बुधवार, 21 सितंबर 2016

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 🌹🔱 *मानसप्रेम से भगवद्प्राप्ति* 🔱🌹

🌟 मानस पूजा से भगवत्प्रेम प्राप्ति :

प्रिय भगवत्जन .....

अपने प्यारे प्रभू को पाने का सर्वश्रेष्ठ साधन या माध्यम है मानस पूज़ा व मानस प्रेम! यद्यपि इसे भगवत्जन कम ही अपनाते है। लेकिन इससे मन एकाग्र, सरल और शुद्ध प्रेममय हो जाता है तथा बाह्य पूजा में भी हमें प्रेम व रस मिलने लगता है। इसलिए मानस पूजा को हर भगवत्भक्त को अपनाना चाहिए और प्रतिदिन थोड़ा समय इसमें अवश्य देना चाहिए। इस साधना में योग, ध्यान, भक्ति और प्रेम का अनूठा मिश्रण होता है जो व्यक्ति को भगवत्प्रेम के साथ - साथ भगवत्दर्शन तक कराने में सक्षम है। पूजन की प्रचलित विधियों में जहां भगवान को भोग व अन्य वस्तुएं अर्पित करने का प्रावधान है, जिन्हैं जुटाना कठिन होता है। वहीं मानस पूजा में सारा काम मानसिक रूप से संपन्न होता है जिसमें सिर्फ भक्ति प्रेम और भावना के साथ कल्पनाशक्ति की जरूरत होती है। यह तो हम सभी जानते है। कि भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, अच्छा - बुरा , सस्ता - महगा इनका भगवान के आगे कोई मूल्य नही है। वे इन सबसे परे हैं। वो भूखे है तो सिर्फ आपके भाव के, उन्है चाहिये तो सिर्फ आपकी लगन वो संतुष्ट हो सकते है। तो केवल प्रेमी भक्त के निस्वार्थ प्रेम से! हम वस्तुत: सामान्य पूजन में भी तरह-तरह की वस्तुएं देकर मुख्य रूप से भाव का ही प्रदर्शन किया करते है। इसमें भक्त की आर्थिक स्थिति का भी हाथ होता है। यह भी तथ्य है कि दैनिक पूजा में उन्हें अधिक से अधिक सामर्थ्य वाला भक्त भी सीमा में ही रहकर वस्तु अर्पित कर सकता है, जबकि मानस पूजा में ऐसा कोई बंधन नहीं है। हम मनचाहे रूप में प्रतिदिन अपने इष्ट को दिव्य व दुर्लभ वस्तुएं भेंट कर सकते हैं। उन्हें अपने भाव से प्रेम अर्पण कर सकते है। यह पूजा असीम है और इसमें सब कुछ आपकी भावना और कल्पनाशक्ति पर निर्भर करता है। यह पूजा साधक भक्त को यह क्षमता भी प्रदान करती है। कि वह अपनी मानसिक शक्ति के बल पर न सिर्फ निराकार से साकार और साकार से निराकार में बल्कि अलग - अलग अवस्था व स्वरूप में अपने प्रिय प्रभू को परिणित कर सकता है। इसमें इस बात का भी बंधन नहीं है कि हम श्लोक से ही पूजन की प्रक्रिया पूरी करें या पूजन विधी व मंत्रों के पूर्ण ज्ञानी हों हम चाहें तो अपनी मातृभाषा या अन्य सहज बोलने व समझने वाली भाषा में ही मानसिक पूजा की प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। बस हमारा निस्वार्थ प्रेमभाव कम नही होना चाहिये ।

🌟 ध्यान और मानसिक पूजा :

प्रिय भगवत्जन ...... साकार और निराकार दोनों ही की उपासनाओं में ध्यान व प्रेम सबसे आवश्यक और महत्त्वपूर्ण साधन है। श्रीकृष्ण भगवान् ने गीता में ध्यान व भगवत्प्रेम की बड़ी महिमा गायी है। जहाँ कहीं उनका उच्चतम उपदेश है, वहीं उन्होंने मन को अपने में (भगवान में) प्रवेश करा देने के लिये अर्जुन के प्रति आज्ञा की है। योगशास्त्रमें तो ध्यानका स्थान बहुत ऊँचा है ही। ध्यानके प्रकार बहुत-से हैं। साधक को अपनी रुचि, भावना और अधिकार के अनुसार तथा अभ्यास की सुगमता देखकर किसी भी एक स्वरूप का ध्यान करना चाहिये। यह स्मरण रखना चाहिये कि निर्गुण-निराकार और सगुण-साकार भगवान् वास्तव में एक ही हैं।

