा कर्म श्रेष्ठ है। इसके जबाव के लिए हम लिए "श्रीमद्भगवद्गीता" में "श्रीकृष्ण" भगवान के इस कथन पर दृष्टि डालते है। ... यथा ...

श्रीभगवानुवाच :
संन्यासः कर्मयोगश्र्च निःश्रेयसकरावुभौ |
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते || ५/२ ||

श्रीभगवान् ने उत्तर दिया – मुक्ति में लिए तो कर्म का परित्याग तथा भक्तिमय-कर्म (कर्मयोग) दोनों ही उत्तम हैं | किन्तु इन दोनों में से कर्म के परित्याग से भक्तियुक्त कर्म श्रेष्ठ है |

अर्थात् सकाम कर्म (इन्द्रियतृप्ति में लगाना) ही भवबन्धन का कारण है | जब तक मनुष्य शारीरिक सुख का स्तर बढ़ाने के उद्देश्य से कर्म करता रहता है तब तक वह विभिन्न प्रकार के शरीरों में देहान्तरण करते हुए भवबन्धन को बनाये रखता है | इसकी पुष्टि भागवत (५.५.४-६) में इस प्रकार हुई है-

नूनं प्रमत्तः कुरुते विकर्म यदिन्द्रियप्रीतय आपृणोति |
न साधु मन्ये यत आत्मनोऽयमसन्नपि क्लेशद आस देहः ||
पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् |
यावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ||
एवं मनः कर्मवशं प्रयुंक्ते अविद्ययात्मन्युपधीयमाने |
प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ||

“लोग इन्द्रियतृप्ति के पीछे मत्त हैं | वे यह नहीं जानते कि उनका क्लेशों से युक्त यह शरीर उनके विगत सकाम-कर्मों का फल है | यद्यपि यह शरीर नाशवान है, किन्तु यह नाना प्रकार के कष्ट देता रहता है | अतः इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करना श्रेयस्कर नहीं है | जब तक मनुष्य अपने असली स्वरूप के विषय में जिज्ञासा नहीं करता, उसका जीवन व्यर्थ रहता है | और जब तक वह अपने स्वरूप को नहीं जान लेता तब तक उसे इन्द्रियतृप्ति के लिए सकाम कर्म करना पड़ता है, और जब तक वह इन्द्रियतृप्ति की इस चेतना में फँसा रहता है तब तक उसका देहान्तरण होता रहता है | भले ही उसका मन सकाम कर्मों में व्यस्त रहे और अज्ञान द्वारा प्रभावित हो, किन्तु उसे वासुदेव की भक्ति के प्रति प्रेम उत्पन्न करना चाहिए | केवल तभी वह भव बन्धन से छूटने का अवसर प्राप्त कर सकता है |”

अतः यह ज्ञान ही (कि वह आत्मा है शरीर नहीं) मुक्ति के लिए पर्याप्त नहीं | जीवात्मा के स्तर पर मनुष्य को कर्म करना होगा अन्यथा भवबन्धन से उबरने का कोई अन्य उपाय नहीं है | किन्तु कृष्णभावनाभावित होकर कर्म करना सकाम कर्म नहीं है | पूर्णज्ञान से युक्त होकर किये गये कर्म वास्तविक ज्ञान को बढ़ाने वाले हैं | बिना कृष्णभावनामृत के केवल कर्मों के परित्याग से बद्धजीव का हृदय शुद्ध नहीं होता | जब तक हृदय शुद्ध नहीं होता तब तक सकाम कर्म करना पड़ेगा | परन्तु कृष्णभावनाभावित कर्म कर्ता को स्वतः सकाम कर्म के फल से मुक्त बनाता है, जिसके कारण उसके उसे भौतिक स्तर पर उतरना नहीं पड़ता | अतः कृष्णभावनाभावित कर्म अन्य सन्यासादिक क्रियाओं से सदा श्रेष्ठ होता है, क्योंकि इन क्रियांओ में नीचे गिरने की सम्भावना बनी रहती है |
 "श्रीकृष्ण" भगवान आगे कहते है। ...यथा ....

कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि |
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङगं त्यक्त्वात्मशुद्धये || ५/११ ||

योगीजन आसक्तिरहित होकर शरीर, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों के द्वारा भी केवल शुद्धि के लिए कर्म करते हैं |

अर्थात् जब कोई कृष्णभावनामृत में कृष्ण की इन्द्रियतृप्ति के लिए शरीर, मन, बुद्धि अथवा इन्द्रियों द्वारा कर्म करता है तो वह भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के कार्यों से कोई भौतिक फल प्रकट नहीं होता | अतः सामान्य रूप से सदाचार कहे जाने वाले शुद्ध कर्म कृष्णभावनामृत में रहते हुए सरलता से सम्पन्न किये जा सकते है | श्रील रूप गोस्वामी में भक्तिरसामृतसिन्धु में (१.२.१८७) इसका वर्णन इस प्रकार किया है –

ईहा यस्य हरेर्दास्ये कर्मणा मनसा गिरा |
निखिलास्वप्यवस्थासु जीवन्मुक्तः स उच्यते ||

“अपने शरीर, मन, बुद्धि तथा वाणी से कृष्णभावनामृत में कर्म करता हुआ (कृष्णसेवा में) व्यक्ति इस संसार में भी मुक्त रहता है, भले ही वह तथाकथित अनेक भौतिक कार्यकलापों में व्यस्त क्यों न रहे |” उसमें अहंकार नहीं रहता क्योंकि वह इसमें विश्र्वास नहीं रखता कि वह भौतिक शरीर है अथवा यह शरीर उसका है | वह जानता है कि वह यह शरीर नहीं है और न यह शरीर ही उसका है | वह स्वयं कृष्ण का है और उसका यह शरीर भी कृष्ण की सम्पत्ति है| जब वह शरीर, मन, बुद्धि, वाणी, जीवन, सम्पत्तिआदि से उत्पन्न प्रत्येक वस्तु को, जो भी उसके अधिकार में है, कृष्ण की सेवा में लगाता है तो वह तुरन्त कृष्ण से जुड़ जाता है | वह कृष्ण से एकरूप हो जाता है और उस अहंकार से रहित होता है जिसके कारणमनुष्य सोचता है कि मैं शरीर हूँ | यही कृष्णभावनामृत की पूर्णावस्था है |

नोट: यहां "श्रीकृष्णभावनामृत" उदा. हेतु कहा गया है। हम यहां यह जानते है। कि सभी इष्टशक्ति एक ही है। अत: हम किसी एक ही नाम का सपोर्ट नही करते है।  यहां साधक भक्त अपने किसी भी प्रिय आराध्य का नाम कह या समझ अथवा जोड सकता है।

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रविवार, 25 सितंबर 2016

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🌹🌟श्रेष्ठ कौन शक्ति या त्रिदेव🌟🌹

❄ ब्रह्म का कौन सा रूप या अवतार श्रेष्ठ :

☄ प्रिय भगवत्जन .....

आपके प्रश्नानुसार "त्रिदेव" यानी ब्रह्मा , विष्णू व शिव का जनक कौन है? " त्रिदेव" या "शक्ति" इनमें से कौन ब्राह्मांड का उत्पत्ती करता है?

प्रिय भगवत्जन ... हिंदू धर्म में अनेकों देवी देवताओं का वर्णन व उनके अवतार समय के घटनाक्रमों के उल्लैखो पर आधारित सद्ग्रंथो का बहुताय में संग्रह है। इनमें प्रमुखत: माँ "दुर्गा" त्रिदेव " ब्रह्मा, विष्णु, व शिव " श्री गणेश, "श्रीराम" , "श्रीकृष्ण" व भगवान के दसावतार प्रमुख है। हर सद्ग्रंथ में ग्रंथ के आराध्य देव को ही पूर्ण श्रष्टी का रचैयता व सभी देवों का जनक बताया गया है। इसका क्या कारण है? क्या आप जानते है? हमारे बहुत से भगवत्जन तो इसी दुविधा में अक्सर पड जाते है। कि किसे मानें कौन बडा है। कौन हमारी मनोकामना जल्दी पूर्ण करेगा !

