सोमवार, 19 सितंबर 2016

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💧"आत्मतत्व"💧

प्रिय भगवत्भक्त जी .....
   
        आत्मतत्व का निरूपण पूर्ण रूप से तो संभव नही है फिर भी हम आपके लिए अपने आध्यात्म धर्म के अनुसार जितना संभव हो सकता है उतनी इसकी व्याख्या करते है ....

" आत्मा " यानी " परमात्मा " का साक्षात अंश ! जो जीवमात्र में विद्यमान रहता है। इसी के संदर्भ में हमें अपने आध्यात्म धर्म में उदाहरण मिलता है कि परमात्मा जीवमात्र में विद्यमान है। "आत्मा" ... आइये पहले हम इसका वास्तविक नाम व इसके आभास को समझें , ... हम में से ज्यादातर जन "प्राण" व "आत्मा" को एक ही नाम व रूप में देखते है परंतु वास्तव में ऐसा नही है। आइये इसका विश्लेषण करें  "प्राण" का दूसरा नाम है। " जीव " .... "प्राण" यानी "जीव" जो चौरासी लाख योनियों में अपने कर्म के अनुसार भटकता है व अपने प्रारब्ध का भोग करता है।
" आत्मा " ...."आत्मा" का दूसरा नाम है। "चेतना" " आत्मा" यानी "चेतना" जो जीवमात्र में विद्यमान है "आत्मा" का आभास हमें अपनी स्फुरणा के रूप में होता है। हमारे शरीर की सम्पूर्ण गतिविधी "चेतना" के फलस्वरूप ही संभव होती है। हम जो भी सोचते , समझते व करते है। उस कर्म का हिसाब इसी आत्मतत्व के रूप में परमात्मा के पास रहता है। आइये इसे और विस्त्रित रूप में समझें ।

आत्मा के पाँच कोष और चार स्तर कहे गए है। .....

कोष : जड़, प्राण, मन, बुद्धि और आनंद !
अवस्था : जाग्रत, स्वप्न, सु‍षुप्ति और तुरीय !

इनमें "आत्मा" पाँच रूप में दृश्य होता है 'एक आत्मा है जो अन्नरसमय है-एक अन्य आंतर आत्मा है, प्राणमय जो कि उसे पूर्ण करता है- एक अन्य आंतर आत्मा है, मनोमय-एक अन्य आंतर आत्मा है, विज्ञानमय (सत्यज्ञानमय) -एक अन्य आंतर आत्मा है, आनंदमय।'  ....-तैत्तिरीयोपनिषद !

 जड़ में प्राण; प्राण में मन; मन में ज्ञान और ज्ञान में आनंद। यह चेतना या आत्मा के रहने के पाँच स्तर हैं। आत्मा इनमें एक साथ रहती है। यह अलग बात है कि किसे किस स्तर का अनुभव होता है। ऐसा कह सकते हैं कि यह पाँच स्तर आत्मा का आवरण है। कोई भी व्यक्ति अपने कर्म प्रयास से इन पाँचों स्तरों में से किसी भी एक स्तर का अनुभव कर उसी के प्रति आसक्त रहता है। सर्वोच्च स्तर आनंदमय है और निम्न स्तर है। जड़ !

जो भी दिखाई दे रहा है उसे जड़ कहते हैं और हमारा शरीर जड़ जगत का हिस्सा है। जो लोग शरीर के ही तल पर जी रहे हैं वह जड़ बुद्धि कहलाते हैं, उनके जीवन में भोग और संभोग का ही महत्व है। शरीर में ही प्राणवायु है जिससे व्यक्ति भावुक, ईर्ष्यालु, क्रोधी या दुखी होता है। प्राण में ही स्थिर है मन। मन में जीने वाला ही मनोमयी है। मन चंचल है। जो रोमांचकता, कल्पना और मनोरंजन को पसंद करता है ऐसा व्यक्ति मानसिक है।
मन में ही स्थित है ज्ञानमय कोष अर्थात ‍बुद्धि का स्तर। जो विचारशील और कर्मठ है वही ज्ञानमय कोष के स्तर में है। इस ‍ज्ञानमय कोष के भी कुछ उप-स्तर है। ज्ञानमय कोष में ही स्थित है-आनंदमय कोष। यही आत्मवानों की ‍तुरीय अवस्था है। इसी ‍स्तर में जीने वालों को भगवान, अरिहंत या संबुद्ध कहा गया है। इस स्तर में शुद्ध आनंद की अनुभूति ही बच जाती है। जहाँ व्यक्ति परम शक्ति का अनुभव करता है। इसके भी उप-स्तर होते हैं। और जो इस स्तर से भी मुक्त हो जाता है-वही ब्रह्मलीन कहलाता है।

परमात्मा एक ही है किंतु आत्माएँ हमें योनी अनुसार अनेक रूप में दृश्य होती है। यह अव्यक्त, अजर-अमर आत्मा पाँच कोषों को क्रमश: धारण करती है, जिससे की वह व्यक्त (दिखाई देना) और जन्म-मरण के चक्कर में उलझ जाती है। यह पंच कोष ही पंच शरीर है। कोई आत्मा किस शरीर में रहती है यह उसके ईश्‍वर समर्पण और संकल्प पर निर्भर करता है।

चार स्तर : छांदोग्य उपनिषद (8-7) के अनुसार आत्मा चार स्तरों में स्वयं के होने का अनुभव करती है- 1..जाग्रत , 2.. स्वप्न , 3 .. सुषुप्ति और , 4 .. तुरीय अवस्था।

इसमें तीन स्तरों का अनुभव प्रत्येक जन्म लिए हुए मनुष्य को अनुभव होता ही है लेकिन चौथे स्तर में वही होता है जो ‍आत्मवान हो गया है या जिसने मोक्ष पा लिया है। वह शुद्ध तुरीय अवस्था में होता है जहाँ न तो जाग्रति है, न स्वप्न, न सु‍षुप्ति ऐसे मनुष्य सिर्फ दृष्टा होते हैं-जिसे पूर्ण-जागरण की अवस्था भी कहा जाता है।

1 . अनुभूति के स्तर:- जाग्रत, स्वप्न, सु‍षुप्ति और तुरीय अवस्था।
2 . व्यक्त (प्रकट) होने के कोष:- जड़, प्राण, मन, बुद्धि और आनंद।

अंतत: जड़ या अन्नरसमय कोष दृष्टिगोचर होता है। प्राण और मन का अनुभव होता है किंतु जाग्रत मनुष्य को ही ज्ञानमय कोष समझ में आता है। जो ज्ञानमय कोष को समझ लेता है वही उसके स्तर को भी समझता है।

अभ्यास और जाग्रति द्वारा ही जीव की उच्च स्तर में गति होती है। अकर्मण्यता से नीचे के स्तर में जीव गिरता जाता है। इस प्रकृति में ही उक्त पंच कोषों में आत्मा विचरण करती है किंतु जो आत्मा इन पाँचों कोष से मुक्त हो जाती है ऐसी मुक्तात्मा को ही ब्रह्मलीन कहा जाता है। यही मोक्ष की अवस्था है।

इस तरह वेदों में जीवात्मा के पाँच शरीर बताए गए हैं- जड़, प्राण, मन, ज्ञान और आनंद। इस पाँच शरीर या कोष के अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग नाम हैं जिसे वेद ब्रह्म कहते हैं उस ईश्वर की अनुभूति सिर्फ वही जीव कर सकता है जो आनंदमय शरीर में स्थित है। देवता, दानव, पितर और मानव इस हेतु सक्षम नहीं।

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