बुधवार, 28 सितंबर 2016

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   🌸🌹🔱 कर्म एवं भाग्य 🔱🌹🌸

🌟 श्रेष्ठ क्या है ? "कर्म या भाग्य" ?

💐 प्रिय भगवत्जन आपके प्रश्नानुसार कौन श्रेष्ठ है। भाग्य या कर्म ? अगर भाग्य श्रेष्ठ है। तो कैसे ? और अगर कर्म तो कौन सा कर्म श्रेष्ठ है ?

प्रियजन  .... प्रश्न में पहले यह समझने योग्य है। कि कर्म और भाग्य में अंतर क्या है। " कर्म " जो दैनिक क्रिया-कलाप व्यक्ति के स्वयं के द्वारा किये जाते है। कर्म कहलाते है। " भाग्य " जो प्रारब्धानुसार व्यक्ति को समय-समय पर किसी दूसरे के द्वारा अच्छे या बुरे के रूप में उपलब्ध होता है। वह भाग्य कहलाता है। यानी जो व्यक्ति द्वारा स्वयं किया जाता है। वह " कर्म " है। और जो व्यक्ती को दूसरों के द्वारा प्राप्त होता है। वह " भाग्य " है।

प्रियजन ... व्यक्ति के प्रारब्ध का निर्माण भी वास्तव में व्यक्ति के स्वयं के पूर्वकर्मो से ही संभव होता है। ... यथा ..

‘यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिनिष्पद्यते।’

जिन बातों का प्राणी बार-बार विचार करता है, धीरे-धीरे वैसी ही इच्छा हो जाती हे, इच्छानुसारी कर्म और कर्मानुसारिणी प्रारब्धगति होती है। अर्थात समय पाकर व्यक्ति के स्वयं के कर्म ही प्रारब्धरूपी भाग्य में बदल जाते है। अत: हम कह सकते है। कि कर्म श्रेष्ठ है। क्योकि कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है।

प्रियजन ... प्रश्नानुसार कि कौन सा कर्म श्रेष्ठ है। इसके जबाव के लिए हम लिए "श्रीमद्भगवद्गीता" में "श्रीकृष्ण" भगवान के इस कथन पर दृष्टि डालते है। ... यथा ...

श्रीभगवानुवाच :
संन्यासः कर्मयोगश्र्च निःश्रेयसकरावुभौ |
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते || ५/२ ||

श्रीभगवान् ने उत्तर दिया – मुक्ति में लिए तो कर्म का परित्याग तथा भक्तिमय-कर्म (कर्मयोग) दोनों ही उत्तम हैं | किन्तु इन दोनों में से कर्म के परित्याग से भक्तियुक्त कर्म श्रेष्ठ है |

अर्थात् सकाम कर्म (इन्द्रियतृप्ति में लगाना) ही भवबन्धन का कारण है | जब तक मनुष्य शारीरिक सुख का स्तर बढ़ाने के उद्देश्य से कर्म करता रहता है तब तक वह विभिन्न प्रकार के शरीरों में देहान्तरण करते हुए भवबन्धन को बनाये रखता है | इसकी पुष्टि भागवत (५.५.४-६) में इस प्रकार हुई है-

नूनं प्रमत्तः कुरुते विकर्म यदिन्द्रियप्रीतय आपृणोति |
न साधु मन्ये यत आत्मनोऽयमसन्नपि क्लेशद आस देहः ||
पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् |
यावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ||
एवं मनः कर्मवशं प्रयुंक्ते अविद्ययात्मन्युपधीयमाने |
प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ||

“लोग इन्द्रियतृप्ति के पीछे मत्त हैं | वे यह नहीं जानते कि उनका क्लेशों से युक्त यह शरीर उनके विगत सकाम-कर्मों का फल है | यद्यपि यह शरीर नाशवान है, किन्तु यह नाना प्रकार के कष्ट देता रहता है | अतः इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करना श्रेयस्कर नहीं है | जब तक मनुष्य अपने असली स्वरूप के विषय में जिज्ञासा नहीं करता, उसका जीवन व्यर्थ रहता है | और जब तक वह अपने स्वरूप को नहीं जान लेता तब तक उसे इन्द्रियतृप्ति के लिए सकाम कर्म करना पड़ता है, और जब तक वह इन्द्रियतृप्ति की इस चेतना में फँसा रहता है तब तक उसका देहान्तरण होता रहता है | भले ही उसका मन सकाम कर्मों में व्यस्त रहे और अज्ञान द्वारा प्रभावित हो, किन्तु उसे वासुदेव की भक्ति के प्रति प्रेम उत्पन्न करना चाहिए | केवल तभी वह भव बन्धन से छूटने का अवसर प्राप्त कर सकता है |”