प्रिय जन हमारे सद्ग्रंथों में भगवान के अनेकों रूपों का वर्णन मिलता है। उसका कारण यह है। कि जीवमात्र का मन विचित्रताओं की खान है। वह  किसी एक ही चीज को बार बार उमंग व लगाव से स्वीकार्य नही करता जैसे कि भोजन , परिवेश , या किसी एक ही जगह का बंधन! एक ही चीज के बार बार उपयोग से मन में एक अजीब सी उकताहट होने लगती है। जैसे कि मान लो अगर कपडे एक हीं रंग से बने होते कोई दूसरा रंग ही ना होता तो क्या उन्हें उपयोग करने वाला उतना प्रसन्न होता ? नही ना! इसी वजह से एक ही ब्रह्म शक्ती समयानुसार विभिन्न रूपो में अवतरित हुई और उसी अवतरित रूप से जुडे विभिन्न सद्ग्रंथों मे उसी रूपावतार को श्रेष्ठ बताया गया जिससे कि उस रूपावतार को मानने वाले भक्त का अपने इष्ट के प्रति प्रेम व भक्ति का उत्तरोत्तर विकास हो!
हर जीव अपने पूर्व जीवन की अधिकतर स्मृतियों को भूल जाता है। पर ब्रह्म:शक्ति कभी भी किसी भी घटना से अनभिज्ञ नही रहती आइये इसे थोडा विस्तार से समझे .... "श्रीमद्भगवद्गीता" के अनुसार यथा _

श्रीभगवानुवाच :
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन |
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ||

श्रीभगवान् ने कहा – तुम्हारे तथा मेरे अनेकानेक जन्म हो चुके हैं | मुझे तो उन सबका स्मरण है, किन्तु हे परंतप! तुम्हें उनका स्मरण नहीं रह सकता है |

ब्रह्मसंहिता में भी(५.३३) हमें भगवान् के अनेकानेक अवतारों की सूचना प्राप्त होती है | उसमें कहा गया है –

अद्वैतमच्युतमनादिमनन्तरूपमाद्यं पुराणपुरुषं नवयौवेन च |
वेदेषु दुर्लभमदुर्लभमात्मभक्तौ गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ||

“मैं उन आदि पुरुष श्री भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ जो अद्वैत,अच्युत तथा अनादि हैं | यद्यपि अनन्त रूपों में उनका विस्तार है, किन्तु तो भी वे आद्य, पुरातन तथा नित्य नवयौवन युक्त रहते हैं। श्रीभगवान् के ऐसे सच्चिदानन्दरूप को प्रायः श्रेष्ठ वैदिक विद्वान जानते हैं, किन्तु विशुद्ध अनन्य भक्तों को तो उनके दर्शन नित्य होते रहते हैं |”

ब्रह्मसंहिता में यह भी कहा गया है –
रामादिमुर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन् नानावतारकरोद् भुवनेषु किन्तु |
कृष्ण स्वयं समभवत् परमः पुमान् यो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ||

“मैं उन श्रीभगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ जो राम, नृसिंह आदि अवतारों तथा अंशावतारों में नित्य स्थित रहते हुए भी कृष्ण नाम से विख्यात आदि-पुरुष हैं और जो स्वयं भी अवतरित होते हैं।”

वेदों में भी कहा गया है कि अद्वैत होते हुए भी भगवान् असंख्य रूपों में प्रकट होते हैं | वे उस वैदूर्यमणि के समान हैं जो अपना रंग परिवर्तित करते हुए भी एक ही रहता है | इन सारे रूपों को विशुद्ध निष्काम भक्त ही समझ पाते हैं; केवल वेदों के अध्ययन से उनको नहीं समझा जा सकता (वेदेषु दुर्लभमदुर्लभमात्मभक्तौ)|

शरीर-परिवर्तन के साथ-साथ जीवात्मा सब कुछ भूल जाता है, और उसे पूर्व संचित ज्ञान का स्मरण नहीं रहता ।
भगवान अपने सच्चिदानन्द शरीर को बदलते नहीं। वे अद्वैत हैं जिसका अर्थ है कि उनके शरीर तथा उनकी आत्मा में कोई अन्तर नहीं है। उनसे सम्बंधित हर वस्तु में आत्मस्वरूप से स्थित है। जबकि बद्धजीव अपने शरीर से भिन्न होता है।  चूँकि भगवान् के शरीर और आत्मा अभिन्न हैं, अतः उनकी स्थिति तब भी सामान्य जीव से भिन्न बनी रहती है, जब वे भौतिक स्तर पर अवतार लेते हैं। साधारणजन भगवान् की इस दिव्य प्रकृति से तालमेल नहीं बैठा पाते, जिसकी व्याख्या इस श्लोक में भगवान् स्वयं करते हैं।

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्र्वरोऽपि सन् |
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ||

यद्यपि मैं अजन्मा तथा अविनाशी हूँ और यद्यपि मैं समस्त जीवों का स्वामी हूँ, तो भी प्रत्येक युग में मैं अपने आदि दिव्य रूप में प्रकट होता हूँ |

यहां भगवान् ने अपने जन्म की विलक्षणता बतलाई है। वह अजन्मा , अविनाशी जीव मात्र के स्वामी होते हुए भी अपने भक्तों की प्रेम व भक्ती के वश में होकर विभिन्न रूपो में अलग-अलग युगो में अवतार ग्रहण करते है।
 अपने भक्तो के लिए यद्यपि वे सामान्य पुरुष की भाँति प्रकट हो सकते हैं, किन्तु उन्हें विगत अनेकानेक “जन्मों” की पूर्ण स्मृति बनी रहती है, जबकि सामान्य पुरुष को कुछ ही घंटे पूर्व की घटना स्मरण नहीं रहती | यदि कोई पूछे कि एक दिन पूर्व इसी समय तुम क्या कर रहे थे, तो सामान्य व्यक्ति के लिए इसका तत्काल उत्तर दे पाना कठिन होगा। उसे उसको स्मरण करने के लिए अपनी बुद्धि को कुरेदना पड़ेगा कि वह कल इसी समय क्या कर रहा था।

भगवान् का प्राकट्य तथा तिरोधान सामान्य जीव से भिन्न हैं अतः स्पष्ट है कि वे शाश्र्वत हैं, अपनी अन्तरंगा शक्ति के कारण आनन्दस्वरूप हैं और इस भौतिक प्रकृति द्वारा कभी कलुषित नहीं होते | वेदों द्वारा भी पुष्टि की जाती है कि भगवान् अजन्मा होकर भी अनेक रूपों में अवतरित होते रहते हैं, किन्तु तो भी वे शरीर-परिवर्तन नहीं करते | श्रीमद्भागवत में वे अपनी माता के समक्ष नारायण रूप में चार भुजाओं तथा षड्ऐश्र्वर्यो से युक्त होकर प्रकट होते हैं | उनका आद्य शाश्र्वत रूप में प्राकट्य उनकी अहैतुकी कृपा है जो जीवों को प्रदान की जाती है जिससे वे भगवान् के यथारूप में अपना ध्यान केन्द्रित कर सकें न कि निर्विशेषवादियों द्वारा मनोधर्म या कल्पनाओं पर आधारित रूप में | विश्र्वकोश के अनुसार माया या आत्म-माया शब्द भगवान् की अहैतुकी कृपा का सूचक है भगवान् अपने समस्त पूर्व अविर्भाव-तिरोभावों से अवगत रहते हैं, किन्तु सामान्य जीव को जैसे ही नवीन शरीर प्राप्त होता है वह अपने पूर्व शरीर के विषय में सब कुछ भूल जाता है | वे समस्त जीवों के स्वामी हैं, क्योंकि इस धरा पर रहते हुए वे आश्चर्य जनक तथा अतिमानवीय लीलाएँ करते रहते हैं । अतः भगवान् निरन्तर वही परमसत्य रूप हैं और उनके स्वरूप तथा आत्मा में या उनके गुण तथा शरीर में कोई अन्तर नहीं होता ।

साधारण भक्त जनों की इसी अज्ञानता का लाभ लेकर कुछ क्षद्मज्ञानी व क्षद्मसंतजन प्रायः अपने को ईश्र्वर या उनका अवतार घोषित कर जनसमुदाय को भ्रमित करते रहते हैं। परंतु आत्मज्ञान की इस वास्तविकता से वह कोसों दूर रहते है। मनुष्य को ऐसी निरर्थक घोषणाओं से व क्षद्मजनों से दूर रहना चाहिये और ब्रह्म की वास्तविकता को समझना चाहिये! ब्रह्म एक होते हुए भी अनंन्त रूप में है। भक्त को उनके सभी रूपो में समभाव रखकर भ्रमित नहीं होना चाहिए ।


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शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

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🌹🔱 *पाप-पुण्य व जन्म-मरण* 🔱🌹

💐 प्रिय भगवत्जन .....
   