एक ही परमात्मा के अनेक दिव्य प्रकाशमय स्वरूप हैं हम उनमें से किसी भी एक स्वरूप का आश्रय लेकर  परमात्मा को पा सकते हैं; क्योंकि वास्तव में परमात्मा उससे अभिन्न ही हैं। भगवान् के परम भाव को समझकर किसी भी प्रकार से उनका ध्यान व उनसे प्रेम किया जाय, अन्त में प्राप्ति उन एक ही भगवान् की होगी, जो सर्वथा अचिन्त्यशक्ति, अचिन्त्यानन्त-गुणसम्पन्न, अनन्तदयामय, अनन्तमहिम, सर्वव्यापी, सृष्टिकर्ता सर्वरूप, स्वप्रकाश, सर्वात्मा, सर्वद्रष्टा, सर्वोपरि, सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, सर्वसुहृय, अज, अविनाशी,कर्ता- अकर्ता, देशकालातीत, सर्वातीत, गुणातीत, रूपातीत, अचिन्त्यस्वरूप और नित्य स्वमहिमा में ही प्रतिष्ठित, सदासद्विलक्षण एकमात्र परम और चरम सत्य हैं। अतएव साधकको इधर-उधर न भटकाकर अपने इष्टरूप में महान् आदर-बुद्धि परखते हुए परम भाव से उसी के ध्यानका अभ्यास करना चाहिये।

श्रीमद्भागवद्गीता के छठे अध्याय के ग्यारहवें से तेरहवें श्लोकतक के वर्णन के अनुसार एकान्त, पवित्र और सात्तविक स्थान में सिद्ध स्वस्तिक, पद्मासन या अन्य किसी सुख –साध्य आसन से बैठकर नींद का डर न हो तो आँखे मूँदकर, नहीं तो आँखों को भगवान् की मूर्ति पर लगाकर अथवा आँखों की दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर जमाकर या साधक भक्त जहां प्रतिदिन साधना में तत्पर हो सके वहां नजर स्थिर रह सके इतना केन्द्र बिंदू स्थापित कर उस पर नजर स्थिर कर प्रतिदिन कम-से-कम तीन घंटे, दो घंटे या एक घंटे—जितना भी समय मिल सके—सावधानी के साथ लय, विक्षेप, कषाय, रसास्वाद, आलस्य, प्रमाद, दम्भ आदि दोषों से बचकर श्रद्धा—भक्तिपूर्वक तत्परता के साथ ध्यानका अभ्यास करना चाहिए। ध्यान के समय शरीर, मस्तक और गला सीधा रहे और रीढ़ की हड्डी भी सीधी रहनी चाहिये। ध्यानके लिये समय और स्थान भी सुनिश्चित ही होना चाहिये ।

🌟 अनिर्वचनीय भगवत्प्रेम :

इस तरह ध्यान व मानसपूजा से भगवत्प्रेमी अपने जीवन को भगवत्प्रेम में पूर्णतया रंग लेता है। निस्वार्थ परिपक्व प्रेम से भगवत्प्रेमियों की पवित्र प्रेमाग्नि में भोग-मोक्ष की सारी कामनाएँ, संसार की सारी आसक्तियाँ और ममताएँ सर्वथा जलकर भस्म हो जाती हैं। उनके द्वारा सर्वस्व का त्याग सहज स्वाभाविक होता है। किसी भी प्रकार की सिद्धी व किसी भी प्रकार की मुक्ती का उन्हें लोभ नही रहता है। अपने प्राणप्रियतम प्रभु को समस्त आचार अर्पण करके वे केवल नित्य-निरन्तर उनके मधुर स्मरण को ही अपना जीवन बना लेते हैं। उनका वह पवित्र प्रेम सदा बढ़ता रहता है’ क्योंकि वह न कामनापूर्ति के लिये होता है न गुणजनित होता है। उसका तार कभी टूटता ही नहीं, सूक्ष्मतर रूप से नित्य-निरन्तर उसकी अनुभूति होती रहती है और वह प्रतिक्षण नित्य-नूतन मधुर रूप से बढ़ता ही रहता है। उसका न वाणी से प्रकाश हो सकता है, न किसी चेष्टा से ही उसे दूसरे को बताया जा सकता है।

भगवद्प्रेमियों के इस पवित्र प्रेम में इन्द्रिय-तृप्ति, वासना सिद्धि, भोग-लालसा आदि को स्थान नहीं रहता। बुद्धि, मन, प्राण, इन्द्रियाँ— सभी नित्य-निरन्तर परम प्रियतम प्रभु के साथ सम्बन्धित रहते हैं। मिलन और वियोग— दोनों ही नित्य-नवीन रसवृद्धि में हेतु होते हैं। ऐसा प्रेमी केवल प्रेम की ही चर्चा करता है, प्रेम की चर्चा सुनता है, उसे सर्वत्र प्रेम ही प्रेम दिखाई देता है। वह हर शब्द - वाणी में भगवद्प्रेम रस का अनुभव करता है वह प्रेम का ही मनन करता है, प्रेम में ही संतुष्ट रहता और प्रेम में ही नित्य रमण करता है।

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 🌹۞☀∥ राधेकृष्ण: शरणम् ∥☀۞🌹
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  🌹: कृष्णा : श्री राधा प्रेमी : 🌹          
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🌹एक बार प्रेम से बोलिए ...
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