अतः यह ज्ञान ही (कि वह आत्मा है शरीर नहीं) मुक्ति के लिए पर्याप्त नहीं | जीवात्मा के स्तर पर मनुष्य को कर्म करना होगा अन्यथा भवबन्धन से उबरने का कोई अन्य उपाय नहीं है | किन्तु कृष्णभावनाभावित होकर कर्म करना सकाम कर्म नहीं है | पूर्णज्ञान से युक्त होकर किये गये कर्म वास्तविक ज्ञान को बढ़ाने वाले हैं | बिना कृष्णभावनामृत के केवल कर्मों के परित्याग से बद्धजीव का हृदय शुद्ध नहीं होता | जब तक हृदय शुद्ध नहीं होता तब तक सकाम कर्म करना पड़ेगा | परन्तु कृष्णभावनाभावित कर्म कर्ता को स्वतः सकाम कर्म के फल से मुक्त बनाता है, जिसके कारण उसके उसे भौतिक स्तर पर उतरना नहीं पड़ता | अतः कृष्णभावनाभावित कर्म अन्य सन्यासादिक क्रियाओं से सदा श्रेष्ठ होता है, क्योंकि इन क्रियांओ में नीचे गिरने की सम्भावना बनी रहती है |
 "श्रीकृष्ण" भगवान आगे कहते है। ...यथा ....

कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि |
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङगं त्यक्त्वात्मशुद्धये || ५/११ ||

योगीजन आसक्तिरहित होकर शरीर, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों के द्वारा भी केवल शुद्धि के लिए कर्म करते हैं |

अर्थात् जब कोई कृष्णभावनामृत में कृष्ण की इन्द्रियतृप्ति के लिए शरीर, मन, बुद्धि अथवा इन्द्रियों द्वारा कर्म करता है तो वह भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के कार्यों से कोई भौतिक फल प्रकट नहीं होता | अतः सामान्य रूप से सदाचार कहे जाने वाले शुद्ध कर्म कृष्णभावनामृत में रहते हुए सरलता से सम्पन्न किये जा सकते है | श्रील रूप गोस्वामी में भक्तिरसामृतसिन्धु में (१.२.१८७) इसका वर्णन इस प्रकार किया है –

ईहा यस्य हरेर्दास्ये कर्मणा मनसा गिरा |
निखिलास्वप्यवस्थासु जीवन्मुक्तः स उच्यते ||

“अपने शरीर, मन, बुद्धि तथा वाणी से कृष्णभावनामृत में कर्म करता हुआ (कृष्णसेवा में) व्यक्ति इस संसार में भी मुक्त रहता है, भले ही वह तथाकथित अनेक भौतिक कार्यकलापों में व्यस्त क्यों न रहे |” उसमें अहंकार नहीं रहता क्योंकि वह इसमें विश्र्वास नहीं रखता कि वह भौतिक शरीर है अथवा यह शरीर उसका है | वह जानता है कि वह यह शरीर नहीं है और न यह शरीर ही उसका है | वह स्वयं कृष्ण का है और उसका यह शरीर भी कृष्ण की सम्पत्ति है| जब वह शरीर, मन, बुद्धि, वाणी, जीवन, सम्पत्तिआदि से उत्पन्न प्रत्येक वस्तु को, जो भी उसके अधिकार में है, कृष्ण की सेवा में लगाता है तो वह तुरन्त कृष्ण से जुड़ जाता है | वह कृष्ण से एकरूप हो जाता है और उस अहंकार से रहित होता है जिसके कारणमनुष्य सोचता है कि मैं शरीर हूँ | यही कृष्णभावनामृत की पूर्णावस्था है |

नोट: यहां "श्रीकृष्णभावनामृत" उदा. हेतु कहा गया है। हम यहां यह जानते है। कि सभी इष्टशक्ति एक ही है। अत: हम किसी एक ही नाम का सपोर्ट नही करते है।  यहां साधक भक्त अपने किसी भी प्रिय आराध्य का नाम कह या समझ अथवा जोड सकता है।

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