      आपके प्रश्नानुसार व्यक्ति पाप-पुण्य और जन्म-मरणादिक चक्र में पडकर और स्वकर्मो को अपने ऊपर आरोपित करके दुखी: क्यो हो जाता है। इससे निकलने का क्या उपाय है? एवं हम प्राय:देखते है। कि किसी अच्छी घटना पर लोग कहते है। कि ये पूर्व में किये गए सु:कर्मो का पुण्यफल है। और किसी भी अनापेक्षित या दुख:द घटना पर प्राय: सुनने को मिलता है। कि ये पूर्व में किये गए कु:कर्मो का फल है। अब अगर व्यक्ति द्वारा यंही प्रथ्वी लोक पर ही पाप-पुण्यों का फला:भोग होता है। तो गरुण पुराण में कर्मो के फला:भोग के लिए स्वर्ग-नर्क का वर्णन क्यों है। क्या ये प्राणीमात्र को कु:कर्मो के अनुशरण से बचाने के लिए भ्रमना मात्र है?

प्रिय भगवत्जन ...

शास्त्र कहते हैं कि पुरुष क्रतुमय है। अतएव-

‘यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिनिष्पद्यते।’

पुरुष जैसा संकल्प करने लगता है वैसा ही कर्म करता है, जैसा कर्म करता है, वैसा ही बन जाता है। जिन बातों का प्राणी बार-बार विचार करता है, धीरे-धीरे वैसी ही इच्छा हो जाती हे, इच्छानुसारी कर्म और कर्मानुसारिणी गति होती है। अतः स्पष्ट है कि अच्छे कर्म करने के लिये अच्छे विचारों को लाना चाहिये। बुरे कर्मों को त्यागने के पहले बुरे विचारों को त्यागना चाहिए। जो बुरे विचारों का त्याग नहीं करता, वह कोटि-कोटि प्रयत्नों से भी बुरे कर्मों से छुटकारा नहीं पा सकता। और यही अच्छे - बुरे कर्म समय पाकर जीव के प्रारब्ध का निर्माण करते है। जिन्है व्यक्ति जीवन पर्यंन्त भोगता है। अत: अगर व्यक्ति को कर्मो की अच्छाई या बुराई से निकलना है। तो अपने मन से दु:सह कर्मो की सत्ता को अस्वीकार कर समस्त अच्छे-बुरे  कर्मो को भगवतार्पण कर मन को अच्छे सत्कार्यो में लगाकर जीवन को सुखमय बनाना चाहिये।

जीवमात्र जब कर्म करता है। तो हर कार्य को करने में उसकी अलग-अलग मानसिकता जुडी रहती है। और उसी मानसिकता के आधार पर एक ही कार्य के अनेक कर्मफलो का निर्धारण स्थति व योनि के अनुसार होता है। जैसे कि एक मनुष्य घर से बाहर निकलता है। और उसके पैरो तले आकर एक चींटी की मृत्यू हो जाती है। अब अगर उस मनुष्य ने जानबूझकर उस चींटी पर पैर रख्खा तो उसे उसकी हत्या के रूप में कर्मफल का भोग करना पडेगा और नर्कादिक की यात्रा संभव है। वहीं अगर चींटी अनजाने में पैरो तले आकर मृत्यू को प्राप्त होती है। तब भी उसे हत्या के कर्मफल का भोग तो करना ही पडेगा पर वह यहीं पृथ्वी लोकपर ही कर्मफला:भोग के रूप में संभव है। इसी तरह चींटी की मृत्यू के अन्य फला:भोग भी निर्धारित होते है। जो परिस्थिति अनुसार होते है। जैसे वही चीटी अगर मंदिर या सत्कार्य के लिए जाते हुए कुचली जाती है। तो अलग व गृहकार्य के लिए जाते हुए पैरो से कुचली जाती है। तो अलग फला:भोग अत:मनुष्य की भावना परिस्थिति व ज्ञान या अज्ञानता पर ही स्वर्ग-नर्क या प्रथ्वीलोक पर प्रारब्ध के रूप में फल:भोग मिलते है। जिन्है जीवमात्र को कर्मानुसार भोगना पडता है। ये विवेचना सिद्ध करती है। कि स्वर्ग-नर्क का अस्तित्व है। एवं पृथ्वीलोक अथवा स्वर्ग-नर्क के कर्मभोग का निर्धारण जीवमात्र द्वारा स्वयं ही किया जाता है। अत: व्यक्ति को स्वर्गादिक या प्रथ्वी लोक पर ही अच्छी योनी व सुखमय वातावरण पाने के लिए मन को वश मे कर सु:कर्म करने चाहिये। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार.. यथा-

यस्त्विन्द्रियाणी मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।

हे  अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।

व्यक्तिमात्र को मन:शांती लाने एवं जन्म-मरणादिक के चक्र से निकलने के लिए पूर्ण रूप से भगवद् समर्पण स्वीकार्य करना चाहिये यथा-

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्तवा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्र मिवाम्भसा।।

जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता ।

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।

 जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझे अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। हे अर्जुन ! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ।

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गुरुवार, 22 सितंबर 2016

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 🌹*जीवमात्र में परमात्मा की सत्ता* 🌹

प्रिय भगवत्जन .....

   आपके प्रश्नानुसार कि .... अगर जीवमात्र में भगवान का वास है। तो समस्त जीवों को अलग अलग नाम, रूप व कर्म से क्यों जाना जाता है। जीव स्वयं को काम, क्रोध , मद , मोह और लौभादिक से गृसा क्यों पाता है। और अपने कर्मानुसार बने प्रारब्ध द्वारा अच्छा बुरा फल क्यों पाता है। अगर समस्त ब्रम्हांड में भगवान की ही सत्ता है। और उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो फिर जीव स्वयं कोई भी कर्म करने में कैसे सक्षम है ?

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

प्रिय भगवत्जन ...

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पंच चेन्द्रियगोचराः।।
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।

पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध तथा इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख, स्थूल देह का पिण्ड, चेतना और धृति – इन सभी गुंण - विकारों से जीवों के शरीरों का निर्माण होता है। और इन सभी जीवो में परमात्मा आत्मतत्व के रूप में चैतन्य है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है। कि परमात्मा आत्मतत्व से सभी में चैतन्य है। परंतु स्वयं प्रकट नहीं है। इसी वजह से जीवमात्र में होते हुए भी वह जीव के रूप, रंग व कर्म से निर्लिप्त रहता है जैसे कि दुग्ध में घृत है। परंतु दृश्य नहीं होता और दुग्ध से बने किसी भी व्यंजन में घृत का नाम नहीं रहता परंतु घृत का अंश व स्वाद हर व्यंजन में रहता है। जैसे कि हमें दुग्ध से घृत निकालने के लिए यत्न करना पडता है। ( घृत निकालने के लिए दुग्ध को पहले गर्म करते है। फिर उसे दही के रूप में जमाया जाता है। , तदोपरांत मथने के पश्चात निकले हुए मख्खन को गर्म करने पर हमें घृत की प्राप्ती होती है। ) उसी तरह हमें स्वयं में परामात्मा के आत्मतत्व की प्राप्ती के लिए भगवत्भक्ती रूपी लगन में खुद को गर्म करना पडता है। "मै" रूप स्थापित स्व: कर्मो को जमाना पडता है। , दुविधाओं व विचारो का मंथन करना पडता है। तदोपरान्त स्वयं में प्रकट हुए निस्वार्थ भगवत्प्रेम की दाहकता में हमें आत्मा रूपी परमात्मा की प्राप्ती होती है। अत: स्पष्ट है। कि जीवमात्र में सदृश्य रहते हुए भी आत्मरूपी परमात्मा जीव के कर्मो से निर्लिप्त रहता है। व दृश्य नही होता है। जीव अपने कर्मो का भोगी स्वयं ही होता है।

