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  🌹🌟 राधे नाम संग हरि बोल 🌟🌹
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🌹🔱⚜💧कर्तव्यबोध💧⚜🔱🌹

प्रिय भक्त जी ......

          आपका प्रश्न है कि अगर एक योग्य भगवतानुगमन करने वाला भक्त निश्वार्थ रूप से भगवत्भक्ति , कथा-वात्रा व सत्संगादिक का लाभ आम भक्तजनों को देना चाहता है तो अज्ञजन उसे कम क्यों आंकते है।, उसका मजाक क्यो बनाते है। क्या कारण है आज भगवत्जन भगवत्मक्ति के असली तत्व को ना समझ केवल भौतिकता या उसकी चमक-दमक को देखकर उसमें ही आकर्शित होते है। ऐसा क्यों होता है ?.....

          प्रिय भक्त जी  ..... श्री रामचरितमानस की एक पंक्ति है। ..." जाकी रही भावना जैसी, प्रभू मूरत देखी तिन तैसी "। .... अर्थात हम जैसी भावना रखते है वैसी ही प्रभू की छवि हमें दृश्य प्रतीत होती है। उसी तरह व्यक्ति जिस परिवेश या अपने आसपास के वातावरण मे जन्म लेता है। बडा होता है। और अपना जीवन यापन करता है। उसी परिवेश या वातावरण की व्यवस्था के अनुसार उसकी सोच हो जाती है। यह हम सभी जानते है। कि यह कलयुग का समय है। और ज्यादातर मनुष्य स्वयं की पसंदानुसार ही कार्य करते है। या स्वयं की सोच के अनुसार ही जीना पसंद करते है। हम से परिचित या हमसे जुडने वाले व्यक्ति अलग-अलग धार्मिक प्रवत्ती या स्वभाव के होते है। विचार कीजिए कि अगर हमसे जुडा हुआ व्यक्ति धार्मिक पृवत्ति का नहीं है या कम है या अन्य धर्म को मानने वाला है। या हमारे धर्म में ही प्रभू के किसी एक रूपविशेष को मानने वाला हो या धर्म को ना समझने वाला नास्तिक है। तो स्वाभाविक है कि उसका ध्यान हमारी धार्मिक बातो में या उनकी गूढता में ना जाकर मात्र स्वयं के मतलब या अपने फायदे की बात को ही तलाशेगा जो कि प्राप्त ना होने की स्थति में उसके द्वारा हमारी बुराई या हमारी उपेक्षा संभव ही है। वहीं अगर व्यक्ति अगर धार्मिक है तब भी व्यक्ति अपनी पसंद या परिवेश अथवा अपनी जरूरत के अनुसार ही हमारी बात को सुनेगा या समझेगा । यहाँ हमारा मन इस बात पर विचलित हो उठता है। कि बताओ हम तो निस्वार्थ भाव से जन कल्याण चाहते है। एक भटके हुए पथिक को सही पथ पर लाना चाहते है। अपने कार्य का कोई भी मूल्य या यथासंभव कम से कम मूल्य लेते है। फिर भी श्रोताभक्तजन हमारे ज्ञान या हमारे भगवत्कार्य को कम क्यों आंकते है। क्या वर्तमान समय में भगवत्ज्ञान के गूणत्व को कोई समझने वाला नहीं है ? क्या सिर्फ चमक - दमक या दिखावा ही भगवत्भक्ति या भगवत्ज्ञान बनकर रह गया है ? सच्चे प्रेमी भगवत्वाक्ताओं की या उनके ज्ञान की इतनी अवहेलना क्यों होती है ? ........
        प्रिय भक्त जी ...... यहां विचारणीय है। श्रीरामचरितमानस की ये पंक्ति .... " हुइहै वही जो राम रचि राखा , को करि तर्क बढावै शाखा । ..... अर्थात कोई भी चाहे लाख कोशिशें या प्रयत्न कर ले परंतु होना तो वही है जो हमारे प्यारे सांवरे की इच्छा में है। जैसे जीव के पूर्व संचित कर्म होंगे उसी के अनुसार उसका प्रारब्ध बनता है। और जैसा प्रारब्ध होगा उसी के अनुसार जीव की बुद्धि काम करती है। उसे दिखाई या सुनाई सिर्फ वही देता है। जो उसका प्रारब्ध उसे दिखाता या सुनाता है। कहते है कि "ईस्वर की इच्छा के बिना पत्ता भी नही हिलता" फिर जरा सोचिये कि एक प्रारब्धभोगित जीव कैसे कोई कार्य बिना उनकी इच्छा के कर सकता है। जो हुआ है, जो हो रहा है, या जो होगा सब में ईश्वर के द्वारा दिये जीव के प्रारब्धजनित कर्मो के अनुसार इच्छित - अनिच्छित फलाभाव संभव रहते है। अत: हमारा किसी भी तरह का इस दीनदुनिया के बारे तर्क वितर्क करना व्यर्थ है।
      प्रिय भक्त जी ..... हम जो भी भगवत्कार्य करते है। सब अपने प्यारे प्रभू को समर्पित करके करें कौन हमारे पास आ रहा है या कौन हमारे पास से जा रहा है। कौन हमारी बडाई कर रहा है। या कौन हमारी बुराई कर रहा है। एक भगवताप्रेमीभक्त को इस दुविधा में नहीं पडना चाहिये। हमारी प्रशंसा हो या हमारा मान सम्मान बढे यही इच्छा हमें कर्म बंधन में डालते हुए हमारी मुक्ती में सब से बडी बाधा हो सकती है। अत: सभी अच्छाई - बुराइयों व लाभ - हानी से हटकर हमें अपने भगवद्भक्तिकर्म में संलग्न होना है। किसी भी जीव के लाभ - हानी के बारे में सोचना पूर्णत: अपने प्यारे सांवरे सरकार पर छोडकर इन सभी से निर्लिप्त रह कर भगवत्कार्य करना है। तभी हमारा जीवन सार्थक हो सकता है। 💐🙏🏻

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 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹          
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🌹एक बार प्रेम से बोलिए ...
🌹प्यारी श्री " राधे राधे "🌹💐💐
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