जीवों के हमें विभिन्न रूप , रंग व आकार इसलिए दर्शित होते है। क्योकि बिना विविधता के दुनिया में कोई रंग ही नही रह जाएगा दुनिया रस हीन फीकी प्रतीत होने  लगगी और दुनिया में रहने वाले जीवों का जीवन नीरस हो जाएगा जरा सोचिये ! अगर विविध फल या व्यंजन ना होते हुए अगर एक ही फल या व्यंजन होता तो क्या हमें विभिन्न स्वादों का ज्ञान होता या मान लीजिए फूल या वस्त्रादिक विभिन्न रंगो के ना होकर एक ही रंग के होते तो क्या हमें उन्हैं उपयोग करनें में उतनी प्रसन्नता होती ? नही ना ! इसी वजह से जैसे दुनिया में नए-नए रंग व नए-नए स्वादों की आवष्यकता को देखते हुए इन सभी की रचना हुई इसी तरह विभिन्न जीवों की अलग अलग उपयोगिता देखते हुए उनके नाम , रूप व रंग की रचना परमात्मा द्वारा की गई।

       आपके प्रश्नानुसार ... जड या चेतन समस्त जीवमात्र पर भगवान की सत्ता है। भगवत्ईच्छा बिना पत्ता भी नही हिलता परंतु फिर भी जीव अच्छे या बुरे कर्मो को करने में इसलिए समर्थ है। क्योकि जीव का जीवन कर्म बिना तो संभव ही नही ! यथा !...

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।

निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता, क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है |

इसलिए कर्म करना अगर अनिवार्य ही है। तो शास्त्रोक्त कर्म करने चाहिये। यथा !....

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः।।

तू शास्त्रविहित कर्तव्य कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा |

  अत:जीवमात्र के लिए जीवनयापन को संभव करने के लिए कर्म करना अनिवार्य है। तब फिर प्रश्न उठता है। कि अगर जीव कर्म करने में मुक्त है तो परमात्मा की सत्ता कैसे जीवमात्र पर संभव है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है। कि जीव अपने कर्मो को करने के लिए मुक्त है। लेकिन प्रारब्ध भोग में नहीं यानी जीव जो कार्य स्वयं करता है। उसमें वह कार्य करने के लिए मुक्त है। लेकिन किये हुए कार्यो के फलाभोग के लिए अवधि उपरांत प्रारब्धभोग में परमात्मा की सत्ता विद्यमान है उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नही हिलता ।

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 🌹🔱⚜💧भगवतार्पणम्💧⚜🔱🌹

प्रिय भगवत्भक्त जन .....

भौतिक रूप से देखने मे स्थूल जगत् ही सब कुछ है परन्तु हम देखते हैं कि चींटी, चीड़िया, उष्ट्र, हाथी आदिकों के बड़े-बड़े देह या छोटे से छोटे जीवों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म शरीर सभी का आधार आत्मतत्व ही है। और सभी अपने सूक्ष्म विचारो पर ही उठते, चलते, फिरते, बैठते हैं, तब यह कहने में कोई भी संकोच नहीं रह जाता है कि ब्रह्मादि स्तम्ब-पर्यन्त सभी प्राणियों की जो भी हलचलें है और उन हलचलों से जो भी कार्यसंपन्न होते हैं, सब सूक्ष्म विचार, मन या वृद्धि के ही कार्य हैं।

सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, वायु आदिकों की भी हलचल का कारण सूक्ष्म विचार ही हो सकता है। और वह विचार अपने से भी सूक्ष्म चेतनाभास या अखण्ड बोध की अपेक्षा रखता है यहां तक की अचेतनों की प्रवृत्ति भी तभी होती है, जब अचेतन में चेतन अधिष्ठित होता है। और यह सब कुछ विशेषकर जीवों का उत्थान-पतन बहुत कुछ विचारों पर ही निर्धारित रहता है।

शास्त्र कहते हैं कि पुरुष क्रतुमय है। अतएव-

‘यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिनिष्पद्यते।’

पुरुष जैसा संकल्प करने लगता है वैसा ही कर्म करता है, जैसा कर्म करता है, वैसा ही बन जाता है। जिन बातों का प्राणी बार-बार विचार करता है, धीरे-धीरे वैसी ही इच्छा हो जाती हे, इच्छानुसारी कर्म और कर्मानुसारिणी गति होती है। अतः स्पष्ट है कि अच्छे कर्म करने के लिये अच्छे विचारों को लाना चाहिये। बुरे कर्मों को त्यागने के पहले बुरे विचारों को त्यागना चाहिए। जो बुरे विचारों का त्याग नहीं करता, वह कोटि-कोटि प्रयत्नों से भी बुरे कर्मों से छुटकारा नहीं पा सकता। और यही अच्छे - बुरे कर्म समय पाकर जीव के प्रारब्ध का निर्माण करते है। जिन्है व्यक्ति जीवन पर्यंन्त भोगता है। व्यक्ति किसी भी काल में अपने कर्म से मुक्त नही होता! यथा -

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।

निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता, क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है।

यहां एक बात याद रखने योग्य है कि जीव या अंगुतक व्यक्ति जो भी भोग रहा है। या उसे जो भी अच्छा - बुरा मिल रहा है। वह सभी प्रारब्धजनित निर्धारित रहता है। और जो कार्य वर्तमान में व्यक्ति के द्वारा स्वयं को "मै" या "स्व:" में स्थित रखकर किया जाता है। वह कर्म है। जो व्यक्ति को मिल रहा होता है। या उसके साथ जो भी अच्छा - बुरा होता है। वह सब उसके पूर्व संचयित कर्मो का फल है। और उसे बदलने का प्राय: व्यक्ति के पास कोई अधिकार नही है। परंतु व्यक्ति के वर्तमान कार्यो को बदलने का या उसे अपनी जीवन शैली को निर्धारित करने का पूर्ण अधिकार व्यक्ति के स्वयं के ऊपर निर्भर है। व्यक्ति को सदैव शास्त्रविहित कार्य करने चाहिये क्योकि -

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः।।

तू शास्त्रविहित कर्तव्य कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा ।

व्यक्ति द्वारा निस्वार्थ रूप से किये गए कार्य ही सराहनीय है।

यस्त्विन्द्रियाणी मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।

किन्तु हे  अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्तवा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्र मिवाम्भसा।।

जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता ।

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बुधवार, 21 सितंबर 2016

🌹🔱 ❄ «ॐ»«ॐ»«ॐ» ❄ 🔱🌹

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🌹🔱⚜💧कर्तव्यबोध💧⚜🔱🌹

प्रिय भक्त जी ......

          आपका प्रश्न है कि अगर एक योग्य भगवतानुगमन करने वाला भक्त निश्वार्थ रूप से भगवत्भक्ति , कथा-वात्रा व सत्संगादिक का लाभ आम भक्तजनों को देना चाहता है तो अज्ञजन उसे कम क्यों आंकते है।, उसका मजाक क्यो बनाते है। क्या कारण है आज भगवत्जन भगवत्मक्ति के असली तत्व को ना समझ केवल भौतिकता या उसकी चमक-दमक को देखकर उसमें ही आकर्शित होते है। ऐसा क्यों होता है ?.....

          प्रिय भक्त जी  ..... श्री रामचरितमानस की एक पंक्ति है। ..." जाकी रही भावना जैसी, प्रभू मूरत देखी तिन तैसी "। .... अर्थात हम जैसी भावना रखते है वैसी ही प्रभू की छवि हमें दृश्य प्रतीत होती है। उसी तरह व्यक्ति जिस परिवेश या अपने आसपास के वातावरण मे जन्म लेता है। बडा होता है। और अपना जीवन यापन करता है। उसी परिवेश या वातावरण की व्यवस्था के अनुसार उसकी सोच हो जाती है। यह हम सभी जानते है। कि यह कलयुग का समय है। और ज्यादातर मनुष्य स्वयं की पसंदानुसार ही कार्य करते है। या स्वयं की सोच के अनुसार ही जीना पसंद करते है। हम से परिचित या हमसे जुडने वाले व्यक्ति अलग-अलग धार्मिक प्रवत्ती या स्वभाव के होते है। विचार कीजिए कि अगर हमसे जुडा हुआ व्यक्ति धार्मिक पृवत्ति का नहीं है या कम है या अन्य धर्म को मानने वाला है। या हमारे धर्म में ही प्रभू के किसी एक रूपविशेष को मानने वाला हो या धर्म को ना समझने वाला नास्तिक है। तो स्वाभाविक है कि उसका ध्यान हमारी धार्मिक बातो में या उनकी गूढता में ना जाकर मात्र स्वयं के मतलब या अपने फायदे की बात को ही तलाशेगा जो कि प्राप्त ना होने की स्थति में उसके द्वारा हमारी बुराई या हमारी उपेक्षा संभव ही है। वहीं अगर व्यक्ति अगर धार्मिक है तब भी व्यक्ति अपनी पसंद या परिवेश अथवा अपनी जरूरत के अनुसार ही हमारी बात को सुनेगा या समझेगा । यहाँ हमारा मन इस बात पर विचलित हो उठता है। कि बताओ हम तो निस्वार्थ भाव से जन कल्याण चाहते है। एक भटके हुए पथिक को सही पथ पर लाना चाहते है। अपने कार्य का कोई भी मूल्य या यथासंभव कम से कम मूल्य लेते है। फिर भी श्रोताभक्तजन हमारे ज्ञान या हमारे भगवत्कार्य को कम क्यों आंकते है। क्या वर्तमान समय में भगवत्ज्ञान के गूणत्व को कोई समझने वाला नहीं है ? क्या सिर्फ चमक - दमक या दिखावा ही भगवत्भक्ति या भगवत्ज्ञान बनकर रह गया है ? सच्चे प्रेमी भगवत्वाक्ताओं की या उनके ज्ञान की इतनी अवहेलना क्यों होती है ? ........
        प्रिय भक्त जी ...... यहां विचारणीय है। श्रीरामचरितमानस की ये पंक्ति .... " हुइहै वही जो राम रचि राखा , को करि तर्क बढावै शाखा । ..... अर्थात कोई भी चाहे लाख कोशिशें या प्रयत्न कर ले परंतु होना तो वही है जो हमारे प्यारे सांवरे की इच्छा में है। जैसे जीव के पूर्व संचित कर्म होंगे उसी के अनुसार उसका प्रारब्ध बनता है। और जैसा प्रारब्ध होगा उसी के अनुसार जीव की बुद्धि काम करती है। उसे दिखाई या सुनाई सिर्फ वही देता है। जो उसका प्रारब्ध उसे दिखाता या सुनाता है। कहते है कि "ईस्वर की इच्छा के बिना पत्ता भी नही हिलता" फिर जरा सोचिये कि एक प्रारब्धभोगित जीव कैसे कोई कार्य बिना उनकी इच्छा के कर सकता है। जो हुआ है, जो हो रहा है, या जो होगा सब में ईश्वर के द्वारा दिये जीव के प्रारब्धजनित कर्मो के अनुसार इच्छित - अनिच्छित फलाभाव संभव रहते है। अत: हमारा किसी भी तरह का इस दीनदुनिया के बारे तर्क वितर्क करना व्यर्थ है।
      प्रिय भक्त जी ..... हम जो भी भगवत्कार्य करते है। सब अपने प्यारे प्रभू को समर्पित करके करें कौन हमारे पास आ रहा है या कौन हमारे पास से जा रहा है। कौन हमारी बडाई कर रहा है। या कौन हमारी बुराई कर रहा है। एक भगवताप्रेमीभक्त को इस दुविधा में नहीं पडना चाहिये। हमारी प्रशंसा हो या हमारा मान सम्मान बढे यही इच्छा हमें कर्म बंधन में डालते हुए हमारी मुक्ती में सब से बडी बाधा हो सकती है। अत: सभी अच्छाई - बुराइयों व लाभ - हानी से हटकर हमें अपने भगवद्भक्तिकर्म में संलग्न होना है। किसी भी जीव के लाभ - हानी के बारे में सोचना पूर्णत: अपने प्यारे सांवरे सरकार पर छोडकर इन सभी से निर्लिप्त रह कर भगवत्कार्य करना है। तभी हमारा जीवन सार्थक हो सकता है। 💐🙏🏻

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 🌹🔱⚜💧मन:शांती💧⚜🔱🌹

🙏🏻 श्री राधे राधे जी 🙏🏻

 प्रिय भगवत्भक्त जी ....

    आपका प्रश्न है कि हम बराबर भजन , पूजन , माला-जाप या सत्संग आदि करते है। ज्यादातर ऐसा कार्य करते है जिसमें कि किसी का भी अहित या नुकसान ना हो , यथा संभव सभी की भलाई की कोशिश करते हुए अपना जीवन यापन करते है फिर भी हमारा मन अशांत या खिन्न क्यों रहता है ?

      प्रिय भक्त जी !.... पूर्णशांति मिलती है हमें आत्म चिंतन से जबकि होता अक्सर यह है कि हम उस मन:शांती को अस्थिर संसार की अलग-अलग भोग-विलास से सम्बंधित चीजो में खोजते है। आइये पहले जाने कि अशांती या खिन्नता उत्पन्न कैसे होती है। जैसे कि ....किसी प्रिय चीज का समय से ना मिलना , पूर्ण कोशिश के बाद भी बार-बार किसी कार्य का बिगडना या समय पर ना हो पाना , हमारी होते हुए भी किसी प्रिय या जरूरी चीज का किसी दूसरे के पास चला जाना अथवा दैनिक जरूरतों का अभाव भी हमारे मन में खिन्नता या अशांती पैदा करता है। .... क्या आप जानते है कि इन असामान्य परिस्थितियों में से ज्यादातर परिस्थितियों का निर्माण हम स्वयं अपने लिए उत्पन्न करते है। कैसे ! ..... जैसे कि ज्यादातर हम उन चीजों पर डिपेंड रहते है जिन्हे प्राय: हम दैनिक यूज करते है। और उनकी हमें धीरे- धीरे आदत बन जाती है और यही आदत हमारे जीवन में धीरे-धीरे जरूरत ( आवश्यकता ) बन जाती है जिसे पूर्ण करना हमारे लिए अनिवार्य हो जाता है। और उसी अनिवार्यता की अपूर्णता या उस वस्तु का अभाव ही हमारे जीवन में खिन्नता यानी अशांती उत्पन्न करता है।
 
    यहां विचारने योग्य है। कि हम जिस पोजिसन या जिन परिस्थियों में अपना जीवन जी रहे है। उस पर गौर करने की .... जरा सोचिये जिस जगह , जिस परिवेस या जिस माहौल में हम है। किसी किसी को तो उतना भी उपलब्ध नही है। कुछ जन कि जिंदगी तो इतनी अभाववास्था में है कि अगर शुबह को भोजन मिला तो शाम का ठिकाना नहीं , तन पर कपडे नहीं हैं। , रहने के लिए एक छप्पर तक नहीं है। अब जरा बताइये क्या हमारी जिंदगी उन से कहीं बेहतर नहीं ? हमें हमारे प्रिय प्रभू ने इतना दिया है। कि अगर हम चाहे तो अपना जीवन कहीं बेहतर अवस्था में शांती पूर्वक बिता सकते है । परंतु फिर भी हम अशांत जीवन जी रहे है। ...जानते है आप कि कमी कहां है ? कमी है। हमारे जीवन में संतोष की, कमी है हमारे जीवन में विश्वास की , ..... अशांती में जीने का कारण यही है कि हम अपनी अस्थिर सुख सुविधाओं में शांती की खोज करते है। तो बताइये जब इस अस्थिर संसार की सुख सुविधाऐ हीं स्थिर नहीं है तो हमारे मन की शांती उन चीजो से हमें कैसे प्राप्त हो सकती है। मन:शांती के लिए हमें अपना चित्त शांत करना होगा और चित्त शांत करने के लिए हमें चिंतन करना होगा ! चिंतन करना होगा हमारी वास्तविक स्थति का कि हमें मन:शांती के लिए किस मार्ग की जरूरत है। और हम किस मार्ग पर जा रहे है। हमारी वास्तविक मंजिल क्या है? .......
        अगर आपका मन निर्गुण निराकार ब्रम्ह को स्वीकार्य करता है और आप अगर सगुण साकार ब्रम्ह की उपासना में रत है। तब भी आपका मन शांत नही रहेगा !

   प्रिय भक्त जी आपको जरूरत है। अपने असली स्वरूप के पहचान की ! आपको जरूरत है। प्रभू की उपासना के सही मार्ग के ज्ञान की आपको जरूरत है। स्व:मन कामनाओं के त्याग की ! तब आप स्वयं के मन को ही नहीं बल्की असली आत्मशांति का स्वयं को अनुभव करवा पाऐगें 💐🙏🏻

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 🌹🔱 *मानसप्रेम से भगवद्प्राप्ति* 🔱🌹

🌟 मानस पूजा से भगवत्प्रेम प्राप्ति :

प्रिय भगवत्जन .....

अपने प्यारे प्रभू को पाने का सर्वश्रेष्ठ साधन या माध्यम है मानस पूज़ा व मानस प्रेम! यद्यपि इसे भगवत्जन कम ही अपनाते है। लेकिन इससे मन एकाग्र, सरल और शुद्ध प्रेममय हो जाता है तथा बाह्य पूजा में भी हमें प्रेम व रस मिलने लगता है। इसलिए मानस पूजा को हर भगवत्भक्त को अपनाना चाहिए और प्रतिदिन थोड़ा समय इसमें अवश्य देना चाहिए। इस साधना में योग, ध्यान, भक्ति और प्रेम का अनूठा मिश्रण होता है जो व्यक्ति को भगवत्प्रेम के साथ - साथ भगवत्दर्शन तक कराने में सक्षम है। पूजन की प्रचलित विधियों में जहां भगवान को भोग व अन्य वस्तुएं अर्पित करने का प्रावधान है, जिन्हैं जुटाना कठिन होता है। वहीं मानस पूजा में सारा काम मानसिक रूप से संपन्न होता है जिसमें सिर्फ भक्ति प्रेम और भावना के साथ कल्पनाशक्ति की जरूरत होती है। यह तो हम सभी जानते है। कि भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, अच्छा - बुरा , सस्ता - महगा इनका भगवान के आगे कोई मूल्य नही है। वे इन सबसे परे हैं। वो भूखे है तो सिर्फ आपके भाव के, उन्है चाहिये तो सिर्फ आपकी लगन वो संतुष्ट हो सकते है। तो केवल प्रेमी भक्त के निस्वार्थ प्रेम से! हम वस्तुत: सामान्य पूजन में भी तरह-तरह की वस्तुएं देकर मुख्य रूप से भाव का ही प्रदर्शन किया करते है। इसमें भक्त की आर्थिक स्थिति का भी हाथ होता है। यह भी तथ्य है कि दैनिक पूजा में उन्हें अधिक से अधिक सामर्थ्य वाला भक्त भी सीमा में ही रहकर वस्तु अर्पित कर सकता है, जबकि मानस पूजा में ऐसा कोई बंधन नहीं है। हम मनचाहे रूप में प्रतिदिन अपने इष्ट को दिव्य व दुर्लभ वस्तुएं भेंट कर सकते हैं। उन्हें अपने भाव से प्रेम अर्पण कर सकते है। यह पूजा असीम है और इसमें सब कुछ आपकी भावना और कल्पनाशक्ति पर निर्भर करता है। यह पूजा साधक भक्त को यह क्षमता भी प्रदान करती है। कि वह अपनी मानसिक शक्ति के बल पर न सिर्फ निराकार से साकार और साकार से निराकार में बल्कि अलग - अलग अवस्था व स्वरूप में अपने प्रिय प्रभू को परिणित कर सकता है। इसमें इस बात का भी बंधन नहीं है कि हम श्लोक से ही पूजन की प्रक्रिया पूरी करें या पूजन विधी व मंत्रों के पूर्ण ज्ञानी हों हम चाहें तो अपनी मातृभाषा या अन्य सहज बोलने व समझने वाली भाषा में ही मानसिक पूजा की प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। बस हमारा निस्वार्थ प्रेमभाव कम नही होना चाहिये ।

🌟 ध्यान और मानसिक पूजा :

प्रिय भगवत्जन ...... साकार और निराकार दोनों ही की उपासनाओं में ध्यान व प्रेम सबसे आवश्यक और महत्त्वपूर्ण साधन है। श्रीकृष्ण भगवान् ने गीता में ध्यान व भगवत्प्रेम की बड़ी महिमा गायी है। जहाँ कहीं उनका उच्चतम उपदेश है, वहीं उन्होंने मन को अपने में (भगवान में) प्रवेश करा देने के लिये अर्जुन के प्रति आज्ञा की है। योगशास्त्रमें तो ध्यानका स्थान बहुत ऊँचा है ही। ध्यानके प्रकार बहुत-से हैं। साधक को अपनी रुचि, भावना और अधिकार के अनुसार तथा अभ्यास की सुगमता देखकर किसी भी एक स्वरूप का ध्यान करना चाहिये। यह स्मरण रखना चाहिये कि निर्गुण-निराकार और सगुण-साकार भगवान् वास्तव में एक ही हैं।

एक ही परमात्मा के अनेक दिव्य प्रकाशमय स्वरूप हैं हम उनमें से किसी भी एक स्वरूप का आश्रय लेकर  परमात्मा को पा सकते हैं; क्योंकि वास्तव में परमात्मा उससे अभिन्न ही हैं। भगवान् के परम भाव को समझकर किसी भी प्रकार से उनका ध्यान व उनसे प्रेम किया जाय, अन्त में प्राप्ति उन एक ही भगवान् की होगी, जो सर्वथा अचिन्त्यशक्ति, अचिन्त्यानन्त-गुणसम्पन्न, अनन्तदयामय, अनन्तमहिम, सर्वव्यापी, सृष्टिकर्ता सर्वरूप, स्वप्रकाश, सर्वात्मा, सर्वद्रष्टा, सर्वोपरि, सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, सर्वसुहृय, अज, अविनाशी,कर्ता- अकर्ता, देशकालातीत, सर्वातीत, गुणातीत, रूपातीत, अचिन्त्यस्वरूप और नित्य स्वमहिमा में ही प्रतिष्ठित, सदासद्विलक्षण एकमात्र परम और चरम सत्य हैं। अतएव साधकको इधर-उधर न भटकाकर अपने इष्टरूप में महान् आदर-बुद्धि परखते हुए परम भाव से उसी के ध्यानका अभ्यास करना चाहिये।

श्रीमद्भागवद्गीता के छठे अध्याय के ग्यारहवें से तेरहवें श्लोकतक के वर्णन के अनुसार एकान्त, पवित्र और सात्तविक स्थान में सिद्ध स्वस्तिक, पद्मासन या अन्य किसी सुख –साध्य आसन से बैठकर नींद का डर न हो तो आँखे मूँदकर, नहीं तो आँखों को भगवान् की मूर्ति पर लगाकर अथवा आँखों की दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर जमाकर या साधक भक्त जहां प्रतिदिन साधना में तत्पर हो सके वहां नजर स्थिर रह सके इतना केन्द्र बिंदू स्थापित कर उस पर नजर स्थिर कर प्रतिदिन कम-से-कम तीन घंटे, दो घंटे या एक घंटे—जितना भी समय मिल सके—सावधानी के साथ लय, विक्षेप, कषाय, रसास्वाद, आलस्य, प्रमाद, दम्भ आदि दोषों से बचकर श्रद्धा—भक्तिपूर्वक तत्परता के साथ ध्यानका अभ्यास करना चाहिए। ध्यान के समय शरीर, मस्तक और गला सीधा रहे और रीढ़ की हड्डी भी सीधी रहनी चाहिये। ध्यानके लिये समय और स्थान भी सुनिश्चित ही होना चाहिये ।

🌟 अनिर्वचनीय भगवत्प्रेम :

इस तरह ध्यान व मानसपूजा से भगवत्प्रेमी अपने जीवन को भगवत्प्रेम में पूर्णतया रंग लेता है। निस्वार्थ परिपक्व प्रेम से भगवत्प्रेमियों की पवित्र प्रेमाग्नि में भोग-मोक्ष की सारी कामनाएँ, संसार की सारी आसक्तियाँ और ममताएँ सर्वथा जलकर भस्म हो जाती हैं। उनके द्वारा सर्वस्व का त्याग सहज स्वाभाविक होता है। किसी भी प्रकार की सिद्धी व किसी भी प्रकार की मुक्ती का उन्हें लोभ नही रहता है। अपने प्राणप्रियतम प्रभु को समस्त आचार अर्पण करके वे केवल नित्य-निरन्तर उनके मधुर स्मरण को ही अपना जीवन बना लेते हैं। उनका वह पवित्र प्रेम सदा बढ़ता रहता है’ क्योंकि वह न कामनापूर्ति के लिये होता है न गुणजनित होता है। उसका तार कभी टूटता ही नहीं, सूक्ष्मतर रूप से नित्य-निरन्तर उसकी अनुभूति होती रहती है और वह प्रतिक्षण नित्य-नूतन मधुर रूप से बढ़ता ही रहता है। उसका न वाणी से प्रकाश हो सकता है, न किसी चेष्टा से ही उसे दूसरे को बताया जा सकता है।

भगवद्प्रेमियों के इस पवित्र प्रेम में इन्द्रिय-तृप्ति, वासना सिद्धि, भोग-लालसा आदि को स्थान नहीं रहता। बुद्धि, मन, प्राण, इन्द्रियाँ— सभी नित्य-निरन्तर परम प्रियतम प्रभु के साथ सम्बन्धित रहते हैं। मिलन और वियोग— दोनों ही नित्य-नवीन रसवृद्धि में हेतु होते हैं। ऐसा प्रेमी केवल प्रेम की ही चर्चा करता है, प्रेम की चर्चा सुनता है, उसे सर्वत्र प्रेम ही प्रेम दिखाई देता है। वह हर शब्द - वाणी में भगवद्प्रेम रस का अनुभव करता है वह प्रेम का ही मनन करता है, प्रेम में ही संतुष्ट रहता और प्रेम में ही नित्य रमण करता है।

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मंगलवार, 20 सितंबर 2016

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  🌹 *निस्वार्थ प्रेम से भगवद्प्राप्ति* 🌹

🌟 निस्वार्थ भगवत्प्रेम से भगवत्प्राप्ति :

प्रिय भगवत्जन .....

प्रेम हरि कौ रूप है, त्यौं हरि प्रेम सरूप ।
एक होइ द्वै यौं लसे ज्यौं सूरज और धूप ।।

जब मनुष्य अपने प्यारे सांवरे के प्रेम रंग में रंग जाता है तब वह प्रेममय हो जाता है, उस समय प्रेम ( भक्ती ) प्रेमी ( भक्त ) और प्रेमास्पद ( भगवान ) तीनों एक ही रूप में परिणित होकर एक ही बन जाते है। प्रेमी , प्रेम और प्रेमास्पद कहने के लिए ही तीन है। परंतु वास्तव में एक ही वस्तु के तीन रूप है। जैसे कि जल के हमें तीन ( वाष्प , बर्फ व तरल ) अलग - अलग रूप देखने को मिलते है परंतु वास्तव में तीनों एक ही है।

प्रेमी के जीवन की प्रत्येक चेष्टा सहज ही प्रेमास्पद के लिए प्रित्यर्थ होती है। जो प्रेमास्पद के लिए प्रतिकूल हो वही अविधि और जो प्रेमास्पद के अनुकूल हो यही विधी है। यही प्रेम जगत का विधी निषेध है। वस्तुत: वहां सब कुछ प्यारे सांवरे के मन का ही होता है। क्योकि जहाँ अन्तरङ्गता होती है। वहां प्रेमास्पद के मन की भावना प्रेमी के मन में आना स्वाभाविक है।

प्रिय भगवत्जन अधिकतर भक्तजन प्यारे के सच्चे प्रेम से अनभिज्ञ रहते है। जैसे कि -

प्रेम प्रेम सब कोइ कहे, प्रेम ना चीन्हे कोय ।
जेहि प्रेमहिं साहिब मिले, प्रेम कहावे सोय ।।

भगवान का सच्चा प्रेमी भगवान के अतिरिक्त और किसी भी वस्तु का चिन्तन नही करता है। यहां तक कि भगवान का चिन्तन भी वह भगवान के प्रेम के लिए ही करता है। प्रेम के सिवा ना तो वह कुछ भगवान से ही चाहता है। और ना ही भगवान के किसी प्रेमी भक्त से । प्रेमी भक्त को अपनी समस्त इच्छाओं ( कामनाओं ) को त्यागकर सिर्फ अपने प्यारे प्रेमास्पद में ही मन लगाना चाहिये! यथा -

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।

मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा। इसके उपरान्त तू मुझमें निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

 प्यारे .... सच्चा प्रेम तो वही है। जिसमें प्रियतम् प्रभू का मिलना हो जाए । और प्रियतम प्रभू मिलते है। प्रेम भरी हृदय की व्याकुलता से, करुणापूर्ण हृदय की उत्कट इच्छा से! प्रेमी जब अपने प्रेमास्पद के विरह में व्याकुल होता है। तो पल पल उसे अपने प्रेमास्पद के आने की आहट ही सुनाई देती है। बराबर उसकी छवि आँखो में दिखाई देती है। कोई भी आ रहा हो पर उसे यही प्रतीत होता है कि उसका प्राणप्रियतम् ही आ रहा है।

जब तक भक्त के अंदर "मैं" है तब तक वह पूर्ण प्रेमत्व को नही पा सकता है। और जब तक प्रेमी का प्रेम सच्चा ना हो , पूर्ण ना हो तब तक प्रेमी को प्रेमास्पद की प्राप्ती नही होती है। प्रेमी भक्त को प्रेम के पूर्णत्व के लिए स्व:तत्व से जुडी कामनाओं का त्याग करना होगा तभी प्रेमी अपने प्रिय प्रेमास्पद को पूर्णतया पा सकता है। यथा -

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहि ।
प्रेम गली अति सांकरि ता में दो ना समाहि ।।

 प्रेमी अपने जीवन को जब प्रेमास्पद के प्रेम में पूर्णतया रंग लेता है। तो निस्वार्थ परिपक्व प्रेम से प्रेमियों की पवित्र प्रेमाग्नि में भोग-मोक्ष की सारी कामनाएँ, संसार की सारी आसक्तियाँ और ममताएँ सर्वथा जलकर भस्म हो जाती हैं। उनके द्वारा सर्वस्व का त्याग सहज स्वाभाविक होता है। किसी भी प्रकार की सिद्धी व किसी भी प्रकार की मुक्ती का उन्हें लोभ नही रहता है। अपने प्राणप्रियतम प्रभु को समस्त आचार अर्पण करके वे केवल नित्य-निरन्तर उनके मधुर स्मरण को ही अपना जीवन बना लेते हैं। उनका वह पवित्र प्रेम सदा बढ़ता रहता है’ क्योंकि वह न कामनापूर्ति के लिये होता है न गुणजनित होता है। उसका तार कभी टूटता ही नहीं, सूक्ष्मतर रूप से नित्य-निरन्तर उसकी अनुभूति होती रहती है और वह प्रतिक्षण नित्य-नूतन मधुर रूप से बढ़ता ही रहता है। उसका न वाणी से प्रकाश हो सकता है, न किसी चेष्टा से ही उसे दूसरे को बताया जा सकता है।

प्रेमियों के इस पवित्र प्रेम में इन्द्रिय-तृप्ति, वासना सिद्धि, भोग-लालसा आदि को स्थान नहीं रहता। बुद्धि, मन, प्राण, इन्द्रियाँ— सभी नित्य-निरन्तर परम प्रियतम प्रभु के साथ सम्बन्धित रहते हैं। मिलन और वियोग— दोनों ही नित्य-नवीन रसवृद्धि में हेतु होते हैं। ऐसा प्रेमी केवल प्रेम की ही चर्चा करता है, प्रेम की चर्चा सुनता है, उसे सर्वत्र प्रेम ही प्रेम दिखाई देता है। वह हर शब्द - वाणी में भगवद्प्रेम रस का अनुभव करता है वह प्रेम का ही मनन करता है, प्रेम में ही संतुष्ट रहता और प्रेम में ही नित्य रमण करता है।

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सोमवार, 19 सितंबर 2016

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💧"आत्मतत्व"💧

प्रिय भगवत्भक्त जी .....
   
        आत्मतत्व का निरूपण पूर्ण रूप से तो संभव नही है फिर भी हम आपके लिए अपने आध्यात्म धर्म के अनुसार जितना संभव हो सकता है उतनी इसकी व्याख्या करते है ....

" आत्मा " यानी " परमात्मा " का साक्षात अंश ! जो जीवमात्र में विद्यमान रहता है। इसी के संदर्भ में हमें अपने आध्यात्म धर्म में उदाहरण मिलता है कि परमात्मा जीवमात्र में विद्यमान है। "आत्मा" ... आइये पहले हम इसका वास्तविक नाम व इसके आभास को समझें , ... हम में से ज्यादातर जन "प्राण" व "आत्मा" को एक ही नाम व रूप में देखते है परंतु वास्तव में ऐसा नही है। आइये इसका विश्लेषण करें  "प्राण" का दूसरा नाम है। " जीव " .... "प्राण" यानी "जीव" जो चौरासी लाख योनियों में अपने कर्म के अनुसार भटकता है व अपने प्रारब्ध का भोग करता है।
" आत्मा " ...."आत्मा" का दूसरा नाम है। "चेतना" " आत्मा" यानी "चेतना" जो जीवमात्र में विद्यमान है "आत्मा" का आभास हमें अपनी स्फुरणा के रूप में होता है। हमारे शरीर की सम्पूर्ण गतिविधी "चेतना" के फलस्वरूप ही संभव होती है। हम जो भी सोचते , समझते व करते है। उस कर्म का हिसाब इसी आत्मतत्व के रूप में परमात्मा के पास रहता है। आइये इसे और विस्त्रित रूप में समझें ।

आत्मा के पाँच कोष और चार स्तर कहे गए है। .....

कोष : जड़, प्राण, मन, बुद्धि और आनंद !
अवस्था : जाग्रत, स्वप्न, सु‍षुप्ति और तुरीय !

इनमें "आत्मा" पाँच रूप में दृश्य होता है 'एक आत्मा है जो अन्नरसमय है-एक अन्य आंतर आत्मा है, प्राणमय जो कि उसे पूर्ण करता है- एक अन्य आंतर आत्मा है, मनोमय-एक अन्य आंतर आत्मा है, विज्ञानमय (सत्यज्ञानमय) -एक अन्य आंतर आत्मा है, आनंदमय।'  ....-तैत्तिरीयोपनिषद !

 जड़ में प्राण; प्राण में मन; मन में ज्ञान और ज्ञान में आनंद। यह चेतना या आत्मा के रहने के पाँच स्तर हैं। आत्मा इनमें एक साथ रहती है। यह अलग बात है कि किसे किस स्तर का अनुभव होता है। ऐसा कह सकते हैं कि यह पाँच स्तर आत्मा का आवरण है। कोई भी व्यक्ति अपने कर्म प्रयास से इन पाँचों स्तरों में से किसी भी एक स्तर का अनुभव कर उसी के प्रति आसक्त रहता है। सर्वोच्च स्तर आनंदमय है और निम्न स्तर है। जड़ !

जो भी दिखाई दे रहा है उसे जड़ कहते हैं और हमारा शरीर जड़ जगत का हिस्सा है। जो लोग शरीर के ही तल पर जी रहे हैं वह जड़ बुद्धि कहलाते हैं, उनके जीवन में भोग और संभोग का ही महत्व है। शरीर में ही प्राणवायु है जिससे व्यक्ति भावुक, ईर्ष्यालु, क्रोधी या दुखी होता है। प्राण में ही स्थिर है मन। मन में जीने वाला ही मनोमयी है। मन चंचल है। जो रोमांचकता, कल्पना और मनोरंजन को पसंद करता है ऐसा व्यक्ति मानसिक है।
मन में ही स्थित है ज्ञानमय कोष अर्थात ‍बुद्धि का स्तर। जो विचारशील और कर्मठ है वही ज्ञानमय कोष के स्तर में है। इस ‍ज्ञानमय कोष के भी कुछ उप-स्तर है। ज्ञानमय कोष में ही स्थित है-आनंदमय कोष। यही आत्मवानों की ‍तुरीय अवस्था है। इसी ‍स्तर में जीने वालों को भगवान, अरिहंत या संबुद्ध कहा गया है। इस स्तर में शुद्ध आनंद की अनुभूति ही बच जाती है। जहाँ व्यक्ति परम शक्ति का अनुभव करता है। इसके भी उप-स्तर होते हैं। और जो इस स्तर से भी मुक्त हो जाता है-वही ब्रह्मलीन कहलाता है।

परमात्मा एक ही है किंतु आत्माएँ हमें योनी अनुसार अनेक रूप में दृश्य होती है। यह अव्यक्त, अजर-अमर आत्मा पाँच कोषों को क्रमश: धारण करती है, जिससे की वह व्यक्त (दिखाई देना) और जन्म-मरण के चक्कर में उलझ जाती है। यह पंच कोष ही पंच शरीर है। कोई आत्मा किस शरीर में रहती है यह उसके ईश्‍वर समर्पण और संकल्प पर निर्भर करता है।

चार स्तर : छांदोग्य उपनिषद (8-7) के अनुसार आत्मा चार स्तरों में स्वयं के होने का अनुभव करती है- 1..जाग्रत , 2.. स्वप्न , 3 .. सुषुप्ति और , 4 .. तुरीय अवस्था।

इसमें तीन स्तरों का अनुभव प्रत्येक जन्म लिए हुए मनुष्य को अनुभव होता ही है लेकिन चौथे स्तर में वही होता है जो ‍आत्मवान हो गया है या जिसने मोक्ष पा लिया है। वह शुद्ध तुरीय अवस्था में होता है जहाँ न तो जाग्रति है, न स्वप्न, न सु‍षुप्ति ऐसे मनुष्य सिर्फ दृष्टा होते हैं-जिसे पूर्ण-जागरण की अवस्था भी कहा जाता है।

1 . अनुभूति के स्तर:- जाग्रत, स्वप्न, सु‍षुप्ति और तुरीय अवस्था।
2 . व्यक्त (प्रकट) होने के कोष:- जड़, प्राण, मन, बुद्धि और आनंद।

अंतत: जड़ या अन्नरसमय कोष दृष्टिगोचर होता है। प्राण और मन का अनुभव होता है किंतु जाग्रत मनुष्य को ही ज्ञानमय कोष समझ में आता है। जो ज्ञानमय कोष को समझ लेता है वही उसके स्तर को भी समझता है।

अभ्यास और जाग्रति द्वारा ही जीव की उच्च स्तर में गति होती है। अकर्मण्यता से नीचे के स्तर में जीव गिरता जाता है। इस प्रकृति में ही उक्त पंच कोषों में आत्मा विचरण करती है किंतु जो आत्मा इन पाँचों कोष से मुक्त हो जाती है ऐसी मुक्तात्मा को ही ब्रह्मलीन कहा जाता है। यही मोक्ष की अवस्था है।

इस तरह वेदों में जीवात्मा के पाँच शरीर बताए गए हैं- जड़, प्राण, मन, ज्ञान और आनंद। इस पाँच शरीर या कोष के अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग नाम हैं जिसे वेद ब्रह्म कहते हैं उस ईश्वर की अनुभूति सिर्फ वही जीव कर सकता है जो आनंदमय शरीर में स्थित है। देवता, दानव, पितर और मानव इस हेतु सक्षम नहीं।

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